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क्या अजय शर्मा सरकार की मदद से 7.27 अरब दुनिया को समझा पाएगे सांईस के संषोधित नियम ?

न्यूटन, आंइस्टीन और आर्किमिडीज के नियमों में संषोधन  ,अमेरिकन, यूरोपियन वैज्ञानिकों ने छापे शोधपत्र और पुस्तके

21-Oct-2015
21-Oct-2015
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शिमला , 21 Oct 2015

Last updated on: Oct 21, 2015, 00:00 IST

न्यूटन, आंइस्टीन और आर्किमिडीज को विज्ञान में भगवान का दर्जा हासिल है। दुनिया के 7.25 अरब लोग इन्हें सही और सम्पूर्ण मान रहे हैं। जबकि शिमला  के अजय शर्मा (सहायक निदेषक, शिक्षा ) कहते हैं कि हजारों, सैकडों साल पहले जब ये नियम बने तो उस समय के मुताबिक सही थे पर आज के मैथेमैटिकल और एक्सपैरीमैन्टल स्थिति के मध्यनजर इनमें संषोधन होना चाहिए। अजय शर्मा ने 2265 वर्ष पुराने आर्किमिडीज सिद्वान्त 110 वर्ष पुराने न्यूटन के नियमों और 110 वर्ष पुराने आंइस्टीन के  E=mc2 समीकरण का संषोधन किया है। इतना ही नहीं पूरी वैज्ञानिक जांच पड़ताल के बाद उनका शोधकार्य भारत से हजारों कि.मी. दूर अमेरिका/ यूरोप के जनरल में प्रकाशित हो चुका है। उनकी दो पुस्तकें बियोड न्यूटन एंड आर्किमिडीज (2013) तथा ‘बियोड आइस्टीन एंड E=mc2 (2015)  कैम्ब्रिज, इंग्लैंड से पाब्लिशर्ज के खर्च पर प्रकाशित  हो चुकी है। शर्मा अपने शोध कार्य को अमेरिका, इंग्लैड आदि देषों की यूनिवर्सिटीज में इन्टर नैशनल कान्फरैंसों में प्रस्तुत कर चुके है।

01  अजय जी आप 7.25 अरब लोगों के विचारों से अलग न्यूटन, आंइस्टीन और आर्किमिडीज के नियमों पर विपरीत हालातों में 33 साल से शोध कर रहे है। वैज्ञानिकों की सिफारिशों  के बाद आपकी शोध प्रकाशित  भी हुई। यह सब कैसे हुआ? 

अजय शर्माः      हिमाचल देवभूमि है। मुझे भगवान पर पूरी भरोसा है, मेरी मेहनत सफल होगी। भारत आधारभूत विज्ञान के नियमों के सम्बन्ध में सुपर पावर बनेगा। कोई कितना विरोध करता है। इससे मुझे, मतलब नहीं। मुझे इस बात से मतलब है कि वैज्ञानिक मेरे शोधकार्य को प्रकाशित करें..... यह हो रहा है। कर्म ही मेरे वश में है।

प्र:2  आप सरकार से क्या चाहते हैं?

अजय शर्माः      मैं सरकार से सिर्फ प्रार्थना कर सकता हूं ... मेरी शोध कार्य वैज्ञानिक जांच पड़ताल के बाद अमेरिका, यूरोप से प्रकाषित हो चुका है। इसमें 100 फीसदी मैरिट है। इस शोध कार्य पर सेमिनार करवाये, उसकी रिकार्डिगं करे, मैं वैज्ञानिकों के प्रष्नों के उत्तर लिख कर दूंगा। सारी बातचीत को इंटरनैट पर आम लोगों के प्रकाशित करूंगा। रिर्पोटस पर वैज्ञानिकों के हस्ताक्षर होने चाहिए ताकि वे उनकी जिम्मेदारी लें। इससे दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा।

प्र: 3      लगभग 2 सभी सोचते थे कि न्यूटन, आंइस्टीन और आर्किमिडीज के नियम सम्पूर्ण है, अजेय हैं। आपको कब लगा  िक इस कार्य में सफलता मिल सकती है।

अजय शर्माः      पहली बात दुनिया में कोई भी अजेय नहीं, वक्त की बात है अपना-2 दौर होता है। इतना काम करने के बाद भी सभी दरवाजे बंद मिले। तब मैं 19 जून, 2015 को माननीय संईस एंड टैक्नोलाजी मंत्री डा हर्ष बर्धन जी से मिला। उन्होंने उसी समय मेरी पुस्तकें, विभाग के सचिव प्रोफैसर आशुतोष शर्मा को भेज दी और सात दिनों के बाद सैकरेटरी से मिलने का निर्देष दिया। लगा कि उम्मीद बाकी है। फिर माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के कार्यलय ने भी मेरी याचिकाएं सैकरेटरी साईंस एंड टैक्नोलाजी को भेजी। नौ महीनों से मेरी पुस्तकें उनके पास है।

प्र: 4      चलो विज्ञान के मुददे पर बात करते हैं। आपने न्यूटन के दूसरे और तीसरे नियम का संषोधन क्यों किया?

अजय शर्माः      न्यूटन की गति का दूसरा नियम, न्यूटन ने कभी दिया ही नहीं था। यह नियम स्विटजरलैंड के वैज्ञानिक यूलर ने न्यूटन की मृत्यु के 48 साल 1775 में दिया था इसके हजारों सबूत मौजूद है। न्यूटन की गति का तीसरा नियम वस्तु की प्रकृति, संरचना, बनावट आदि की अनदेखी करता है। न्यूटन ने कहा है सिर्फ वस्तु (body या object) सब में रिजल्ट अलग-2 होते है। वस्तु लोहे की भी हो सकती है, ऊन की भी और कपास की भी। इसलिए संषोधन किया है।

प्र: 5      2265 पुराने आर्किमिडीज के सुधार का क्या चक्कर है?

अजय शर्माः      सिद्वान्त के अनुप्रयोगों के स्पष्ट है कि सिद्वान्त के अनुसार वस्तु का आकार बेमानी (meaningless है)। वस्तु चाहे छतरीनुमा हो या लोहे कण प्रयोगों में वस्तु का आकार महत्व है। लोहे के कण छतरीनुमा वस्तु से तेजी से पानी में गिरते है। इसलिए सिद्वान्त के अधिक उपयोगी बनाने के लिए इसमें सुधार किया है। संषोधित सिद्वान्त वस्तु के आकार की व्याख्या करता है।

प्र : 6      इसी सुधार और संषोधन के लपेटे में आपने आइस्टीन के समीकरण  E=mc2 को भी नहीं बख्शा।

अजय शर्माः      स्पष्ट रहे कि मैं आइस्टीन की  E=mc2 की डैरीवेसन (1905) खामिया बता रहा हूं। यह डैरीवेसन विषेष हालातों में ही सही है, सभी या सामान्य हालातों में नहीं। सभी हालातों में यह गलत भविष्यवाणी करता है.... कि कोई वस्तु जब प्रकाश ऊर्जा देती है तो उसका भार बढ़ना चाहिए। यह गलत है। सरासर गलत है। सभी वैज्ञानिक प्रष्नों के लिए।

प्र: 7      मान लेते हैं आप सही है क्योंकि अमेरिकन, यूरोपियन वैज्ञानिकों में छानबीन के बाद आपके शोधपत्र जरनलज, कान्फरैसों में प्रकाषित किए हैं। इग्ले कैमिब्रज, इग्लैंड से पुस्तकों भी प्रकाषित हुई है। पर आप लोगों को दुनिया को कैसे समझाएगें।

अजय शर्माः      मैं भारत का नागरिक हूं। इस समय भारत सरकार इस विषय में उचित कदम, उठा रहीं है, दो राय नहीं। इससे भारत विष्व में आधारभूत नियमों में सुपर पावर बनेगा- मैं पत्थर पर लिख सकता हूं।हां मेरे भारत सरकार से प्रार्थना है कि वे इस शोधकार्य पर सेमिनार करवाये मैं वैज्ञानिकों के प्रष्नों का उत्तर लिख कर दूंगा। सभी उत्तर मेरी पुस्तकों में है। इन पर खर्च बहुत ही कम आएगा।हां मैं रिपोर्ट, उसी रिपोर्ट को मानता हूं जिस पर वैज्ञानिक के संस्थान का नाम, अपना नाम और हस्ताक्षर हो। यह धारणा में व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर बनी है।

 

Tags: Ajay Sharma

 

 

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