ज्वालामुखी में आज भाजपा प्रत्याशी रमेश धवाला ने रैली के बहाने अपनी ताकत का अहसास कराया। भले ही भीड़ को देखकर वोट का आकलन नहीं किया जा सकता हो,लेकिन धवाला ने आज भीड़ जुटाकर कांग्रेसी नेताओं को सोचने पर जरूर मजबूर कर दिया। धवाला ने कांग्रेसी खेमें में सेंध लगाते हुये संजय विरोधी कांग्रेसयिं को अपने काफिले में जोड़कर कांग्रेस प्रत्याशी के लिये भीतरघात के खतरे की संभावनाओं को भी बढ़ा दिया है। दरअसल डिलिमिटेशन के बाद ज्वालामुखी की तस्वीर बदल गई है। ज्वालामुखी कांगड़ा संसदीय क्षेत्र में है नई बनी तस्वीर में पुराने ज्वालामुखी के पोलिंग बूथ नये बने हल्के देहरा में चले गये हैं। करीब साढ़े बारह हजार मतदाता इसी इलाके में हैं, जिनमें ज्यादातर ओ बी सी समुदाय से हैं। दूसरी ओर थुरल हल्के से बारह पोलिगं बूथ जिनमें बारह हजार से अधिक मतदाता हैं, ज्वालामुखी में आ गये हैं। चंगर इलाके की खुंडियां तहसील का यह इलाका राजपूत बाहुल्य है। यही नहीं करीब चार हजार मतदाता जो कि देहरा नगर पंचायत में हैं ज्वालामुखी से कटकर देहरा का हिस्सा बन गये हैं। डिलिमिटेशन के बाद ज्वालामुखी विधानसभा क्षेत्र में 65,000 मतदाता हो गये हैं, जिनमें 27,00 राजपूत वोटर हैं तो साढ़े सोलह हजार ओ बीसी समुदाय के और करीब दस हजार हरिजन व आठ हजार ब्राहम्ण और अन्य समुदाय के साढ़े तीन हजार मतदाता जिनमें गुज्जर समुदाय प्रमुख हैं। चुनावी अभियान इलाके में पूरे यौवन पर है।
दोनों ही दलों के प्रत्याशी से लेकर छोटे बड़े नेता बूथ स्तर पर बैठकें कर रहे हैं। लेकिन इलाके का वोटर खामोश भले ही हो परन्तु कहीं कहीं रमेश धवाला व कांरगेस प्रत्याशी संजय रतन के व्यक्तित्व को लेकर चरचा सुनने को मिल जाती है। जिसमें लोग दोनें नेताओं की तुलना करते हैं। धवाला को इस बार प्रचार के पहले दौर में जो मुशिकलें आईं वह अब दूर हो गईं लगती हैं। उन्होंने न केवल रूठोंको मनाने में कामयाबी हासिल की बल्कि कांग्रेसी खेमें को भी तारपीडो कर दिया है। कांग्रेस ने इस बार वीरभद्र सिंह की पैरोकरी की वजह से संजय रतन को टिकट मिला है। भाजपा ने प्रदेश के खाद्य आपूर्ति मंत्री रमेश धवाला को भारी विरोध के बावजूद रमेश धवाला को ही टिकट दिया है। तृणमूल कांग्रेस ने मधु गुप्ता को प्रत्याशी बनाया है। वहीं बसपा के हाथी पर प्रकाश चंद मैदान में हैं। तो भाजपा के बागी मोहिन्दर सिंह भी मैदान में हैं। लेकिन मुकाबला रमेश धवाला व संजय रतन के बीच ही है। जिससे मामला रोचक हो गया है। संजय रतन के मैदान में उतरने से रमेश धवाला के इस बार पसीनें छूट रहे हैं। उनकी सल्तनत को इस बार खासी चुनौती मिल रही है।
व चुनावी मैदान में इस बार वह हालात नहीं हैं, जो पहले होते थे। न तो ओ बी सी मतदाताओं का ज्यादा प्रभाव है। न ही कांरगेस संगठन में कोई आपसी लड़ाई । मुकाबला सीधा है। जिससे मुकाबला दिनोंदिन नाजुक होता जा रहा है। अपने खिसकते जनाधार व राजपूत मतदाताओं को रिझाने के लिये एन वक्त पर बीते दिन यहां धूमल को बुलाना पड़ा था। दरअसल इलाके का ब्राहम्ण, बनिया व राजपूत वोटर आपस में इस बार संगठित हो रहा है। हाल यही रहा तो धवाला का चुनाव जीतना मुश्किल हो जायेगा। धवाला को लगता है कि हाल रहा तो आखिरी वक्त पर तिलक तरवाजू व तलवार का नारा उनके लिये परेशानी पैदा करेगा। यही वजह है कि धवाला ने आखिरी वक्त पर राजपूत नेताओं को मनाने व अपने साथ चलाने कर कोशिशें शुरू कर दी हैं। ज्वालामुखी में इस बार कोई खास मुद्दा नहीं है। लेकिन कांग्रेस रमेश धवाला के खिलाफ कोई भी मुद्दा भऩाने में पूरी तरह नाकाम रही है। वहीं धवाला अंतिम दौर में तरह सक्रिय हो गये हैं। धवाला के साथ उनकी जाति का वोटर खुलकर आता है। व चंगर बैल्ट में राजपूत मतदाता विभाजित होते हैं तो ज्वालामुखी नगर का पांच हजार मतदाता प्रत्याशी की हार जीत तय करेगा।वहीं को हर हाल में नगर का वोट व ब्राहम्णि समुदाय को अपने साथ रखना होगा।