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असदुद्दीन ओवैसी ने पीएम नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट में पूजा स्थल अधिनियम का बचाव करने का किया आग्रह

Asaduddin Owaisi, All India Majlis E Ittehadul Muslimeen, AIMIM, AIMIM President, Prime Minister Narendra Modi
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5 Dariya News

हैदराबाद , 19 Oct 2022

Last updated on: Oct 19, 2022, 00:00 IST

एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सुप्रीम कोर्ट में पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 का बचाव करने का आग्रह किया है। इस संबंध में प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में हैदराबाद के सांसद ने कहा कि उन्हें अधिनियम का बचाव करना चाहिए क्योंकि यह भारत की विविधता को बनाए रखता है। 

ओवैसी ने अधिनियम की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के मद्देनजर पत्र लिखा था। शीर्ष अदालत ने कानून पर केंद्र सरकार का रुख पूछा है। सांसद ने लिखा कि संसदीय कानून की संवैधानिकता की रक्षा करना कार्यपालिका का दायित्व है। 

उन्होंने बताया कि यह अधिनियम 15 अगस्त, 1947 को जो पूजा स्थल जिस स्वरूप में थे, उसी स्वरूप की रक्षा के लिए बनाया गया था। ओवैसी ने कहा कि इस तरह के प्रावधान के पीछे का प्राथमिक उद्देश्य भारत की विविधता और बहुलवाद की रक्षा करना था। यह सुनिश्चित करने के लिए था कि स्वतंत्र भारत उन धार्मिक विवादों से ग्रस्त न हो जो समाज में स्थायी विभाजन का कारण बनते हैं। 

उन्होंने कहा कि यह स्पष्ट रूप से भारत के स्वतंत्रता संग्राम के मूल्यों का प्रतिबिंब था। एआईएमआईएम अध्यक्ष ने कहा कि जब इस कानून को संसद में पेश किया गया था, तो इसे समय-समय पर पूजा स्थलों के रूपांतरण से होने वाले सांप्रदायिक विवादों से बचने के लिए आवश्यक उपाय कहा गया था। 

इसे इस उम्मीद के साथ एक कानून के रूप में अधिनियमित किया गया था कि यह अतीत के घावों को भरेगा और सांप्रदायिक सौहार्द और सद्भावना को बहाल करने में मदद करेगा। ओवैसी ने याद दिलाया कि बाबरी मस्जिद विवाद का फैसला करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 1991 के अधिनियम को बनाकर राज्य ने अपनी संवैधानिक प्रतिबद्धता का पालन किया है और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को बनाए रखने के लिए अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन किया था, जो संविधान के बुनियादी ढांचे का हिस्सा है। 

उन्होंने कहा कि संसद ने अधिनियम को सांप्रदायिक सद्भाव और शांति बनाए रखने के एक उपाय के रूप में माना और सुप्रीम कोर्ट ने अधिनियम के निर्माण को संसद का पवित्र कर्तव्य कहा, जिसे संवैधानिक मूल्य के रूप में सभी धर्मों की समानता को संरक्षित और सुरक्षित का जिम्मा राज्य को दिया गया था। 

ओवैसी ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया कि वह कार्यपालिका को ऐसा कोई भी ²ष्टिकोण न लेने दें, जिससे संविधान की भावना प्रभावित हो, जो सुप्रीम कोर्ट के निर्णय में व इस अधिनियम के निर्माण के उद्देश्यों में परिलक्षित होता है। सांसद ने कहा कि शीर्ष अदालत ने पाया कि 'संवैधानिक नैतिकता' की अवधारणा हमारी संवैधानिक व्यवस्था में अंतर्निहित है। 

उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह बुनियादी नियम है, जो संस्थानों को स्वेच्छाचारी होने से रोकता है, लोकतंत्र में व्यक्तियों की गिरावट के खिलाफ चेतावनी देता है, राज्य की शक्ति की जांच करता है और अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों के अत्याचार से बचाता है। उन्होंने कहा कि अब इसका परीक्षण किया जा रहा है। 

मुझे उम्मीद है कि आपके नेतृत्व वाली कार्यकापलिका संवैधानिक नैतिकता के आदर्श को बनाए रखने और 1991 के अधिनियम की रक्षा करने के लिए कार्य करेगी। ओवैसी ने कहा कि अधिनियम इस विचार का प्रतिनिधित्व करता है कि कोई भी इतिहास के खिलाफ अंतहीन मुकदमेबाजी नहीं कर सकता। 

आधुनिक भारत मध्ययुगीन विवादों को हल करने का युद्धक्षेत्र नहीं हो सकता। यह अनावश्यक धार्मिक विवादों को समाप्त करता है और भारत की धार्मिक विविधता की रक्षा करता है। इसलिए मैं आपसे आग्रह करता हूं कि आप इसकी पवित्रता की रक्षा करें। यह एक गंभीर कानून।

 

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