अजय शर्मा 31 मार्च 2021 को रिटायर हो रहे हैं? फिर कैसे होंगे ये प्रयोग ?
अजय की भी इस बारे में 36 साल की मेहनत है , वे अब काम को छोड़ सकते हैं ?
उनकी पत्नी अंजना शर्मा, अजय के संघर्ष को ब्यान करती हुए पुस्तक "विज्ञान बदलने का सफ़र" या " भारत को कैसे ना मिला नोबेल प्राइज़ ? " (Hindi & English) लिख रही. जिस से उनकी पुरी सच्ची कहानी दुनिया के सामने आ जाएगी.
न्यूटन के तीसरे नियम की खामी
यह वस्तु के आकार की अनदेखी करता है
335 वर्ष पुराने तीसरे नियम के अनुसार क्रिया (action) और प्रतिक्रिया (reaction) हमेशा विपरीत और बराबर होते है. अजय के अनुसार कुछ हालातों मे क्रिया , प्रतिक्रिया के बराबर , कम और ज़्यादा भी हो सकती है.
प्रयोगों में वस्तु का आकार एक महत्वपूर्ण घटक (factot) है,जिस की न्यूटन का नियम अनदेखी करता है. यह नियम की खामी है.इस खामी की चर्चा करने की ब्ज़ाय वैज्ञानिक इस मुद्दे पर बात भी नहीं करते. ये कैसा विज्ञान है , जिस में चर्चा करने की मनाही है ...और मूर्ति पूजा जैसा महॉल है.
किन - किन वैज्ञानिको और वैज्ञानिक संस्थाओं ने अजय की शोध को सही कहा है ?
अजय ने 1अगस्त 2018 को यह शोधपत्र अमेरिकन ऐसोसिएसन आफ फिजिक्स टीचरज की समर कान्फरैस वाशिगटन में प्रस्तुत किया। प्रस्तुति के दौरान एक अमेरिकन वैज्ञानिक ने कहा,
अजय, अगर आप न्यूटन के तीसरे नियम में प्रयोगो द्वारा,वस्तु के आकार के प्रभाव,को सिद्ध कर देते है। तो भारत नोबेल प्राइज का हकदार होगा।
न्यूटन के अनुसार वस्तु का आकार महत्वहीन है.
22 अगस्त 2018 की रिपोर्ट मेंअमेरिकन ऐसोसिएसन आफ फिजिक्स टीचरज के प्रेजीडेंट प्रोफ़ेसर गोर्डन पी रामसे ने लिखा कि अजय द्वारा सुझाए प्रयोगों से न्यूटन का नियम ग़लत सिध हो सकता है .यहीं से अजय की सोच सकात्मक हो गयी और वे काम पर लग गये.केंद्रीय वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुंसधान परिषद (CSIR, New Delhi) की प्रयोगशाला नॅशनल फ़िजिकल लॅबोरेटरी न्यू देहली के डायरेक्टर और वरिष्ठ मुख्य वैज्ञानिक डा. वी पी एस अवाना,ने भी अपनी रिपोर्ट में अजय के प्रयोगों को सही ठहराया है और मौलिक कहा है.रिपोर्ट में आगे लिखा है की अगर ये प्रयोग सफल होते हैं तो भारतीय विज्ञान के लिए बहुत बड़ा मौका होगा. उन्होने अजय को निर्देश दिया की वे पैसे का इंतज़ाम करके इन प्रयोगों को करे.और भी कई वैज्ञानिकों और वैज्ञानिक संस्थानों ने अजय को प्रयोगों द्वारा न्यूटन के तीसरे नियम की खामी को सिध करने को कहा है. इस के बाद अजय ने किसी की नकारात्मक बात नहीं सुनी और अपने काम पर लग गये .
इसरो या डी.आर.डी.ओ या हेल जैसे संस्थानों का सहयोग ज़रूरी
हम संवेदन शील उपकरणों से क्रिकेट की बॉल की स्पीड को मापते है कि यह 130 किलो मीटर प्रति घंटा या 90 किलो मीटर प्रति घंटा हो सकती है. इन उपकरणों का उपयोग इसरो ( भारतीय अंतरिक्ष अनुस्धान संगठन )या डी.आर.डी.ओ (डिफेन्स रिसर्च डिवेलपमेंटल ऑर्गनाइज़ेशन)या हेल ( हिंदूस्तान एरोनौटिकल लिमिटेड ) में होता है. किसी एक संस्थान का सहयोग ज़रूरी है. अगर मदद मिलती है तो यह प्रयोग 10 लाख रुपये में लगभग 1 साल में पूरे हो सकते हैं.
सरकार से प्रार्थना
अजय ने सरकार से प्रार्थना की है की इस प्रॉजेक्ट के लिएकमेटी बनाई जाए . दस लाख का बजट की ज़िम्मेदारी इसे कमेटी पर हो. और वे अजय को प्रयोग में लगने वाले उपकरणों का इंतज़ाम करे.अजय शर्मा 31 मार्च 2021 को रिटायर हो रहे है.सरकार के आदेशों पर रिटायरमेंट के वाबजूद भी अजय शर्मा 24x7 , इस प्रॉजेक्ट पर काम करने को तैयार है. अजय ने इन पर 36 साल पागलपन की हद तक मेहनत की है. तभी वैज्ञानिक आज न्यूटन के नियम की खामी को सिंधांत रूप में स्वीकार कर रहें है. प्रयोगों में न्यूटन की खामी निर्विवाद और अंतिम रूप से सिध हो जाएगी .अब यह सरकार पर ही निर्भर करता है की सरकार न्यूटन के नियम के संशोधन पर प्रयोग करवाना चाहती है या नही.अजय शर्मा तो रिटायर होने के बाद भी दिन रात इन प्रयोगों पर काम करने को तैयार हैं.शर्मा साफ कहते हैं इन प्रयोगों से भारत को नोबेल प्राइज़ मिल सकता है.