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20वीं सदी के 'तानसेन' : जब पंडित जसराज के सामने फफककर रो पड़े थे बड़े गुलाम अली खां

Pandit Jasraj, Music, Bade Ghulam Ali Khan
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Armaan

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5 Dariya News

नई दिल्ली , 01 Apr 2026

Last updated on: Apr 02, 2026, 12:23 IST

शास्त्रीय संगीत की दुनिया में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनकी चमक समय के साथ कम नहीं होती, बल्कि और निखरती जाती है। 20वीं सदी के शास्त्रीय संगीत जगत के महान उस्ताद बड़े गुलाम अली खां भी एक ऐसा ही नाम हैं, जिन्हें ‘तानसेन’ भी कहा जाता है। उनकी गायकी, ठुमरी की अनोखी शैली और स्वरों की मधुरता आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में बसी हुई है। 2 अप्रैल को खां साहब की जयंती है।

बड़े गुलाम अली खां पटियाला घराने के गायक थे। उन्होंने खयाल और ठुमरी को नई ऊंचाई दी। उनकी आवाज इतनी सुरीली और लचीली थी कि उन्होंने फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ में तानसेन की आवाज दी थी। उनके गाए गीत जैसे ‘शुभ दिन आयो’ और ‘प्रेम जोगन बनके’ आज भी लोगों की जुबान पर हैं। उनका जन्म 2 अप्रैल 1902 को पाकिस्तान के लाहौर के पास गांव केसुर में हुआ था।

संगीत उन्हें विरासत में मिला था। पिता अली बख्श खां प्रसिद्ध सारंगी वादक थे और चाचा काले खां भी गायक थे। उन्होंने बचपन से ही कड़ी मेहनत की। रोजाना 20 घंटे तक रियाज करते थे। 1947 के बंटवारे के बाद वे भारत आ गए और 1957 में भारतीय नागरिकता प्राप्त की। एक इंटरव्यू में पंडित जसराज ने एक भावुक घटना सुनाई थी। 

साल 1960 की बात है। जसराज मुंबई आए हुए थे। वह डॉक्टर मुकुंदलाल के साथ बड़े गुलाम अली खां से मिलने गए। उस समय खां साहब बीमार थे। जसराज और उनके साथी उनके पैर दबा रहे थे। बातों-बातों में खां साहब अचानक भावुक हो गए और बोले, “मेरा शागिर्द बन जा। तो जसराज ने विनम्रता से जवाब दिया, “चाचा जान, मैं आपसे गाना नहीं सीख सकता।”

खां साहब ने हैरानी से पूछा, “क्यों?“ जसराज ने कहा, “मुझे अपने पिताजी की विरासत को आगे बढ़ाना है।” यह सुनते ही बड़े गुलाम अली खां की आंखें भर आईं और वे फफक-फफककर रो पड़े। उन्होंने कहा, अल्लाह तेरी हर मुराद पूरी करे। जसराज बताया कि इतने बड़े उस्ताद का शिष्य बनने का प्रस्ताव रखना और फिर भावुक होकर रोना उनकी संवेदनशीलता और संगीत के प्रति गहरी निष्ठा को दिखाता था।

जसराज उस समय अपने बड़े भाई पंडित मणिराम के शिष्य थे और मेवाती घराने की परंपरा निभा रहे थे। बड़े गुलाम अली खां ने ठुमरी में पंजाबी अंदाज मिलाया और खयाल की नई शैली विकसित की। उनकी गायकी साधारण लेकिन बेहद प्रभावशाली थी। उन्होंने सारंगी भी बजाई और फिल्मों में गाने से शुरू में मना कर दिया था, लेकिन बाद में ‘मुगल-ए-आजम’ में अपनी आवाज दी।

साल 1962 में खां साहब को संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड और 1962 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। उनका विवाह साल 1932 में अली जीवाई से हुआ था। उनका बेटा मुनव्वर अली खां भी शास्त्रीय गायक थे और पिता के साथ कई कार्यक्रमों में साथ देते थे। उस्ताद बड़े गुलाम अली खां का निधन 25 अप्रैल 1968 को हैदराबाद में हो गया था।

 

Tags: Pandit Jasraj , Music , Bade Ghulam Ali Khan

 

 

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