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संघर्षों से लड़कर पाना देवी बनीं महिलाओं की ताकत, सफलता का नया इतिहास रचा

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चूरू , 08 Mar 2026

Last updated on: Mar 09, 2026, 13:46 IST

कम उम्र में शादी, छोटी उम्र में मां बनने की जिम्मेदारी, आर्थिक तंगी और दिव्यांगता जैसी चुनौतियों के बावजूद अगर कोई महिला हार न माने तो वह खुद के साथ कई लोगों की जिंदगी बदल देती है। चूरू जिले से 55 किलोमीटर दूर आसपालसर गांव की पाना देवी ने अपने संघर्ष, हौसले और मेहनत के दम पर ऐसा ही कर दिखाया है। आज वह न सिर्फ खुद ग्रेजुएशन कर चुकी हैं बल्कि क्षेत्र की अनेकों महिलाओं को रोजगार देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का काम भी कर रही हैं।

पाना देवी ने बताया कि उन्होंने बचपन में केवल पांचवीं कक्षा तक ही पढ़ाई की थी। महज 12 वर्ष की उम्र में उनका विवाह कर दिया गया था। शादी के दो साल बाद वे ससुराल आ गईं और 15 साल की उम्र में उनके घर पहला बेटा हुआ। इसके एक साल बाद दूसरा बेटा भी हो गया। कम उम्र में ही परिवार और बच्चों की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई।

घर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उन्हें मजदूरी करने के लिए नरेगा में काम पर जाना पड़ता था। दिव्यांग होने के बावजूद वे मिट्टी डालने और भारी मेहनत का काम करती थीं। उस दौरान उन्हें अक्सर लगता था कि अगर वे पढ़ी-लिखी होतीं तो कागजी काम कर सकती थीं और इतनी कठिन मजदूरी नहीं करनी पड़ती।पढ़ाई की इसी इच्छा ने उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। 

शादी के बाद उनके पिता ने उन्हें आठवीं कक्षा तक पढ़ाया ताकि वे आंगनबाड़ी में काम कर सकें। आठवीं पास करने के बाद भी दिव्यांग होने के बावजूद उनका आंगनवाड़ी में चयन नहीं हो पाया।वर्ष 2016 में उनके जीवन में एक नई उम्मीद लेकर राजीविका संस्था आई। आंध्र प्रदेश से आई टीम ने उन्हें इस संस्था से जोड़ा। इसके बाद वे राजीविका में समूह सखी बन गईं और कई प्रशिक्षण प्राप्त किए। यहां से उन्हें 2250 रुपये का मानदेय मिलने लगा। 

इसके बाद उन्होंने छोटा सा लोन लेकर सिलाई मशीन खरीदी और सिलाई सीखना शुरू किया। इसी दौरान उन्होंने ओपन बोर्ड से दसवीं कक्षा का फॉर्म भी भरा। पहली बार में वे परीक्षा में सफल नहीं हो पाईं लेकिन हार नहीं मानी। दूसरी बार में उन्होंने दसवीं कक्षा पास कर ली। इसके बाद उन्होंने 12वीं कक्षा भी पास की और आगे पढ़ाई जारी रखते हुए आज ग्रेजुएशन भी पूरा कर लिया।

राजीविका के माध्यम से उन्हें एक और बड़ा अवसर मिला, जब पांचवीं पास महिलाओं को नरेगा में मेठ बनने का मौका मिला। पहले जहां वे मजदूरी करती थीं, वहीं बाद में तीन साल तक मेठ के पद पर काम किया। इससे उनका आत्मविश्वास काफी बढ़ गया और उन्होंने तय किया कि अब वे गांव की अन्य महिलाओं को भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेंगी।

राजीविका से छोटे-छोटे लोन लेकर उन्होंने सेनेटरी नैपकिन बनाने का काम शुरू किया। शुरुआत में छोटी मशीन से काम होता था, जिसमें महिलाओं को घंटों मेहनत करनी पड़ती थी और आमदनी भी कम होती थी। इस समस्या को देखते हुए राजस्थान ग्रामीण विकास की अधिकारी दुर्गा ढाका ने तत्कालीन जिला कलेक्टर सिद्धार्थ सियाग से अनुरोध किया। इसके बाद कलेक्टर ने अपने बजट से पाना देवी को सेनेटरी नैपकिन की बड़ी मशीन उपलब्ध करवाई। आज इस यूनिट में करीब 20 महिलाएं मिलकर काम कर रही हैं और रोजगार प्राप्त कर रही हैं।

पाना देवी सिर्फ खुद तक ही सीमित नहीं रहीं। उन्होंने गांव की महिलाओं को पढ़ाई के लिए भी प्रेरित किया। अब तक वे करीब 40 महिलाओं को पढ़ाई के लिए प्रेरित कर चुकी हैं। इनमें से 13 महिलाओं के ओपन बोर्ड के फॉर्म भी उन्होंने खुद स्कूल जाकर भरवाए। वे बताती हैं कि उनके परिवार में पहले पांचवीं कक्षा से ज्यादा कोई पढ़ा-लिखा नहीं था, लेकिन उन्होंने इस परंपरा को बदला और खुद ग्रेजुएशन तक पढ़ाई की।

पाना देवी अब तक सात से आठ जिलों में राजीविका से जुड़ी सैकड़ों महिलाओं को प्रशिक्षण दे चुकी हैं। खुद भी विभिन्न प्रशिक्षण लेकर वे अन्य महिलाओं को इसका लाभ दे रही हैं। उनके प्रयासों से कई महिलाएं अलग-अलग क्षेत्रों में रोजगार प्राप्त कर चुकी हैं। उनकी उपलब्धियों के कारण उन्हें देश की राष्ट्रपति द्रोपति मुर्मू से मिलने का अवसर भी मिला, जिसे वे अपने जीवन का सबसे गौरवपूर्ण क्षण मानती हैं।पाना देवी ने कहा कि संघर्ष तो उनके जीवन की शुरुआत से ही साथ रहा है, लेकिन अब उन्हें संघर्ष से डर नहीं लगता, बल्कि यही उन्हें आगे बढ़ने की ताकत देता है। 

वे चाहती हैं कि गांव की हर महिला पढ़े, आगे बढ़े और आत्मनिर्भर बने। राजस्थान ग्रामिण विकास से जुड़ी हुई अधिकारी प्रियंका चौधरी ओर मंजू का कहना है कि पाना देवी की कहानी यह सिखाती है कि संघर्ष कितना भी बड़ा क्यों न हो, अगर हौसला और मेहनत साथ हो तो सफलता जरूर मिलती है। अपने संघर्ष और मेहनत के दम पर पाना देवी ने न केवल अपनी जिंदगी बदली, बल्कि कई अन्य महिलाओं के जीवन में भी उम्मीद की नई रोशनी जलाई है। उनकी कहानी यह साबित करती है कि अगर इंसान में हिम्मत और लगन हो, तो कोई भी मुश्किल रास्ता रोक नहीं सकता।

 

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