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सरोजिनी नायडू : स्वतंत्रता संग्राम और नारी मुक्ति की अटूट आवाज रहीं 'स्वर कोकिला'

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नई दिल्ली , 01 Mar 2026

Last updated on: Mar 02, 2026, 17:34 IST

सरोजिनी नायडू भारत के इतिहास में एक ऐसा नाम है, जो स्वतंत्रता संग्राम और नारी मुक्ति की अटूट आवाज बनीं। उनके संघर्ष, कविताएं और महिलाओं के लिए की गई लड़ाई आज भी प्रेरित करती है। मात्र 12 साल की उम्र में कविताएं लिखना शुरू करने वाली 'नाइटिंगेल ऑफ इंडिया' ने अपनी कलम से क्रांति जगाई और जीवनभर देश की आजादी तथा महिलाओं की समानता के लिए अथक प्रयास किए। महात्मा गांधी ने उनकी भावुक, लयबद्ध और राष्ट्रप्रेम से भरी कविताओं को देखकर उन्हें 'भारत कोकिला' की उपाधि दी।

13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में जन्मी सरोजिनी नायडू ने मद्रास, लंदन और कैंब्रिज में शिक्षा प्राप्त की। इंग्लैंड में महिलाओं के वोटिंग अधिकार आंदोलन से प्रभावित होकर वह भारत लौटीं और 1898 में गोविंदराजुलु नायडू से विवाह के बाद स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बनीं।स्वतंत्रता संग्राम में सरोजिनी नायडू ने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन (1920) से लेकर नमक सत्याग्रह तक सक्रिय भूमिका निभाई। वह कई बार जेल गईं। 

साल 1925 में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष बनीं। संविधान सभा में उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज के महत्व पर जोर दिया और समावेशी संविधान की वकालत की। आजादी के बाद वह संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) की पहली महिला राज्यपाल बनीं और 1949 तक पद पर रहीं, जहां उन्होंने अंतिम समय तक काम किया।महिलाओं के अधिकारों के लिए उनका योगदान अतुलनीय था। 

उस दौर में पर्दा प्रथा, बाल विवाह, विधवा जीवन और शिक्षा की कमी जैसी कुरीतियां व्याप्त थीं। सरोजिनी ने इन्हें चुनौती दी। उन्होंने 1906 में कलकत्ता में इंडियन सोशल कॉन्फ्रेंस में भारतीय महिलाओं की शिक्षा पर भाषण दिया। साल 1908 में मद्रास में विधवाओं के पुनर्विवाह और सुधार के लिए प्रस्ताव पेश किया। इसके बाद 1917 में एनी बेसेंट के साथ वुमेंस इंडियन एसोसिएशन की स्थापना की और महिलाओं के मताधिकार के लिए भी पहल की।

सरोजिनी नायडू ने साबित किया कि महिलाएं कमजोर नहीं, बल्कि सक्षम और सबल हैं। उनकी लड़ाई ने न केवल आजादी दिलाई, बल्कि महिलाओं को समान अधिकारों की राह दिखाई। उन्होंने कहा था, "मुझे लगता है कि विश्व-सभ्यता के आगे बढ़ने का समय आ गया है, जब देश सेवा और चेतना में लैंगिक भेदभाव नहीं होना चाहिए।"

सरोजिनी नायडू महिलाओं के हित के लिए आगे बढ़ीं और साल 1918 में बीजापुर में महिलाओं के वोटिंग अधिकार पर संकल्प पेश किया और कहा कि 'पुरुष' शब्द में राजनीतिक रूप से महिलाएं भी शामिल हों। वहीं, 1931 के दूसरे गोलमेज सम्मेलन में महिलाओं के अधिकारों की जोरदार वकालत की। उन्होंने साल 1933 में दिल्ली में लेडी इरविन कॉलेज की स्थापना में मदद की।

 

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