मानव जीवन के वास्तविक उद्देश्य, परमात्मा की पहचान, अहंकार त्याग तथा विश्व बंधुत्व पर अपने प्रेरणादायी विचार सेक्टर-32डी चंडीगढ़ के ग्राउंड में आयोजित विशाल निरंकारी संत समागम में शाहबाद मारकण्डा से आए जोनल इंचार्ज श्री सुरिन्द्र पाल जी ने हजारों की संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
श्री पाल जी ने आगे कहा कि सच्ची भक्ति तभी संभव है जब मनुष्य परमात्मा को सही रूप में जान ले। धार्मिक ग्रंथों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि “बिन जाने न होए प्रीति” अर्थात बिना परमात्मा की पहचान के उसके प्रति वास्तविक प्रेम और भक्ति उत्पन्न नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि परमात्मा किसी विशेष स्थान, मंदिर, मस्जिद या तीर्थ तक सीमित नहीं है, बल्कि वह प्रत्येक जीव और प्रत्येक कण में विद्यमान है।
आवश्यकता केवल उसे पहचानने और अनुभव करने की है। जब मनुष्य सत्गुरु की कृपा से इस सत्य को जान लेता है, तब उसके जीवन में आत्मिक शांति और आनंद स्वतः आने लगता है। श्री पाल जी ने कहा कि प्रत्येक युग में समय का सत्गुरु ही वह माध्यम रहा है जिसने मानव को निराकार प्रभु की जानकारी देकर उसके जीवन को सही दिशा प्रदान की। वर्तमान समय में सत्गुरु माता सुदीक्षा जी महाराज द्वारा सम्पूर्ण मानवता को परमात्मा की पहचान करवाई जा रही है, जिससे मनुष्य अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझ पा रहा है।
उन्होंने कहा कि मानव जीवन केवल सांसारिक उपलब्धियों और भौतिक सुखों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका वास्तविक उद्देश्य परमात्मा को जानना, मानवता की सेवा करना तथा प्रेम और विनम्रता से जीवन व्यतीत करना है। उन्होंने कहा कि आज का मनुष्य पूजा-पाठ, तीर्थ यात्राओं और धार्मिक परम्पराओं में तो समय व्यतीत करता है, लेकिन आत्मा और परमात्मा के वास्तविक संबंध को समझने का प्रयास कम करता है।
संत निरंकारी मिशन यही संदेश देता है कि जब मनुष्य सत्गुरु की कृपा से परमात्मा को जान लेता है, तब उसके जीवन से भय, चिंता, तनाव और असुरक्षा की भावना स्वतः समाप्त होने लगती है। अपने विचार आगे रखते हुए श्री पाल सिंह जी ने कहा कि सभी धर्मों का मूल संदेश प्रेम, मानवता और भाईचारा है। चाहे कोई ईश्वर कहे, अल्लाह कहे, वाहेगुरु कहे या गॉड कहे सभी नाम उसी एक निराकार परमात्मा की ओर संकेत करते हैं।
इसलिए मनुष्य को धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र के आधार पर भेदभाव से ऊपर उठकर प्रेम और सद्भाव के मार्ग पर चलना चाहिए। उन्होंने कहा कि निरंकारी मिशन सम्पूर्ण मानवता को एक परिवार मानते हुए विश्व बंधुत्व का संदेश देता है और समाज में प्रेम, एकता एवं सह-अस्तित्व की भावना को मजबूत बनाने के लिए निरंतर प्रयासरत है।
समागम के दौरान श्री पाल जी ने विशेष रूप से अहंकार त्याग के विषय पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मनुष्य और परमात्मा के बीच सबसे बड़ी बाधा “मैं” और “मेरा” की भावना है। जब व्यक्ति स्वयं को सबसे बड़ा समझने लगता है, तब उसके भीतर प्रेम, विनम्रता और सहनशीलता कम होने लगती है।
संत निरंकारी मिशन की शिक्षा है कि मनुष्य को यह समझना चाहिए कि वास्तविक कर्ता परमात्मा है और इंसान केवल एक माध्यम है। अहंकार त्यागने का सबसे सरल मार्ग सेवा है। जब व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ, प्रशंसा या पहचान की इच्छा के सेवा करता है, तब उसके भीतर विनम्रता विकसित होती है।
सेवा मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है, जबकि अहंकार मनुष्य को मनुष्य से दूर कर देता है। अपने संदेश के अंत में उन्होंने कहा कि सत्गुरु की शिक्षाओं को अपनाकर ही मानव जीवन सार्थक बनता है। गुरु की आज्ञा में चलने वाला व्यक्ति हर परिस्थिति में संतोष और आनंद का अनुभव करता है।
चाहे परिस्थितियाँ अनुकूल हों या प्रतिकूल, परमात्मा पर विश्वास रखने वाला व्यक्ति मानसिक रूप से स्थिर रहता है। उन्होंने कहा कि आज के समय में मानवता को सबसे अधिक आवश्यकता प्रेम, एकता और आपसी सद्भाव की है। समाज में बढ़ती नफरत, हिंसा और विभाजन की भावना को केवल आध्यात्मिक जागरूकता, प्रेम और मानवता के भाव से ही समाप्त किया जा सकता है।
इससे पूर्व यहां के ज़ोनल इन्चार्ज श्री ओ. पी. निरंकारी जी ने श्री सुरिन्द्र पाल जी का चण्डीगढ़ में पधारने पर सभी की ओर से स्वागत व धन्यवाद किया । इस अवसर पर अनेक वक्ताओं ने भी निरंकारी मिशन द्वारा दी जा रही शिक्षाओं को जीवन में अपनाने से होने वाले लाभों के प्रति अपने अपने अनुभव व्यक्त किए । इस समागम में यहां के संयोजक श्री नवनीत पाठक तथा अन्य गणमान्य भी उपस्थिति थे ।