Monday, 06 July 2026

 

 

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डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि मानवीय बुद्धिमत्ता को गवर्नेंस में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का नेतृत्व करना चाहिए

उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता को विकसित भारत 2047 के लिए एक आवश्यक टूल बताया

Dr Jitendra Singh, Bharatiya Janata Party, BJP, Jaipur
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जयपुर , 02 Jul 2026

Last updated on: Jul 03, 2026, 13:06 IST

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने एक ऐसे गवर्नेंस मॉडल का आह्वान किया है, जहां प्रौद्योगिकी मानवीय बुद्धिमत्ता, नैतिकता और जवाबदेही द्वारा निर्देशित हो। उन्होंने कहा कि मानव-नेतृत्व वाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता भारत की 2047 तक की यात्रा में निर्णायक शक्ति होगी।

जयपुर में आयोजित 29वें राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस सम्मेलन (एनसीईजी) के पुरस्कार सत्र को संबोधित करते हुए मंत्री महोदय ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब विकल्प का विषय नहीं रह गया है, बल्कि गवर्नेंस का एक अनिवार्य घटक बन गया है। उन्होंने कहा कि असली चुनौती कृत्रिम बुद्धिमत्ता स्वयं नहीं है, बल्कि यह है कि क्या सरकारों के पास नागरिकों को हर प्रौद्योगिकी संबंधी हस्तक्षेप के केंद्र में रखते हुए, इसे जिम्मेदारी से लागू करने की दूरदर्शिता और परिपक्वता है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत का डिजिटल परिवर्तन मानव निर्णय लेने की प्रक्रिया को मशीनों से बदलने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि सार्वजनिक संस्थानों को ऐसी प्रौद्योगिकियों से सशक्त बनाने की प्रतिबद्धता से प्रेरित है जो पारदर्शिता, जवाबदेही, दक्षता और सेवा वितरण में सुधार लाती हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य के शासन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की गति और विश्लेषणात्मक क्षमताओं को मानवीय विवेक, संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक जवाबदेही के साथ जोड़ना होगा, यह सुनिश्चित करते हुए कि प्रौद्योगिकी सार्वजनिक संस्थानों या सिविल सेवकों की भूमिका को कम किए बिना शासन को मजबूत करे।

इस पुरस्कार समारोह के साथ प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग (डीएआरपीजी), इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (एमईटीआई) और राजस्थान सरकार द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित 29वें राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस सम्मेलन का समापन हुआ। "विकसित भारत 2047: एआई-सक्षम, डेटा-संचालित और सुरक्षित डिजिटल गवर्नेंस" विषय पर आयोजित इस सम्मेलन में देश भर से नीति निर्माता, वरिष्ठ प्रशासक, प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ, नवप्रवर्तक, उद्योगपति, शोधकर्ता और स्थानीय सरकारों के प्रतिनिधि भारत की डिजिटल शासन यात्रा के अगले चरण पर विचार-विमर्श करने के लिए एकत्रित हुए।

पुरस्कार समारोह में राजस्थान के मुख्य सचिव श्री वी. श्रीनिवास, डीएआरपीजी की सचिव श्रीमती निवेदिता शुक्ला वर्मा, राजस्थान के कैबिनेट मंत्री कर्नल राजवर्धन सिंह राठौर, सांसद श्रीमती मंजू शर्मा, केंद्र और राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारी और विशिष्ट प्रतिनिधि उपस्थित थे। राष्ट्रीय सम्मेलन की मेजबानी के लिए राजस्थान सरकार को बधाई देते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की उत्साहपूर्ण भागीदारी प्रौद्योगिकी-आधारित लोक प्रशासन में सरकारों के बढ़ते विश्वास को दर्शाती है।

उन्होंने राज्य सरकार द्वारा दिए गए पूर्ण सहयोग की सराहना की और कहा कि यह सम्मेलन "संपूर्ण सरकार" के दृष्टिकोण का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहां केंद्र, राज्य, शिक्षाविद, उद्योग और नागरिक समाज मिलकर भविष्य के शासन सुधारों को आकार देने में योगदान देते हैं। उन्होंने आगे कहा कि तेजी से बदलती प्रौद्योगिकी और सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप शासन प्रणाली के निर्माण के लिए ऐसे सहयोगात्मक मंच आवश्यक हो गए हैं।

ई-गवर्नेंस पर राष्ट्रीय सम्मेलन के विकास को याद करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार ने जानबूझकर प्रमुख गवर्नेंस सम्मेलनों को नई दिल्ली से बाहर आयोजित करने का निर्णय लिया है, ताकि सुधार पहल वास्तव में राष्ट्रीय स्वरूप की हो सकें। उन्होंने कहा कि विभिन्न क्षेत्रों में इन सम्मेलनों के आयोजन से भागीदारी बढ़ी है, राज्यों में स्वामित्व की भावना मजबूत हुई है और सरकारों को एक-दूसरे के अनुभवों से सीधे सीखने का अवसर मिला है।

उन्होंने आगे कहा कि इसी तरह की पहल को बाद में कई अन्य मंत्रालयों और वैज्ञानिक संस्थानों में भी अपनाया गया है, जिससे सरकार, हितधारकों और नागरिकों के बीच मजबूत जुड़ाव बना है और नवाचार के राष्ट्रीय इकोसिस्टम का विस्तार हुआ है। सम्मेलन के विषय का उल्लेख करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि यह प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के विकसित भारत 2047 के विजन से मेल खाता है, जहां प्रौद्योगिकी समावेशी विकास और सुशासन के साधन के रूप में कार्य करती है।

उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में सरकार के शासन सुधार लगातार "अधिकतम शासन, न्यूनतम सरकार" के सिद्धांत द्वारा निर्देशित रहे हैं, जिसमें डिजिटल प्रौद्योगिकियों ने अधिक पारदर्शिता, त्वरित सेवा वितरण और बढ़ी हुई सार्वजनिक जवाबदेही को सक्षम बनाया है। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा-संचालित प्रशासन और सुरक्षित डिजिटल प्लेटफॉर्म अब नागरिकों की आकांक्षाओं के प्रति संवेदनशील शासन प्रणाली बनाने के अभिन्न अंग हैं।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को मानवीय उत्तरदायित्व के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि शासन को सशक्त बनाने वाले साधन के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, "असली सवाल सिर्फ कृत्रिम बुद्धिमत्ता का नहीं है; सवाल यह है कि हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करने में कितने बुद्धिमान हैं।" उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत को एक ऐसा गवर्नेंस मॉडल विकसित करना होगा, जहां मानव-नेतृत्व वाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता लोक प्रशासन के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत बने।

उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी को मानवीय क्षमताओं को बढ़ाना चाहिए, संस्थागत विश्वसनीयता को मजबूत करना चाहिए और नागरिकों के अनुभव को बेहतर बनाना चाहिए, साथ ही नैतिकता, पारदर्शिता और जनविश्वास पर दृढ़ता से आधारित रहना चाहिए। डॉ. जितेंद्र सिंह ने नीति निर्माताओं से आग्रह किया कि वे विकसित भारत 2047 को वर्तमान की सीमाओं के बजाय भविष्य के परिप्रेक्ष्य से देखें।

पिछले दो दशकों में प्रौद्योगिकी ने जिस गति से रोजमर्रा की जिंदगी को बदल दिया है, उस पर ध्यान दिलाते हुए उन्होंने कहा कि कई ऐसे नवाचार जिन्हें कभी अपरिहार्य माना जाता था, थोड़े ही समय में अप्रचलित हो गए हैं। इसलिए, शासन प्रणाली को केवल वर्तमान की वास्तविकताओं के आधार पर तैयार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक संस्थान, प्रशासनिक व्यवस्थाएं और यहां तक ​​कि सिविल सेवकों की भूमिका भी उभरती प्रौद्योगिकियों के साथ-साथ विकसित होती रहेगी। 

2047 के लिए शासन प्रणाली तैयार करने के लिए परिवर्तन का पूर्वानुमान लगाने की क्षमता आवश्यक है, न कि केवल उस पर राय देने की, ताकि भारत का प्रशासनिक ढांचा मजबूत, भविष्य के लिए तैयार और एक विकसित राष्ट्र की आकांक्षाओं को पूरा करने में सक्षम बना रहे। दो दिनों तक चली चर्चाओं के दौरान, जयपुर एक जीवंत मंच के रूप में उभरा, जहां नीति निर्माताओं, प्रशासकों, प्रौद्योगिकी क्षेत्र के दिग्गजों, नवप्रवर्तकों, अनुसंधानकर्ताओं और जमीनी स्तर के संस्थानों के प्रतिनिधियों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में शासन के भविष्य पर विचारों का आदान-प्रदान किया।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सम्मेलन ने यह प्रदर्शित किया कि भारत की डिजिटल शासन यात्रा सेवाओं के डिजिटलीकरण से कहीं आगे बढ़ चुकी है और अब एक नए चरण में प्रवेश कर रही है, जहां कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा-आधारित निर्णय प्रक्रिया, डिजिटल सार्वजनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षित डिजिटल इकोसिस्टम सामूहिक रूप से सार्वजनिक प्रशासन के भविष्य को आकार दे रहे हैं।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रति सरकार का दृष्टिकोण विशुद्ध रूप से प्रौद्योगिकी-आधारित मॉडल से मौलिक रूप से भिन्न है। उन्होंने कहा कि भारत मानव बुद्धि का स्थान लेने के बजाय, उसे पूरक बनाने के उद्देश्य से कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करने के लिए प्रतिबद्ध है। प्रधानमंत्री के अधिकतम शासन, न्यूनतम सरकार के दृष्टिकोण के बारे में बताते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि पिछले दशक में शुरू किए गए प्रत्येक तकनीकी क्रियाकलाप का उद्देश्य शासन को सरल, अधिक पारदर्शी और अधिक जवाबदेह बनाना रहा है, साथ ही यह सुनिश्चित करना भी कि नागरिक केंद्रीय हितधारक बना रहे।

उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी को जटिलता कम करनी चाहिए, अनावश्यक प्रक्रियाओं को समाप्त करना चाहिए और संस्थानों में जनता के विश्वास को मजबूत करना चाहिए। डॉ. जितेंद्र सिंह ने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि शासन सुधार तभी सार्थक होते हैं जब वे आम नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाते हैं। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग ने लगातार यह प्रदर्शित किया है कि प्रशासनिक नवाचार और डिजिटल प्रौद्योगिकियां मिलकर लोक सेवा वितरण को कैसे बदल सकती हैं।

उन्होंने केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण एवं निगरानी प्रणाली (सीपीग्राम्स) के उल्लेखनीय विस्तार की भी चर्चा की, जो दुनिया की सबसे बड़ी प्रौद्योगिकी-आधारित शिकायत निवारण प्रणालियों में से एक बन गई है, जिससे निपटान का समय काफी कम हो गया है और पूरे देश में इसकी पहुंच का विस्तार हुआ है।

डॉ. सिंह ने भाषिणी के सहयोग से विकसित एआई-संचालित बहुभाषी वॉयस चैटबॉट समाधान दीदी के बारे में भी बताया, जो इस बात का एक सशक्त उदाहरण है कि कैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता सुरक्षित सार्वजनिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से नागरिकों को अपनी भाषाओं में सरकार के साथ बातचीत करने में सक्षम बनाकर शासन को अधिक उत्तरदायी, समावेशी और सुलभ बना सकती है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस सेवा वितरण मूल्यांकन (एनईएसडीए) जैसी पहलों के माध्यम से भारत के डिजिटल शासन तंत्र को भी मजबूती मिली है, जो राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और केंद्रीय मंत्रालयों में डिजिटल सार्वजनिक सेवाओं के मूल्यांकन के लिए एक महत्वपूर्ण मानदंड के रूप में उभरा है। उन्होंने कहा कि इंडियाएआई मिशन के तहत विकसित किए जा रहे विस्तारित डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और कंप्यूटिंग क्षमताओं के साथ मिलकर, ये सुधार सरकारों को सुरक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही के उच्चतम मानकों को बनाए रखते हुए तेज, स्मार्ट और अधिक कुशल सार्वजनिक सेवाएं प्रदान करने में सक्षम बनाएंगे।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि शासन सुधार केवल प्रौद्योगिकी तक सीमित नहीं हो सकते। विशेष अभियान 5.0 का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि प्रशासनिक दक्षता कार्यस्थल की कार्यप्रणाली, अभिलेख प्रबंधन, संस्थागत अनुशासन और सार्वजनिक संसाधनों के अधिकतम उपयोग पर समान रूप से निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि ऐसे सुधारों ने स्वच्छ, सुव्यवस्थित और अधिक उत्पादक कार्य वातावरण बनाकर सरकारी संस्थानों को मजबूत किया है, साथ ही मंत्रालयों और विभागों में पारदर्शिता और जवाबदेही के सिद्धांतों को सुदृढ़ किया है।

इसी प्रकार, मिशन कर्मयोगी ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, डिजिटल शासन, नेतृत्व और साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण जैसे उभरते क्षेत्रों में निरंतर शिक्षा के माध्यम से तेजी से बदलते शासन परिदृश्य के लिए सिविल सेवकों को तैयार करके क्षमता निर्माण में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। उन्होंने कहा कि भविष्य के लिए तैयार राष्ट्र के निर्माण के लिए भविष्य के लिए तैयार सिविल सेवा अपरिहार्य है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों, राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों, जिला प्रशासनों, ग्राम पंचायतों और शैक्षणिक एवं अनुसंधान संस्थानों की 17 उत्कृष्ट पहलों को राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस पुरस्कार 2026 से सम्मानित किया। इन पुरस्कारों में सात श्रेणियों में 10 स्वर्ण पुरस्कार, 6 रजत पुरस्कार और एक जूरी पुरस्कार शामिल थे।

पुरस्कार विजेताओं को बधाई देते हुए उन्होंने कहा कि विजेता पहलें यह दर्शाती हैं कि नवाचार, प्रौद्योगिकी और जनसेवा किस प्रकार एक साथ मिलकर नागरिकों के जीवन में उल्लेखनीय सुधार ला सकते हैं। राजस्थान की डिजिटल शासन व्यवस्था में हुई उल्लेखनीय प्रगति की सराहना करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि राज्य ने सफलतापूर्वक एक ऐसा अनुकूल वातावरण तैयार किया है जहां शासन सुधार, नवाचार, उद्यमिता और उभरती प्रौद्योगिकियां एक-दूसरे को मजबूत करती हैं।

राज-काज एकीकृत प्रशासनिक मंच का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसने विभागों में त्वरित, कागज रहित और प्रौद्योगिकी-आधारित शासन को सक्षम बनाकर प्रशासनिक दक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही को काफी मजबूत किया है। उन्होंने कहा कि इस तरह की पहल एक कुशल, पारदर्शी और डिजिटल रूप से सशक्त लोक प्रशासन के निर्माण के राष्ट्रीय दृष्टिकोण में प्रत्यक्ष योगदान देती हैं।

इससे पहले, प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग की सचिव श्रीमती निवेदिता शुक्ला वर्मा ने सम्मेलन को शासन में नवाचारों को संस्थागत रूप देने, अंतर-सरकारी शिक्षा को बढ़ावा देने और देश भर से प्रौद्योगिकी-संचालित सर्वोत्तम प्रणालियों को प्रदर्शित करने के लिए एक प्रमुख मंच के रूप में वर्णित किया।

अपने संबोधन के समापन में डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि 2047 तक भारत के एक विकसित राष्ट्र बनने की आकांक्षा न केवल तकनीकी प्रगति पर निर्भर करेगी, बल्कि उभरती प्रौद्योगिकियों को अपनाते हुए मानवीय विवेक, संस्थागत अखंडता और लोकतांत्रिक जवाबदेही को बनाए रखने की देश की क्षमता पर भी निर्भर करेगी।

उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक ऐसा साधन बनी रहनी चाहिए जो लोगों को सशक्त बनाए, न कि उनका स्थान ले। उन्होंने प्रतिभागियों से सम्मेलन की भावना को अपने-अपने संगठनों में ले जाने का आह्वान करते हुए, प्रत्येक स्तर की सरकारों से आग्रह किया कि वे जयपुर में प्रदर्शित विचारों, नवाचारों और सर्वोत्तम प्रथाओं को शासन में ऐसे ठोस सुधारों में परिवर्तित करें जिनसे प्रत्येक नागरिक को प्रत्यक्ष लाभ मिले।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने विश्वास व्यक्त करते हुए कहा, “प्रौद्योगिकी शासन को गति दे सकती है, किंतु इसे दिशा तो केवल मानवीय बुद्धिमत्ता ही दे सकती है। मानव-नेतृत्व वाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता ही वह मार्ग है जिसके माध्यम से भारत विकसित भारत 2047 के सपने को साकार करेगा।” उन्होंने कहा कि भारत का जिम्मेदार, नागरिक-केंद्रित डिजिटल शासन का अनूठा मॉडल आने वाले वर्षों में वैश्विक स्तर पर एक मिसाल बना रहेगा।

सम्मेलन का समापन जयपुर घोषणापत्र 2026 को अपनाने के साथ हुआ, जिसमें विकसित भारत 2047 की परिकल्पना के अनुरूप एआई-सक्षम, डेटा-संचालित, सुरक्षित और नागरिक-केंद्रित डिजिटल शासन को आगे बढ़ाने के लिए एक साझा दृष्टिकोण और रणनीतिक रोडमैप की रूपरेखा तैयार की गई है।

 

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