कांग्रेस राज में ज्वालामुखी के सरकारी अस्पताल को बदलने के फैसले को लेकर सवाल उठते रहे हैं।अब सरकार बदली है तो एक बार फिर अस्पताल का मामला गरमा गया है। स्थानीय विधायक रमेश धवाला चुनावी वायदे के तहत अस्पताल को वापिस पुरानी जगह लाने की कोशिशों में जुटे हैं। उस समय नियंत्रक एवं महालेखाकर (कैग) ने भी सरकार के इस फैसले पर सवाल उठाये थे। दरअसल प्रदेश सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन से ज्वालामुखी मंदिर न्यास को करीब साढ़े छह करोड़ रुपये का अनुचित लाभ पहुंचा दिया। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) को यात्री निवास भवन के साथ बदलने के बहाने ऐसा किया गया। इन दोनों को बदलने के लिए कोई समझौता भी नहीं किया गया है। स्वास्थ्य विभाग ने ऐसे भवन में सीएचसी को चलाने के लिए फैसला ले लिया जहां ऑपेरेश्न थियेटर आदि की नाममात्र सुविधा भी नहीं थी। अधिकारियों ने तर्क दिया कि सरकार के स्तर पर यह फैसला लिया गया है। हालांकि ऐसा करना इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टेंडर्ड के मापदंडों का उल्लंघन है। नियंत्रक एवं महालेखाकर (कैग) बताती है कि फरवरी 2014 से मार्च 2015 तक मुख्य चिकित्सा अधिकारी तथा उपायुक्त कांगडा ने पुराने भवन के पास सीएचसी बनाने के लिए ज्वालामुखी के लिए 2.49 करोड़ रुपये का फंड स्वीकृत किया। वहीं, 2.35 करोड़ रुपये मार्च 2009 से अक्टूबर 2012 के बीच पहले से ही लोक निर्माण विभाग के पास जमा थे। काम शुरू करने के साथ ही सीएचसी के साथ खंड चिकित्सा अधिकारी का कार्यालय अस्थायी तौर पर ज्वालामुखी मंदिर न्यास के यात्री निवास भवन में बदलने का फैसला लिया गया। यह भवन वर्ष 1997 में बना है। यह निर्णय महज एक ऐसी कमेटी की सिफारिशों पर हुआ जो फरवरी 2013 में बनी थी।