भारत के उपराष्ट्रपति, श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने आज नई दिल्ली स्थित उपराष्ट्रपति भवन में आयोजित एक समारोह में "अगथियार – द यूनिफायर" नामक पुस्तक का विमोचन किया। भारत की सभ्यतागत एकता के बारे में बात करते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि जहाँ राष्ट्रीय एकीकरण की चर्चाओं में अक्सर राजाओं और राजनीतिक संस्थाओं को याद किया जाता है, वहीं भारत की एकता के असली शिल्पकार इसके साधु-संत और ऋषि थे।
उन्होंने कहा कि इनमें से अगथियार ऋषि, भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक एकता के सबसे बड़े प्रतीकों में से एक हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि अगथियार ऋषि, जिन्हें उत्तर और दक्षिण भारतीय दोनों परंपराओं में समान रूप से पूजा जाता है, हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक फैली भारत की एकता के प्रतीक हैं।
तमिलनाडु की पोथिगई पहाड़ियों और कावेरी नदी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि ये आज भी अगथियार ऋषि की याद दिलाती हैं। उन्होंने तमिल व्याकरण और तमिल संगम परंपरा के विकास में अगथियार के महत्वपूर्ण योगदान पर भी प्रकाश डाला और उन्हें उत्तर और दक्षिण भारत की संस्कृतियों के बीच एक सेतु बताया।
उपराष्ट्रपति ने आगे कहा कि अगथियार की विरासत यह दर्शाती है कि भारत की भाषाएँ एक-दूसरे की प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि बहनें हैं, जिन्होंने आपसी सम्मान और सदियों के सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से एक-दूसरे को समृद्ध किया है। श्री सी.पी. राधाकृष्णन ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि जहाँ कई लोगों ने तमिल भाषा से लाभ उठाया है, वहीं तमिल के लिए अपना जीवन समर्पित करने वालों को आज उचित सम्मान नहीं मिल रहा है।
इस संदर्भ में उन्होंने 'तमिल थाथा' यू. वे. स्वामीनाथ अय्यर के योगदान और बलिदान का उल्लेख किया। उन्होंने दुख जताते हुए कहा कि तमिल भाषा के लिए स्वामीनाथ अय्यर की सेवा को जनता तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुँचाया गया है। उन्होंने अय्यर की सराहना करते हुए उन्हें वह विद्वान बताया जिन्होंने तमिल की अनमोल साहित्यिक संपदा को नष्ट होने और गुमनामी से बचाया।
उपराष्ट्रपति ने टिप्पणी की कि भारत की एकता कोई समकालीन रचना नहीं है, बल्कि एक प्राचीन सभ्यतागत सच्चाई है जिसे हज़ारों वर्षों से ऋषियों और प्रबुद्ध विचारकों ने सींचा है। उन्होंने कहा कि अगथियार का जीवन और उनकी विरासत इसी शाश्वत सत्य की याद दिलाते हैं। यह देखते हुए कि प्रत्येक भाषा की अपनी अद्वितीय ताकत होती है, श्री सी.पी. राधाकृष्णन ने आगाह किया कि कुछ लोग भाषाई मतभेद पैदा करते हैं और अनावश्यक विवादों तथा विभाजनकारी प्रवृत्तियों को बढ़ावा देते हैं।
उन्होंने दृढ़ता के साथ कहा कि कोई भी शक्ति भारत में फूट पैदा नहीं कर सकती। उन्होंने ऐसी चर्चाओं का आह्वान किया जो युवाओं में भारत की संस्कृति और सभ्यतागत विरासत के प्रति सकारात्मक समझ पैदा करें। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि तमिलनाडु में सौ से अधिक मंदिर 'अगस्त्येश्वर' के रूप में अगथियार को समर्पित हैं।
उन्होंने कहा कि काशी और तमिलनाडु, दोनों ही स्थानों पर एक ही नाम वाले मंदिरों का होना भारत की सांस्कृतिक एकता का प्रमाण है। उपराष्ट्रपति ने इस विचार को खारिज कर दिया कि ब्रिटिश शासन के बिना भारत एकजुट नहीं रहता। उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति और सभ्यता ने हमेशा यहाँ के लोगों को विभिन्न क्षेत्रों और पीढ़ियों के पार एक सूत्र में पिरोए रखा है।
पुस्तक के लेखकों की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने शोध के माध्यम से भारत के उत्तरी, दक्षिणी, पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्रों में अगथियार से जुड़ी परंपराओं, कहानियों और संदर्भों की व्यापक उपस्थिति को बड़ी बारीकी से दर्ज किया है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह पुस्तक अगथियार की महानता और भारत की सांस्कृतिक एकता के संदेश को वैश्विक स्तर तक ले जाने में एक महत्वपूर्ण कार्य सिद्ध होगी।
उपराष्ट्रपति ने इस पुस्तक को प्रकाशित करने के लिए 'कलैमगल' पत्रिका की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि कलैमगल पिछले 95 से अधिक वर्षों से भावी पीढ़ियों के लिए तमिल साहित्य, संस्कृति और विरासत को संरक्षित और प्रोत्साहित करते हुए अपनी उत्कृष्ट सेवाएँ दे रही है। उन्होंने याद किया कि कई तमिल विद्वानों, इतिहासकारों, वैज्ञानिकों और राष्ट्रीय नेताओं ने अपने लेखों के माध्यम से इस पत्रिका की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को समृद्ध किया है।
इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख श्री सुनील आंबेकर; कलैमगल पत्रिका के संपादक श्री कीलमबुर शंकर सुब्रमण्यम; वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार श्री मालन; पुस्तक के लेखक श्री ओ. श्यामा भट्ट और डॉ. एम. एन. सुधा; और पुस्तक का तमिल में अनुवाद करने वाली प्रोफेसर कल्याणी के साथ-साथ कई अन्य गणमान्य अतिथि उपस्थित थे।