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जब ब्लड शुगर 550 तक पहुँचा, परिवार ने आस्था की डोर थामी और भगवंत मान सरकार की 'मुख्यमंत्री सेहत योजना' बनी जीवनरक्षक

'मुख्यमंत्री सेहत योजना' के तहत 62 वर्षीय मरीज़ को मिला जीवनरक्षक इलाज, जब ब्लड शुगर पहुँचा 550 तक

Mukh Mantri Sehat Yojna, AAP Punjab
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Gurpreet Singh

Gurpreet Singh

5 Dariya News

चंडीगढ़ , 21 May 2026

Last updated on: May 21, 2026, 16:21 IST

ज़िंदगी में कुछ पल ऐसे आते हैं जब समय सिर्फ धीमा नहीं पड़ता, बल्कि जैसे थम जाता है। 62 वर्षीय भूर कौर के जीवन में भी ऐसा ही एक पल आया, बिना किसी चेतावनी के । पिछले 15-16 वर्षों से वह डायबिटीज और हाइपरटेंशन से जूझ रही थीं। यह बीमारी उनकी दिनचर्या का लगभग सामान्य हिस्सा बन चुकी थी।  

दवाइयाँ, जाँच , सावधानियाँ । कुछ भी असामान्य नहीं। लेकिन एक दिन अचानक उनके शरीर ने काम करना बंद कर दिया। उनका ब्लड शुगर अचानक 550 mg/dL तक पहुँच गया। कुछ ही पलों में वह अचानक गिर पड़ीं। बेहोश। निष्क्रिय। वह जीवन के लिए संघर्ष कर रही थीं। 

उनके परिवार के पास सोचने का समय नहीं था। उनके पास सिर्फ़ तुरंत कदम उठाने का समय था। उनकी बहू परमजीत ने कहा, “हम बस भाग रहे थे और अरदास कर रहे थे। सोचने की भी हालत नहीं थी, सिर्फ़ घबराहट थी।” उनके बेटे हरपाल, जो गुरुद्वारे में पाठी हैं और पूरी श्रद्धा से सेवा करते हैं, के लिए वह पल किसी बुरे सपने जैसा था। मानो उनकी आस्था ही सबसे कठिन इम्तिहान से गुज़र रही हो।

कुछ सेकंडों पर टिकी थी ज़िंदगी

संगरूर के सुनाम स्थित कश्मीरी हार्ट केयर सेंटर में जब भूर कौर को लाया गया, तब उनकी हालत बेहद गंभीर थी। क्लिनिकल कार्डियोलॉजिस्ट एवं मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. अंशुमन फुल उस स्थिति को आज भी स्पष्ट रूप से याद करते हैं। उन्होंने बताया, “भूर कौर को डायबिटिक कीटोएसिडोसिस, गंभीर संक्रमण और एक्यूट रेस्पिरेटरी फेल्योर के साथ बेहद गम्भीर स्थिति में अस्पताल लाया गया था। 

उनका ऑक्सीजन स्तर लगातार गिर रहा था, हृदय की स्थिति अस्थिर थी और शरीर ख़तरनाक मेटाबॉलिक असंतुलन में जा चुका था।” 550 mg/dL तक पहुँचा ब्लड शुगर उनके शरीर को जीवनघाती स्थिति में धकेल चुका था। शरीर में पानी की भारी कमी, इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन और अंगों पर गंभीर दबाव पैदा हो चुका था। 

इसके बाद एक ख़तरनाक स्थिति उभरी- ‘सेप्सिस’ , जिसमें संक्रमण शरीर को ही नुकसान पहुँचाने लगता है। डॉ. अंशुमन फुल ने कहा, “ऐसे मामलों में हर घंटा महत्त्वपूर्ण होता है। कई बार तो कुछ मिनट ही यह तय करते हैं कि मरीज़ बच पाएगा या नहीं।”

आईसीयू के भीतर ज़िंदगी की जंग

आईसीयू ऐसा स्थान बन चुका था जहाँ हर सेकंड मायने रखता था। ऑक्सीजन सपोर्ट, आईवी इंसुलिन, एंटीबायोटिक्स, फ्लूइड्स, इलेक्ट्रोलाइट सुधार और लगातार मॉनिटरिंग। किसी भी चीज़ में देरी की गुंजाइश नहीं थी। डॉ. फुल ने कहा,“शुरुआती घंटों में हमारा पूरा ध्यान सिर्फ़ उनकी जान बचाने पर था। 

हमें एक साथ साँस लेने में दिक्कत,संक्रमण और मेटाबॉलिक असंतुलन का इलाज करना पड़ रहा था।”आईसीयू के बाहर परिवार ख़ामोशी से बैठा इंतज़ार कर रहा था। दुआ,उम्मीद और विश्वास ही उनका सहारा था। फिर धीरे-धीरे ज़िंदगी ने वापसी शुरू की। तीसरे दिन सुधार के शुरुआती संकेत दिखाई दिए। 

उनका ऑक्सीजन स्तर बेहतर होने लगा। संक्रमण के संकेत कम होने लगे। शरीर इलाज का जवाब देने लगा। और फिर सबसे बड़ी राहत मिली — भूर कौर को होश आ गया। डॉ. फुल ने कहा, “वह वास्तव में पहला राहत का पल था। हम जान गए थे कि वे मौत के मुँह से लौट रही हैं।” जो मरीज़ मृत्यु के मुहाने पर पहुँच चुका था, वह धीरे-धीरे जीवन की ओर लौट रहा था।

'मुख्यमंत्री सेहत योजना' ने बदली पूरी स्थिति

इस पूरे मेडिकल इमरजेंसी के दौरान 'मुख्यमंत्री सेहत योजना' ने बेहद महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। डॉक्टरों के अनुसार इस योजना ने सबसे अहम चीज़ सुनिश्चित की कि इलाज में कोई देरी नहीं हुई। डॉ. अंशुमन फुल ने कहा, “ऐसी आपात स्थितियों में देरी किसी की जान ले सकती है। 

लेकिन मरीज़ योजना के तहत कवर थी, इसलिए आईसीयू और इमरजेंसी उपचार तुरंत शुरू हो गया।” न कोई आर्थिक झिझक। न कोई इंतज़ार। सिर्फ़ तुरंत इलाज। गंभीर मामलों में यही तेज़ी कई बार जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर बन जाती है।

“मुझे दूसरा जीवन मिला है”

अब धीरे-धीरे स्वस्थ हो रहीं भूर कौर धीमी आवाज़ में अपनी बात कहती हैं, जो अभी भी उस अनुभव की थकान से जूझ रही हैं, लेकिन भीतर से बेहद आभारी हैं। उन्होंने कहा, “मुझे सब कुछ याद नहीं है, लेकिन इतना पता है कि मेरी हालत बहुत गंभीर थी। मैं डॉक्टरों और सरकार की आभारी हूँ। सेहत कार्ड की वजह से आज मैं ज़िंदा हूँ।” शब्द सरल थे, लेकिन उनका भाव बेहद गहरा था।

समय रहते मौत के मुँह से लौट आई एक ज़िंदगी

एक परिवार जिसने उम्मीद नहीं छोड़ी और एक व्यवस्था जिसने समय पर साथ दिया। हरपाल और परमजीत के लिए यह अनुभव जीवनभर याद रहने वाला है। हरपाल ने कहा, “एक पल पहले वह हमारे साथ थीं और अगले ही पल बेहोश हो गईं। हम हमेशा आभारी रहेंगे कि उन्हें समय पर इलाज मिल गया।” परमजीत ने कहा, “हमारे पास विश्वास था, लेकिन हमें सहारे की भी ज़रूरत थी। हमें दोनों मिले।”

साधारण रिकवरी से कहीं अधिक

भूर कौर की कहानी सिर्फ़ एक मेडिकल इमरजेंसी की कहानी नहीं है। यह इस बात की कहानी है कि जीवन अचानक कैसे बदल सकता है। यह उस नाज़ुक स्थिति की कहानी है जब बीमारी बिना किसी चेतावनी के आती है ,और यह बताती है कि जब समय पर इलाज और सही सहायता मिलते हैं तो क्या होता है।

भूर कौर के लिए सेहत कार्ड सिर्फ़ एक दस्तावेज़ नहीं था। यह समय था। यह इलाज था। यह जीवन था।

 

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