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संविधान से पहले कैसी थी देश की शासन प्रक्रिया, संघ प्रमुख ने बताया क्यों पड़ी थी इसकी जरूरत

Mohan Bhagwat, BJP, Bharatiya Janata Party, RSS Supremo, Rashtriya Swayamsevak Sangh
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5 Dariya News

पानीपत , 06 Dec 2025

Last updated on: Dec 08, 2025, 15:02 IST

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने शनिवार को ‘भारतीय इतिहास, संस्कृति और संविधान’ कार्यक्रम में बताया कि संविधान से पहले देश में शासन की प्रक्रिया कैसी थी? इस कार्यक्रम का आयोजन हरियाणा के पानीपत में किया गया। संघ प्रमुख ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि आज हमारे पास संविधान है। 

देश का शासन संविधान के माध्यम से होता है, लेकिन, क्या आप लोगों के जेहन में यह सवाल कभी आया है कि जब संविधान नहीं था, तो देश का शासन कैसा होता था? उन दिनों देश का शासन धर्म के जरिए होता था, क्योंकि मनुष्य पथभ्रष्ट नहीं हुआ था। जब मनुष्य पथभ्रष्ट हुआ, तो लोगों को संविधान की आवश्यकता महसूस हुई। 

आज उसी संविधान के आधार पर देश में शासन प्रक्रियाओं को संपन्न किया जा रहा है। प्राचीनकाल में देश का शासन संविधान से नहीं होता था, बल्कि धर्म से होता था। यहां पर मेरा धर्म से मतलब रिलिजन बिल्कुल भी नहीं है। रिलिजन और धर्म के बीच में अंतर होता है। उन्होंने कहा कि प्राचीनकाल में धर्म के आधार पर देश में शासन में होता था। 

धर्म के तहत सभी लोग एक-दूसरे को समृद्ध करने की विचारधारा में विश्वास रखते थे। लोगों को इस बात को मानते थे कि अगर हम समाज का संपूर्ण विकास चाहते हैं, तो इसके लिए हमें एक-दूसरे की समद्धि पर जोर देना होगा। इसी सिद्धांत के तहत धर्म के आधार पर देश या प्रदेश का शासन किया जाता था, लेकिन इसके बाद स्थिति इस कदर बदली कि लोगों को लोगों को राजा की आवश्यकता महसूस हुई। 

राजा देश को चलाने लगा। इस तरह से यहां से शासन की नई प्रक्रिया का जन्म हुआ। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि इसके बाद राजा के सामने भी यह प्रश्न आया कि आखिर वो देश को चलाए कैसे? यहीं से विधि व्यवस्था की शुरुआत हुई? जिसमें यह प्रावधान किया गया था कि किसी देश में शासन की प्रक्रिया कैसी होगी? लोगों की जरूरतों की पूर्ति कैसे होगी? और यह बात कैसे सुनिश्चित की जाएगी कि कैसे लोगों के हितों पर किसी भी प्रकार का कुठाराघात नहीं हो। 

इन्हीं सब स्थिति से निपटने के लिए नियमों के संग्रहण की सूची को संविधान कहा गया है। जिसके जरिए देश में किसी शासन की प्रक्रिया को संपन्न किया जाता है। इसके तहत यह सुनिश्चित किया जाता है कि किसी भी व्यक्ति के हितों पर किसी भी प्रकार का कुठाराघात नहीं हो। वहीं, कार्यक्रम में मौजूद गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि आज की तारीख में भारतीय इतिहास को फिर से लिखना जरूरी हो जाता है। 

आखिर आज से 50 साल पहले किसने इस बात की कल्पना की थी कि भारत पुर्नजागरण के दौर से गुजरेगा। जवाब स्पष्ट है कि किसी ने भी नहीं की थी। ऐसी स्थिति में यह जरूरी हो जाता है कि भारतीय इतिहास का लेखन फिर से शुरू किया जाए। प्रो. राघुवेंद्र तंवर ने कहा कि संविधान को समझने के लिए भारत एवं उसकी संस्कृति को समझना आवश्यक है। 

विभाजन ने भारतीय समाज को तोड़ दिया। गोपाल नारायण सिंह ने कहा कि हजारों वर्षों के आक्रमण से इतिहास तितर-बितर हो गया है, किंतु इतिहास संकलन के प्रयास से इसे पुर्नलेखन के माध्यम से इकट्ठा करने का प्रयास किया जा रहा है, यह प्रयास सराहनीय है। देवी प्रसाद सिंह जी ने ‘यदि संविधान की वाणी होती’ विषय पर लिखित अपनी कविता से भाव को स्पष्ट करते हुए बताया कि संविधान को भारतीय संस्कृति से अलग करके नहीं देखा जा सकता है।

 

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