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पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय में पूर्वोत्तर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान विषय पर संगोष्ठी आयोजित

Central University of Punjab, CUPB, Bathinda, Prof Raghvendra P Tiwari
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बठिंडा , 31 May 2026

Last updated on: Jun 01, 2026, 11:02 IST

केंद्रीय विश्वविद्यालय पंजाब (सीयू पंजाब), बठिंडा के नॉर्थ ईस्ट सेल द्वारा शुक्रवार को “भारत के स्वतंत्रता संग्राम में पूर्वोत्तर भारत के योगदान” विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य स्वतंत्रता आंदोलन में पूर्वोत्तर भारत की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करना और उसकी समृद्ध सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विरासत के बारे में जागरूकता बढ़ाना था।

कार्यक्रम की शुरुआत प्रो. के. प्रेमजीत सिंह के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने संगोष्ठी के उद्देश्यों के बारे में जानकारी दी। इसके बाद डॉ. रेबेका देबबर्मा ने मुख्य अतिथि का परिचय कराया। संगोष्ठी के मुख्य अतिथि केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश के पूर्व कुलपति प्रो. कुलदीप चंद अग्निहोत्री थे। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर भारत के स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्रवादी नेताओं का योगदान बहुत महत्वपूर्ण रहा है, लेकिन उन्हें इतिहास में वह पहचान नहीं मिल पाई जिसकी वे हकदार हैं।

उन्होंने लाचित बरफुकन, रानी गैदिनल्यू, कनकलता बरुआ और तिरोत सिंग सियेम जैसे वीरों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन महान व्यक्तित्वों ने अंग्रेजी शासन का डटकर मुकाबला किया और देश की आजादी की लड़ाई को मजबूत बनाया। उन्होंने पूर्वोत्तर भारत की सांस्कृतिक परंपराओं और मूल्यों की भी सराहना की तथा विद्यार्थियों के बीच सांस्कृतिक समझ और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए विश्वविद्यालय के नॉर्थ ईस्ट सेल की प्रशंसा की।

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए केंद्रीय विश्वविद्यालय पंजाब के कुलपति प्रो. राघवेंद्र प्रसाद तिवारी ने कहा कि पूर्वोत्तर भारत ने स्वतंत्रता आंदोलन, सांस्कृतिक विरासत तथा राष्ट्र निर्माण में अमूल्य योगदान दिया है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र के अनेक नायकों और ऐतिहासिक आंदोलनों को अभी भी मुख्यधारा के विमर्श में पर्याप्त स्थान नहीं मिला है। उन्होंने इनके योगदान के दस्तावेजीकरण और व्यापक प्रसार हेतु अधिक अकादमिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।

प्रो. तिवारी ने सांस्कृतिक एवं भाषाई आदान-प्रदान को आपसी समझ और राष्ट्रीय एकीकरण को सुदृढ़ करने का प्रभावी माध्यम बताते हुए कहा कि विश्वविद्यालय ऐसे संवादों के लिए महत्वपूर्ण मंच प्रदान कर सकते हैं। उन्होंने पूर्वोत्तर भारत की समृद्ध मौखिक परंपराओं, स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन की आवश्यकता पर भी बल दिया।

इस अवसर पर आनंदिता सिंह द्वारा लिखित पुस्तक “ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ फ्रीडम स्ट्रगल इन नॉर्थईस्ट ऑफ इंडिया (1498–1947)” का विमोचन भी किया गया। संगोष्ठी में दो तकनीकी सत्र आयोजित किए गए, जिनमें डॉ. रक्तिम पातर, आनंदिता सिंह, डॉ. रिकिल चारमांग, डॉ. एंजेला गंगमेई और डॉ. लुक्रम इंगोचौबा सहित कई विशेषज्ञों ने अपने विचार प्रस्तुत किए।

वक्ताओं ने पूर्वोत्तर भारत के स्वतंत्रता संग्राम, अंग्रेजों के खिलाफ स्थानीय संघर्षों तथा क्षेत्रीय नेताओं और समुदायों की भूमिका पर चर्चा की। कार्यक्रम का समापन विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ हुआ। अंत में डॉ. नाकिबाफेर शांगप्लियांग ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस संगोष्ठी में बड़ी संख्या में शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी और विश्वविद्यालय परिवार के अन्य सदस्य शामिल हुए।

 

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