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हिंदवी स्वराज्य की जननी राजमाता जीजाबाई : शिवाजी की असल प्रेरणा; राज्याभिषेक के 11 दिन बाद निधन

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Gurpreet Singh

Gurpreet Singh

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नई दिल्ली , 16 Jun 2026

Last updated on: Jun 16, 2026, 14:42 IST

1674 का वर्ष मराठा इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। 6 जून 1674 को रायगढ़ किले पर छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक हुआ। हिंदवी स्वराज्य की स्थापना का यह ऐतिहासिक क्षण था, जिसकी नींव रखने वाली महान महिला राजमाता जीजाबाई थीं। शाहजी भोंसले की पत्नी और शिवाजी की माता जीजाबाई ने न केवल अपने पुत्र को योद्धा बनाया, बल्कि स्वाधीनता की ज्वाला उनके हृदय में प्रज्वलित की।

दुर्भाग्य से, राज्याभिषेक के मात्र 11 दिन बाद 17 जून 1674 को पाचड़ गांव में उनका देहांत हो गया। उनकी मृत्यु स्वराज्य की विजय के तुरंत बाद हुई, मानो उन्होंने अपना अंतिम कर्तव्य पूरा कर लिया हो। जीजाबाई का जन्म 12 जनवरी 1598 को सिंदखेड़ राजा (बुलढाणा, महाराष्ट्र) में हुआ था। उनके पिता, लखुजीराव जाधव, एक प्रतिष्ठित मराठा सरदार थे, जो देवगिरि के यादव वंश से संबंधित थे।

उनकी माता का नाम मालासाबाई था। बचपन से ही जीजाबाई में वीरता, स्वाभिमान और धर्मनिष्ठा के संस्कार थे। उस युग में बाल विवाह प्रचलित था, अतः कम उम्र में ही उनका शाहजी भोंसले के साथ विवाह हुआ। शाहजी विजापुर के आदिलशाही सुल्तानों के अधीन एक कुशल सेनापति थे। जीजाबाई ने आठ संतानें दीं, जिनमें शिवाजी समेत दो पुत्र जीवित रहें।

पिता अक्सर युद्धों और राजकीय कार्यों में व्यस्त रहते थे, इसलिए शिवाजी का ज्यादातर पालन-पोषण मुख्य रूप से जीजाबाई के हाथों हुआ। जीजाबाई ने शिवाजी को रामायण, महाभारत और भगवद्गीता की शिक्षा दी और हिंदू धर्म, संस्कृति और स्वतंत्रता के महत्व को समझाया। उन्होंने बताया कि मराठा योद्धा कैसे अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हैं।

जीजाबाई स्वयं घुड़सवारी और तलवारबाजी में निपुण थीं। वे न केवल घर संभालतीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी साहस का परिचय देतीं। शिवाजी के बचपन की कई घटनाएं जीजाबाई की प्रेरणा को दर्शाती हैं। जब शिवाजी छोटे थे तो जीजाबाई उन्हें पहाड़ी किलों की यात्रा करातीं और स्वराज्य की कल्पना से परिचित करातीं।

उन्होंने पुत्र में मुगलों और सल्तनतों के विरुद्ध विद्रोह की भावना जगाई। शाहजी के निधन (1664) के बाद जीजाबाई ने शिवाजी को और मजबूती दी। वे राजनीतिक सलाहकार, प्रेरक और संरक्षक की भूमिका में रहीं। शिवाजी की हर विजय में उनकी अमिट छाप थी। 1674 में शिवाजी के राज्याभिषेक का क्षण जीजाबाई के जीवन का चरम था।

रायगढ़ पर सोने के सिंहासन पर विराजमान अपने पुत्र को देखकर उनकी आंखें गर्व से भर आईं। उन्होंने आजीवन हिंदवी स्वराज्य का जो सपना देखा था, वह साकार हो चुका था, लेकिन मात्र 11-12 दिन बाद, 17 जून को पाचड़ (रायगढ़ के निकट) में उनका स्वर्गवास हो गया, जिससे शिवाजी महाराज टूट गए। मां की मृत्यु उनके लिए अपूरणीय क्षति थी।

जीजाबाई की समाधि पाचड़ गांव में आज भी विद्यमान है। राजमाता जीजाबाई केवल एक मां नहीं थीं, बल्कि एक योद्धा, प्रशासक और राष्ट्र-निर्मात्री थीं। उन्होंने साबित किया कि महिलाएं भी इतिहास रच सकती हैं। उनके आदर्श आज भी मराठा गौरव और भारतीय स्वाभिमान का प्रतीक हैं। वे कहती थीं कि ईश्वर की कृपा और प्रयास से ही सफलता मिलती है।

उनकी शिक्षाएं, प्रजा की भलाई, धर्मरक्षा और न्याय, शिवाजी के शासन में दिखाई देती हैं। जीजाबाई को स्वराज्य की जननी कहा जाता है। उनकी वीरता, त्याग और दूरदृष्टि ने न केवल मराठा साम्राज्य की नींव रखी, बल्कि पूरे भारत को मुगल आधिपत्य के विरुद्ध संघर्ष का संदेश दिया।

 

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