Wednesday, 22 July 2026

 

 

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जुएल ओराम ने 30 से अधिक जनजातीय कला परंपरा, 75 जनजातीय कलाकारों और 1,000 कलाकृतियों को प्रदर्शित करने वाले जनजातीय कला उत्सव 2026 का उद्घाटन किया

Jual Oram, Bharatiya Janata Party, BJP, Tribes Art Fest 2026, TAF 2026
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नई दिल्ली , 02 Mar 2026

Last updated on: Mar 03, 2026, 13:18 IST

केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री श्री जुएल ओराम ने कहा, “पारंपरिक कला रूपों से लेकर आधुनिक कला तक चित्रकला सदियों से विकसित होती रही है, विलुप्त होने के खतरे से जूझ रही जनजातीय कला को बढ़ावा देने और उसे संरक्षित करने के साथ-साथ जनजातीय विकास को आगे बढ़ाने में मंत्रालय को गर्व महसूस होता है।”

नई दिल्ली में केजी मार्ग पर स्थित त्रावणकोर पैलेस में 2-13 मार्च 2026 तक जनजातीय कला उत्सव 2026 का आयोजन किया जाएगा। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व जिसमें उन्होंने लगातार इस बात पर जोर दिया है कि जनजातीय कला, भाषाएं और परंपराएं भारत की जीवंत सभ्यतागत विरासत का प्रतिनिधित्व करती हैं।

इसको ध्यान में रखते हुए जनजातीय कार्य मंत्रालय राष्ट्रीय राजधानी में जनजातीय कला महोत्सव (टीएएफ) 2026 का आयोजन कर रहा है। केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री श्री जुएल ओराम ने आज त्रावणकोर पैलेस में 12 दिवसीय उत्सव का उद्घाटन किया। उन्होंने जनजातीय समुदायों के सुनियोजित आर्थिक सशक्तिकरण के साथ-साथ जनजातीय विरासत के संरक्षण के प्रति भारत सरकार की प्रतिबद्धता जताई।

संगीत नाटक अकादमी की ओर से वंदे मातरम गायन के साथ समारोह का शुभारंभ हुआ। जनजातीय कार्य मंत्रालय की ओर से फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (एफआईसीसी) और नैशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट (एनजीएमए) के सहयोग से आयोजित इस महोत्सव में 75 से अधिक जनजातीय कलाकार और 30 से अधिक जनजातीय कला परंपराओं का प्रतिनिधित्व करने वाली 1,000 से अधिक कलाकृतियां प्रदर्शित की गई हैं।

यह भारत की जनजातीय दृश्य संस्कृति के सबसे व्यापक राष्ट्रीय कला उत्सव में से एक है। मंच पर उपस्थित गणमान्य हस्तियों में जनजातीय कार्य मंत्री श्री जुएल ओराम; जनजातीय कार्य राज्य मंत्री श्री दुर्गादास उइके; जनजातीय कार्य मंत्रालय की सचिव श्रीमती रंजना चोपड़ा; जनजातीय कार्य मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव श्री मनीष ठाकुर; जनजातीय कार्य  मंत्रालय के संयुक्त सचिव श्री अनंत प्रकाश पांडे; राष्ट्रीय आधुनिक कला गैलरी के महानिदेशक डॉ. संजीव किशोर गौतम और एफआईसीसी एफएलओ की अध्यक्ष और आयुर्वेदंत प्राइवेट लिमिटेड की निदेशक सुश्री पूनम शर्मा शामिल थीं।

इस अवसर पर आधिकारिक टीएएफ कैटलॉग का औपचारिक रूप से अनावरण किया गया, जिसमें भाग लेने वाले कलाकारों, कला परंपराओं और महोत्सव में प्रदर्शित कलाकृतियों का एक सुनियोजित प्रलेखन प्रस्तुत किया गया। फेस्टिवल की दूरदृष्टि, व्यापकता और कलात्मक विविधता को प्रदर्शित करने वाला टीएएफ लॉन्च वीडियो भी जारी किया गया, जो जनजातीय कला उत्सव 2026 के औपचारिक शुभारंभ में एक महत्वपूर्ण क्षण को दर्शाता है।

सांस्कृतिक अनुभाग के तहत मेघालय के शिलांग स्थित खमिह क्रिएटिव सोसायटी ने आदिवासी संगीत परंपराओं का एक भावपूर्ण प्रदर्शन प्रस्तुत किया। इसमें जनजातीय लय और वाद्ययंत्रों को देशभक्ति और समकालीन अभिव्यक्तियों के साथ सहजता से मिश्रित किया गया। दर्शकों ने काफी उत्साह के साथ इसकी सराहना की। इस अवसर पर श्री जुएल ओराम ने कहा कि मंत्रालय जनजातीय सशक्तिकरण के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण अपना रहा है जो सांस्कृतिक संरक्षण को सामाजिक-आर्थिक विकास के साथ जोड़ता है।

उन्होंने विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (पीवीटीजी) के लिए पीएम जनमान, हितलाभ की व्यापकता के लिए धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (डीएजेजीयूए), गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों के विस्तार और टीआरआईएफईडी के माध्यम से मजबूत बाजार संबंधों सहित प्रमुख पहलों पर प्रकाश डाला।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जनजातीय कला उत्सव जैसे मंच संरचित बाजार पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करके कलाकारों को संग्रहकर्ताओं, दीर्घाओं, कॉरपोरेट्स, डिजाइन संस्थानों और नागरिकों के साथ जोड़कर प्रतीकात्मक उत्सव से आगे बढ़ते हैं, जिससे सांस्कृतिक विरासत को स्थायी और महत्वाकांक्षी आजीविका में बदल दिया जाता है।

केंद्रीय जनजातीय कार्य राज्य मंत्री श्री दुर्गादास उइके ने कहा कि ऐसे उत्सव जनजातीय समुदायों को अपनी विरासत और कलात्मक उत्कृष्टता को अपने तरीके से प्रस्तुत करने के लिए प्रामाणिक मंच प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा कि कलाकारों और व्यापक संस्थानों के बीच पारस्परिक जुड़ाव सांस्कृतिक आत्मविश्वास को मजबूत करता है, इसकी पहुंच बढ़ाता है और सामुदायिक स्वामित्व पर आधारित सम्मानजनक आजीविका के अवसर सृजित करता है।

जनजातीय कार्य मंत्रालय की सचिव श्रीमती रंजना चोपड़ा ने इस बात पर जोर दिया कि जनजातीय कला महोत्सव समानता, गरिमा और स्थिरता के आधार पर जनजातीय कला को बढ़ावा देने के माध्यम से नीति को व्यवहार में बदलता है। उन्होंने कहा कि भारत का जनजातीय समाज गहरी जड़ों वाली ज्ञान प्रणालियों, पारिस्थितिक ज्ञान और पीढ़ी दर पीढ़ी निरंतरता को दर्शाने वाली अनूठी कला परंपराओं को संरक्षित करते हैं।

टीएएफ इन परंपराओं की राष्ट्रीय मान्यता को मजबूत करता है, साथ ही पहचान की पुष्टि और आर्थिक सशक्तिकरण के लिए सार्थक अवसर पैदा करता है। टीएएफ का उद्देश्य ऐसे निष्पक्ष बाजार परिदृश्य तैयार करना है जहां जनजातीय कलाकारों को उनकी कलाकृतियों का उचित मूल्य मिल सके। कला खरीदारों, दीर्घाओं, कॉरपोरेट भागीदारों, संस्थानों और नागरिकों के साथ प्रत्यक्ष संपर्क स्थापित करके यह महोत्सव बड़े पैमाने पर बाजार संबंधों को सुगम बनाता है।

इस प्रदर्शनी में वार्ली (महाराष्ट्र) गोंड (मध्य प्रदेश), भील (मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात), डोकरा (पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, ओडिशा), सोहराई (झारखंड), कोया (तेलंगाना, आंध्र प्रदेश), कुरुम्बा (तमिलनाडु), सौर (ओडिशा), बोडो (असम और उत्तर-पूर्व), उरांव (झारखंड, छत्तीसगढ़), मंडना (राजस्थान, मध्य प्रदेश), गोदना (बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़) और पूर्वोत्तर के बांस शिल्प जैसी कला परंपराएं प्रदर्शित की गई हैं, जो क्षेत्रीय विविधता और सभ्यता की निरंतरता दोनों का प्रदर्शन करती हैं।

यह मानते हुए कि जनजातीय कला स्थिरता और सद्भाव का प्रतीक है, जो आधुनिक भारत के लिए महत्वपूर्ण मान्यता है, इस महोत्सव में जनजातीय और समकालीन कलाकारों के बीच समकालीन अभिव्यक्ति और सहयोगात्मक कार्य भी शामिल हैं, जिसमें उत्तर-पूर्व की मजबूत भागीदारी भी शामिल है। प्रदर्शनी के अलावा टीएएफ में जनजातीय कला पुनरुद्धार और स्थायी भविष्य, समकालीन परिवेश में जनजातीय कला और आजीविका एवं बाजार संबंध जैसे विषयों पर पैनल चर्चाएं भी शामिल हैं।

इस कार्यक्रम में सहभागितापूर्ण कार्यशालाएं, जनजातीय कलाओं के माध्यम से कहानी सुनाना, सचित्र वार्ताएं और लाइव प्रदर्शन भी शामिल हैं। देश भर से कला की पढ़ाई कर रहे 100 से अधिक जनजातीय छात्रों को सुनियोजित भ्रमण, वरिष्ठ जनजातीय कलाकारों के साथ मार्गदर्शन सत्र और वास्तविक रचनात्मक प्रक्रियाओं से परिचित कराया जा रहा है।

टीएएफ 2026 का एक विशेष आकर्षण प्रोजेक्ट खुम - रचनात्मकता में निहित है, जिसकी अवधारणा सुश्री जय मदन ने जनजातीय कलाकारों के साथ मिलकर तैयार की है। कोकबोरोक (त्रिपुरा) भाषा में 'खुम' का अर्थ फूल होता है, जो खिलने, जीवंतता और पूर्ण रचनात्मक अभिव्यक्ति का प्रतीक है। एक सहभागी स्थापना के तहत डिजाइन की गई इस परियोजना में जनजातीय महिला कलाकार सामूहिक रूप से एक साझा दृश्य ढांचे को रंग, रूपांकन और जीवंत परंपरा के माध्यम से एक जीवंत कलाकृति में परिवर्तित करती हैं।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की भावना से प्रेरित होकर प्रस्तुत की गई यह कलाकृति महिलाओं की रचनात्मकता, नेतृत्व और सांस्कृतिक स्मृति को प्रमुखता देती है और इस बात की पुष्टि करती है कि जब महिलाएं सृजन करती हैं तो संस्कृति फलती-फूलती है। इस 12 दिवसीय कार्यक्रम में सुनियोजित भ्रमण, लाइव पेंटिंग प्रदर्शन, सचित्र वार्ता, विषयगत पैनल चर्चा, कलाकार-छात्र मार्गदर्शन सत्र और जनजातीय संगीत और नृत्य परंपराओं को प्रदर्शित करने वाले दैनिक सांस्कृतिक प्रदर्शन शामिल हैं।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में जनजातीय महिला कलाकारों के बीच नेतृत्व और उद्यमिता पर प्रकाश डाला जाएगा। आगंतुकों के लिए समावेशी कार्यशालाएं, जिनमें विशेष आवश्यकता वाले व्यक्तियों के लिए सत्र भी शामिल हैं, सामुदायिक भागीदारी को और मजबूत करेंगी। मंत्रालय का उद्देश्य जनजातीय कला और संस्कृति को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक मान्यता दिलाना, प्रत्यक्ष बाजार पहुंच के माध्यम से आजीविका के अवसरों को मजबूत करना और जनजातीय कला को भारत की रचनात्मक अर्थव्यवस्था के एक गरिमापूर्ण और स्थायी स्तंभ के रूप में स्थापित करना है।

3 मार्च 2026 से आम लोगों के लिए खुला जनजातीय कला उत्सव 2026 प्रधानमंत्री के विकसित भारत @ 2047 के विजन के अनुरूप है और समावेशी विकास, सांस्कृतिक संरक्षण और जनजातीय समुदायों के सतत आर्थिक सशक्तिकरण के लिए भारत सरकार की प्रतिबद्धता को मजबूत करता है। मंत्रालय सभी हितधारकों को उत्सव के साथ गहराई से जुड़ने, सीधी खरीद के माध्यम से जनजातीय कलाकारों का समर्थन करने और जनजातीय समुदायों के लिए सांस्कृतिक समानता और समृद्धि को आगे बढ़ाने में योगदान करने के लिए आमंत्रित करता है।

 

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