सत्गुरू माता सुदीक्षा जी महाराज के पावन पवित्र आर्शीवाद से संत निरंकारी सत्संग भवन, मौली जागरां में महिला समागम का आयोजन किया गया।जिसमें महिला श्रद्वालुओं ने गीत, विचार, कविता, स्किट व संास्कृतिक प्रस्तुतियों द्वारा सत्गृरू की शिक्षाओं का यशोगान किया।
इस अवसर पर बहन सिमरन वर्मा जी, प्रचारिका, चंडीगढ़ ने कहा कि सत्गुरू की शिक्षाओं को जीवन में अपनाने से ही सभी नकारात्मक पहलुओं का समाधान हो जाता है। उन्होंने एक उदाहरण से समझाते हुए कहा कि अकसर बाजार में कपड़े की दुकान पर कपड़े देखने जाते है, दुकानदार आपको कई वैरियटी के कपड़े दिखाता है।
हमें चुनाव करना है कि क्या खरीदना है। इसी प्रकार आज समागम में श्रद्वालुओं से विचार, गीत आदि श्रवण किए हैं, परन्तु हम उसमें से क्या सिखलाई लेकर जाते हैं यह हम पर निर्भर करता है। लेकिन कोशिश करें कि यहां मिली सारी सिखलाई को जीवन में अपनाएं।
उन्होंने आगे कहा कि अगर हम सत्संग के अंदर तो दास भावना से युक्त होकर रहते हैं परन्तु अन्यथा मन अभिमान से भरा हुआ हो तो हमारी भी हालत उस सांप जैसी है जो बेशक अच्छा नजर आ रहा है, परंतु उसके शरीर में जहर है जो कभी हानि पहुंचा सकता है। जब तक मेरे अंदर अवगुण के भाव हैं जो दूसरों का निरादर, निंदा , नफरत , दूसरों का सत्कार न करना आदि अंदर के जहर को नहीं निकालते तो हर कोई आपका अपना नहीं बन पाएगा। सत्गुरू प्यार से ही खुश होता है।
उन्होंने कहा कि सत्गुरू हमें ब्रहाज्ञान से जोड़कर हमारी नकारात्मकता को सकारात्मकता में परिविर्तित करता है। हमारे अंदर की मिठास, आदर के भावों को जीवन में लाता है। जिस प्रकार किसी को एक कप चाय का चीनी डालकर व चम्मच देकर दिया गया हो परंतु वो बिना चीनी मिलाए चाय पीएगा तो पहले वाले घूंट में उसे चीनी की मिठास नहीं मिलेगी लेकिन अंतिम के कुछ घूंट मीठे लगेंगे।
इसलिए सत्गुरू हमें अवगुणों को गुणों में सेवा, सिमरन व सत्संग द्वारा परिवर्तिंत कर देता है। उन्होंने कहा कि सत्संग में सीखने से भाव से जाकर ही सीखा जा सकता है और सुकून मिलता है। जब भी सत्संग में आए भाव लेकर आए अभाव नहीं। सत्संग में अकसर आना क्यों जरूरी है इसे एक मां ने बच्चे को उदाहरण द्वारा समझाते हुए कहा कि एक कोयला के टुकड़े को अंगीठी में डाला, फिर उसे निकालकर राख में रख दिया।
कोयला राख में मिलकर ठंडा होते ही अपने असली स्वरूप में आ गया। इसी प्रकार मां ने फिर कोयले को राख से निकाला ओर अंगीठी में दोबारा डाल दिया, आग की तपिश में गया अब फिर से वो चमक रहा था और गर्माहट दे रहा था। इसी प्रकार जब संसार में रहते हमारे मन पर ंभी निंदा, चुगली, नकारात्मका के भावों की धूल पड़ जाती है जो साधसंगत में आते ही जब संतजनों के वचनों की तपिश मिलती है तो अभाव भाव बदल जाते हैं।
उप्होंने एक अन्य उदाहरण से समझाया कि एक राजा ने तीन प्रश्न किए कि सबसे अच्छी सेज मखमली सेज होती है। तो वो घास काटने वाला कहता है कि जब हम अपनी चिंता को प्रभु परमात्मा को समर्पित कर देते हैं तो जंगल में भी नींद आ जाएगी तो वो ही सबसे अच्छी सेज होती है।
दूसरा सबसे श्रेश्ठ व पवित्र जल गंगा का होता है, ऐसा नहीं है जो जल कहीं पर प्यास बुझाा दे वो ही सर्वोत्म जल होता। तीसरा प्रश्न बेशक सबसे मीठा फल आम होता है परंतु सेवा का फल सबसे मीठा होता है। उसकी मिठास गले तक सीमित नहीं होती वो सदैव रहती है।
उन्होंने कहा कि गृहस्थ में रहते हुए सत्गुरू की शिक्षाओं का अनुसरण करते हुए अपने अभावों को भावों में बदलना ही सच्ची भक्ति है। इस अवसर पर स्थानीय मुखी श्री अमरजीत सिंह जी ने बहन सिमरन वर्मा जी, जोनल इंचार्ज, संयोजक, मुखियों व आसपास के क्षेत्र से आए सभी श्रद्वालुओं का आभार व धन्यावाद किया।