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सत्संग, सेवा और सिमरन आत्मिक जीवन के तीन सुदृढ़ आधार हैं

Nirankari, Satguru Mata Sudiksha ji Maharaj, Sant Nirankari charitable Foundation, Sant Nirankari Mission
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5 Dariya News

चंडीगढ़ , 05 Jul 2026

Last updated on: Jul 06, 2026, 12:12 IST

संत निरंकारी सत्संग भवन, सेक्टर-30, चंडीगढ़ में एक भव्य महिला संत समागम का आयोजन श्रद्धा,  भक्ति एवं आध्यात्मिक उल्लास के वातावरण में सम्पन्न हुआ। समागम में यमुनानगर से पधारी केन्द्रीय प्रचारक आदरणीय बहन गीता चान्दना जी ने अपने प्रेरणादायी विचारों से उपस्थित साध-संगत को आध्यात्मिक जागृति के साथ-साथ पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन को सुखमय बनाने के व्यावहारिक सूत्र प्रदान किए। 

अपने प्रवचनों में बहन चान्दना जी ने कहा कि महिला परिवार और समाज की आधारशिला है। जिस प्रकार किसी भवन की मजबूती उसकी नींव पर निर्भर करती है, उसी प्रकार परिवार के संस्कार, वातावरण और आने वाली पीढ़ियों का निर्माण भी नारी के व्यक्तित्व एवं आचरण से होता है। यदि नारी प्रेम, मधुरता, सहनशीलता, धैर्य और अध्यात्म से जुड़ी हो तो उसका पूरा परिवार प्रेम, सौहार्द और शांति का केंद्र बन जाता है।

उन्होंने सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज के एक प्रेरक प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि जैसे शीतल दूध में नींबू का रस डालने पर भी वह तुरंत नहीं फटता, उसी प्रकार यदि मनुष्य का स्वभाव शीतल और संतुलित हो तो विपरीत परिस्थितियाँ एवं कटु व्यवहार भी उसके मन की शांति को भंग नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि जीवन की वास्तविक शक्ति क्रोध में नहीं, बल्कि शीतलता, सहनशीलता और विनम्रता में निहित है।

उन्होंने कहा कि जैसे शरीर को स्वस्थ रखने के लिए उत्तम भोजन, पर्याप्त विश्राम और नियमित व्यायाम आवश्यक हैं, उसी प्रकार आत्मा के पोषण के लिए सत्संग, सिमरन और सेवा अनिवार्य हैं। सत्संग आत्मा का भोजन है, सिमरन आत्मा का विश्राम और सेवा आत्मा का व्यायाम है। इन तीनों का नियमित अभ्यास मनुष्य के जीवन में विनम्रता, संतुलन, आत्मबल और ईश्वर से जुड़ाव को सुदृढ़ करता है। 

बहन  चान्दना जी ने सत्संग की निरंतरता पर बल देते हुए कहा कि प्रत्येक सत्संग मनुष्य के अंतर्मन को परिष्कृत करता है। उन्होंने समझाया कि प्रत्येक सत्संग हमारे भीतर सकारात्मक परिवर्तन का आधार बनता है। सेवा के विषय में उन्होंने कहा कि सेवा सदैव निष्काम, निस्वार्थ एवं अहंकार-रहित भाव से की जानी चाहिए। 

सेवा के पीछे यदि किसी प्रकार की व्यक्तिगत अपेक्षा या लाभ की भावना हो तो उसका आध्यात्मिक महत्व समाप्त हो जाता है। सच्ची सेवा वही है जो केवल प्रेम और समर्पण से प्रेरित हो। उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में निरंकार पर अटूट विश्वास बनाए रखें, निंदा-चुगली से दूर रहें तथा अपने मन की प्रत्येक बात परमात्मा के समक्ष ही प्रार्थना के रूप में रखें। यही भाव मन को हल्का, शांत और सकारात्मक बनाए रखता है।

उन्होंने कहा कि जैसे पेंसिल स्वयं नहीं लिखती, बल्कि उसे चलाने वाला हाथ होता है, उसी प्रकार मनुष्य को सदैव यह स्मरण रखना चाहिए कि वास्तविक कर्ता केवल निरंकार परमात्मा है। उन्होंने अंत में सभी श्रद्धालुओं को आह्वान किया कि वे ज्ञान के अनुरूप अपने विचारों, व्यवहार और कर्मों में सामंजस्य स्थापित करें, सदैव प्रभु की रजा में प्रसन्न रहें तथा प्रेम, सेवा, सिमरन और सत्संग के माध्यम से मानवता, भाईचारे और विश्व-बंधुत्व के संदेश को जन-जन तक पहुँचाएँ।

इससे पूर्व यहां के ज़ोनल इन्चार्ज श्री ओ.पी. निरंकारी ने आदरणीय बहन चान्दना जी का सारी साधसंगत की ओर से स्वागत व धन्यवाद किया । इस अवसर पर चण्डीगढ़ ज़ोन से आए अनेक वक्ताओं ने गीत, कविता, कव्वाली, स्किट, स्पीच आदि के रूप में सत्गुरू माता सुदीक्षा जी महाराज द्वारा दी जा रही शिक्षाओं को जीवन में अपनाने से प्राप्त हो रहे सुकून के प्रति अपने अपने भाव व्यक्त किए।  

 

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