हिमाचल में बेटी की शादी.. बिष्टी से लेकर शादी के मंडप तक

Friday, 05 June 2026

 

 

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हिमाचल में बेटी की शादी.. बिष्टी से लेकर शादी के मंडप तक

देवभूमि की बेटी की शादी... खुशी के दिनों में नम आंखों के आंसुओं का एक शानदार सफर

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हिमाचल प्रदेश , 16 Apr 2022

Last updated on: Apr 16, 2022, 00:00 IST

अनुपम सारटा: घर में बेटा पैदा हो या बेटी, माहौल एक जैसा ही रहता है। ऐसा नजारा आपको देवभूमि हिमाचल प्रदेश में ही देखने को मिलेगा। राज्य भले ही छोटा है लेकिन लोगों की सोच बड़ी है। यहां बेटे और बेटी में कभी अंतर था ही नहीं। जितनी घूमधाम से लड़के की शादी होती है उनती ही रौनक बेटी की शादी में भी होती है। बेटी की शादी हर मां-बाप का सपना होता है और जिम्मेदारी भी। लेकिन इससे हटके मां बाप को बेटी की शादी के लिए मजबूत होना पड़ता है, चाहे वो आर्थिक रूप से हो या भावनात्मक रूप से। लड़की जब मंडप में बैठती है तो उसके लिए सभी रिश्तों के मायने बदल जाते हैं। वो अपना घर, परिवार, मां-बाप, भाई-बहन सब कुछ छोड़ कर दूसरे के घर जाती है। लेकिन कभी न कभी ये दिन आएगा ये उस लड़की को भी पता होता है। शादी का सपना वो बहुत छोटी उम्र से देखना शुरू कर देती है। तो आइए मैं आपको बताता हूं कि देवभूमि हिमाचल में शादियां कैसी होती है, खास तौर पर एक बेटी की शादी



हमारे हिमाचल में जो इंसान रिश्ता लेकर घर आता है उसे बिष्टु कहते हैं। बिष्टु पंडित भी हो सकता है या फिर कोई रिश्तेदार भी। घरवालों को अगर रिश्ता पसंद आ जाए तो कुंडलियां मिलाई जाती है। कुंडल मिलने के बाद लड़का और लड़की आपस में मिलते हैं। एक दूसरे को जानने समझने के बाद अगर लड़का लड़की एक दूसरे को पसंद आ जाते हैं तो रिश्ता पक्का हो जाता है। ऐसा सिर्फ अरेंज मैरेज में होता है। लव मैरेज में लड़के लड़की को मिलने की जरूरत नहीं होती।



हिमाचल के गांव में शहरों का ज्यादा असर नहीं हुआ है। गांव की शादियां आज भी देखने लायक है। हालांकि शहरों में थोड़ा मॉडर्न तरीके से पार्टी रख लेते हैं और अपनी सहूलियत के अनुसार रस्म पूरी करते हैं। लेकिन गांव की शादियों का माहौल ही कुछ और होता है। गांव में शादी से कुछ महीने पहले लड़के के पापा, चाचा, ताया और मामा लड़की के घर जाते हैं और मुंह दिखाई के तौर पर सोने की कोई चीज देकर रिश्ता पक्का कर लेते हैं। इसमें मां को जाने की अनुमति नहीं होती। 


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लड़की के घर में सबका आदर सत्कार किया जाता है और गांव को कुछ करीबियों के लिए भोज का आयोजन भी किया जाता है। दोनों परिवारों और पंडितों की आपसी सहमति के साथ शादी की तारीख तय की जाती है। लड़की को शगुन में कपड़े, सोना और अन्य सामान दिया जाता है। इसके बाद लड़के वाले वापिस घर पहुंचते जाते हैं। कुछ दिनों बाद लड़कीवाले  लड़के के घर आते हैं और शादी की तारीख बताते हैं। ये बतौर परम्परा किया होता है। उसी दिन लड़की वाले भी लड़के को बतौर शगुन चांदी का सिक्का देते है। लड़की के घर से आए मेहमानों की आदर खातिर की जाती और उनको खाना खिला कर वापिस भेजा जाता है।


रिश्ते की बात पूरे गांव में आग की तरह फैल जाती है और सभी लड़की के घरवालों को मुबारकबाद देने घर पहुंच जाते हैं। सही शब्दों में कहूं तो इस दिन के बाद से घर में शादी की तैयारियां शुरू हो जाती है। इन तैयारियों के लिए एक दिन तय हो जाता है और उस दिन तक सब तैयारियां खत्म करनी होती हैं। उसके लिए सब लोग अपनी अपनी तरफ से पूरी कोशिश में लग जाते हैं। 



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शादी की खरीदारी


पंडित से शुभ मुहूर्त पूछा जाता है ताकि लड़की के लिए सोना खरीदना शुरू किया जा सके। उसके अलावा बहुत सारी खरीदारी भी करनी होती है। लड़की वालों के लिए तो बहुत ज्यादा काम होता है क्योंकि उनको अपने रिश्तेदारों के साथ साथ लड़के वालों का भी ध्यान रखना होता है। गांव की सभी औरतों के लिए सूट खरीदने होते हैं वहीं दूल्हे के लिए भी सोना चांदी से लेकर सूट-बूट तक खरीदना होता है। ये कोई दहेज या फिर मजबूरी नहीं है ये एक शगुन ही है जो सदियों से चला आ रहा है और लोग आज तक इस परंपरा को दिल से निभा रहे हैं। इस खरीदारी में कम से कम 15 से 20 लाख तक खर्चा आ जाता है। सोने की खरीदारी को सबसे ज्यादा अहमियत दी जाती है क्योंकि इसे रुतबे से जोड़कर देखा जाता है। जिसने ज्यादा सोना खरीदा उसका उतना बड़ा रुतबा। 


शादी का निमंत्रण (न्यूंदा)

हमारे हिमाचल में शादी में सबसे पहला निमंत्रण अपने कुलदेवता को दिया जाता है और उसके बाद मामा को दिया जाता है। कुछ जगह पर निमंत्रण देने के लिए गेहूं के आटे में गुड़ और यीस्ट मिलाकर पूड़ी की तरह रोटियां बनाई जाती हैं। इनको बिलासपुर, हमीरपुर की तरफ बबरू अंर कांगड़ा में मिठड़ू कहते हैं लेकिन शिमला में ऐसा नहीं होता। इस सारे कार्यक्रम के बाद ही और नाते रिश्तेदारों को न्यौता दिया जाता है। जब कोई न्यौता देने आता है तो उनको टीका और रूमाल या सुहागी के साथ विदा किया जाता है।


लड़की के लिए सामान

शादी करके जब लड़की अपने ससुराल जाती है तो ससुराल वाले और उनके गांव वाले सबसे पहले यही देखते हैं कि लड़की क्या क्या लेकर आई है। लड़की वाले पूरी कोशिश करते हैं कि लड़के वालों को अच्छे-अच्छे उपहार दिए जाएं। रोज लड़की के घर में रात में बैठकर घर की महिलाएं कपड़े और सुहागियां पैक कर रहीं होती हैं। इस बीच दान-दहेज की भी खरीदारी की जाती है। वैसे दहेज़ पहले जमाने में इसलिए भी दिया जाता था क्योंकि लड़की नई गृहस्थी बसाने जा रही होती है तो उसको ये सब चीजों की जरूरत पड़ेगी। यह सोचकर ही दहेज़ दिया जाता था लेकिन कुछ लोगों ने इसे अभिशाप बना दिया। लेकिन हमारे हिमाचल में इसका ज्यादा चलन नहीं है। जिसको अपनी खुशी से जो देना है वो देता है। किसी के ऊपर कुछ थोपा नहीं जाता और ना ही कोई डिमांड की जाती है। वैसे अक्टूबर के महीने में मेरी खुद की बहन की शादी हुई है जिनमें दहेज़ के नाम पर कुछ भी लेन-देन नहीं हुआ। 


शादी की रस्में-

हल्दी, महंदी, तेल बटना और नथ बालू


शादी से पहले लड़की को नहलाया जाता है और फिर उसके चेहरे, हाथ और पैरों में हल्दी और चंदन का लेप लगाया जाता है। सबसे पहले ये काम लड़की के मां-बाप ही करते हैं। ये थोड़ा साथ भावुक माहौल बना देता है। सभी की आंखों में आंसू आ जाते हैं। माता पिता के बाद बारी आती है चाचा-चाची, बुआ, बहने और दूसरी सुहागिनों की। उसके बाद लड़की को सुहागियां लड़की को नहलाती है और उसके बाद महंदी की रस्म शुरू हो जाती है। इन रस्मों के बीच लड़की को पीले रंग के कपड़े पहनाए जाते हैं ताकि उसे किसी की नजर ना लगे।   


मामा स्वागत-


हमारे हिमाचल में मुख्यता शादियों की रस्में दो दिन तक चलती है। पहला दिन मामा का होता है। इस दिन सिर्फ दुल्हन के मामा का स्वागत किया जाता है। मामा नाचते गाते (जिसको नाटी कहा जाता है) अपने गांव वालों के साथ लड़की के घर आते हैं और उनका जोरों शोरों, ढोल नगाड़ों के साथ स्वागत किया जाता है। इसके बाद रातभर नाटी चलती है। 

बारात का स्वागत(मिलणी)-

अब समय आता है बारात के स्वागत का। बारात जब आती है तो सबसे पहले दोनों तरफ से सम्बधियों की मिलणी होती है। हार पहनाकर स्वागत किया जाता है और उपहार भेंट किए जाते हैं। बारातियों को लिए चाय-नाश्ते के बाद खाना खिलाया जाता है। जिस जगह बारात के ठहरने का इंतजाम किया जाता है उसे डेरा कहते हैं। जिस गांव में बारात आती है उस समय पूरा गांव यह नहीं सोचता कि शादी एक घर में है, पूरे गांव के लोग अपने घर के जैसे बारत में आए मेहमानों की आदर खातिर करने में जुट जाते हैं। कोई लोगों को चाय पिला रहा होता है तो कोई खाना खिला रहा होता है। कोई बैठने के लिए कुर्सी का इंतजाम कर रहा होता है तो कोई सोने वालों के लिए बिस्तर का। हिमाचल में आज भी परंपरागत तरीके से सामुदायिक जीवन जिंदा है।

खानी-पीनी-

हमारे हिमाचल में बिना शराब और नॉनवेज के शादियां होती ही नहीं है। अगर किसी शादी में ये दोनों चीजें नहीं होती तो घरवालों को लोगों को ताने सुनने को मिलते हैं। हालांकि हिमाचल में कुछ ऐसे गांव भी हैं जहां लड़कियों की शादी में ना तो मीट खिलाया जाता है और ना ही शराब पिलाई जाती है। लेकिन हमारे इलाके में तो लड़का हो या लड़की दोनों की शादियों में जम कर शराब दी जाती है और किनौरी बकरे का मीट खिलाया जाता है। किनौरी बकरे बकरों की एक वैराइटी है जिन्हें लोकल बकरे भी कहा जाता है। इनके मांस में एक अलग ही स्वाद होता है क्योंकि ये पहाड़ियों पर ही पलते हैं और जड़ी बूटियां खाकर बड़े होते है। शादी में रात भी खाने पीने का माहौल रहता है और नाटी लगती है। 


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नाटी(डांस)-

नाटी हिमाचल का फोक डांस है लेकिन इलाके के साथ साथ नाटी के स्टाइल में भी बदलाव आ जाता है। शादी में आए लोग केवल नाटी करना ही पसंद करते हैं। ढोल नगाड़ो की धुन पर लोग मस्ती में पूरी रात नाचते हैं। शादियों में डीजे का इंतजाम भी किया जाता है लेकिन ये डीजे भी सिर्फ नाटी वाले गाने ही बजाता है। अगर गतली से वो बॉलीवुड के गाने बजा देता है तो लोग नाखुश हो जाते हैं और नाचना ही बंद कर देते हैं। 

वेदी (फेरे)-

लड़की को मंडप तक उसके मामा अपनी गोद में उठाकर ले जाते हैं। इस रस्म के दौरान लड़की के पैर जमीन को नहीं छूने चाहिए। यदि ऐसा होता है तो ये अपशकुन माना जाता है। दुल्हन के मंडप पर पहुंचने के बाद ही फेरों की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। कुछ वचनों के लेने देन और 7 फेरों के बाद दुल्हन दूल्हे की हो जाती है। उस क्षण के बाद उसके लिए उसका पति यानि सुहाग उसके माता पिता से पहले हो जाता है।सिरगूंदी-

खाने के बाद सिरगूंदी की रस्म होती है। उसके लिए जब दुल्हा अंदर जाता है तो लड़की की बहनें द्वार रोकर जीजा से पैसे लेतीं हैं। दुल्हा लड़की को साज संवार का सामान देता है और लड़की को विदाई के लिए तैयार किया जाता है। लड़की की बहनें जीजा के साथ हंसी मजाक करती हैं।

विदाई-

अब समय आता जिस घड़ी पर कोई भी अपने आंसुओं को नहीं रोक पाता। उस समय नए रिश्ते जुड़ने की खुशी भी होती है और एक रिश्ता बिछड़ने का दुख भी होता है। जो नन्हीं सी परी घर की लाडली थी वो अब घर में मेहमान बनकर आया करेगी। लड़की और उसके करीबी सब रो रहे होते हैं। इस खुशी और गम का माहौल कुछ ऐसा होता है जब कोई समझ नहीं पाता कि खुशी को जाहिर करे या गम में गमगीन हो। इस तरह एक नए रिश्ते को दोनों ही परिवार खुशी खुशी स्वीकार कर लेते हैं।


 

Tags: Himachal Pradesh , Marriage , Tradition

 

 

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