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सीजीसी लांडरां के बायोटेक्नोलॉजी स्टूडेंट्स ने पराली जलाने की समस्या से निपटने के लिए इनोवेटिव प्रोजेक्ट विकसित किए

CGC Landran, Landran, Chandigarh Group Of Colleges, Satnam Singh Sandhu, Rashpal Singh Dhaliwal
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लांडरां , 14 Nov 2025

Last updated on: Nov 15, 2025, 15:09 IST

चंडीगढ़ ग्रुप ऑफ कॉलेजेज़ (सीजीसी) लांडरां के चंडीगढ़ कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी (सीसीटी) के बायोटेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट के स्टूडेंट्स ने चार इनोवेटिव प्रोजेक्ट विकसित किए हैं, जो एग्रीकल्चर वेस्ट को सस्टेनेबल और वैल्यू एडेड प्रोडक्ट्स में परिवर्तित करते हैं। इन प्रोजेक्ट्स में मुख्यतह पराली जलाने जैसी गंभीर पर्यावरणीय समस्या से निपटने के लिए इनोवेटिव प्रोजेक्ट शामिल हैं, जो इको फ्रेंडली प्रैक्टिसेज और ग्रीन एंटरप्रेंयूर्शिप को भी बढ़ावा देती हैं। 

इन प्रोजेक्ट्स को हाल ही में संपन्न हुए सीजीसी लांडरां के वार्षिक कॉलेज फेस्ट ‘परिवर्तन’ में प्रदर्शित किया गया। इन आईडिया में सबसे आगे है ‘मायको मेज़िंग', जिसे दीपांशी शर्मा ने विकसित किया है। यह प्रोजेक्ट फंगल माइसीलियम और गेहूं की पराली का उपयोग करके बायोडिग्रेडेबल कंपोज़िट्स तैयार करता है, जो प्लास्टिक और थर्माकोल का विकल्प बन सकते हैं। 

इस प्रोजेक्ट को नीति आयोग कम्युनिटी इनोवेटर फेलोशिप के तहत ₹2 लाख की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है और इसे नीति आयोग ‘वॉल ऑफ इनोवेशन’ पर भी प्रदर्शित किया गया है। माइसीलियम की नेचुरल बॉंडिंग प्रॉपर्टीज़ का उपयोग करते हुए, यह प्रोजेक्ट दर्शाता है कि एग्रीकल्चर वेस्ट को कैसे मज़बूत, हल्के और बायोडिग्रेडेबल पदार्थों में बदला जा सकता है, जो पैकेजिंग, इंसुलेशन और सस्टेनेबल डिज़ाइन के लिए उपयुक्त हैं।

‘सीजीसी लांडरां के अध्यक्ष सतनाम सिंह संधू ने सीजीसी के वार्षिक तकनीकी-सांस्कृतिक उत्सव, परिवर्तन 2025 में पराली जलाने की समस्या से निपटने के लिए दीपांशी की अभिनव परियोजना के लिए उन्हें सम्मानित भी किया। ‘पराली टू पावर’ प्रोजेक्ट, जिसे बायोटेक्नोलॉजी के स्टूडेंट्स राधिका रंजन, रिया शर्मा और सर्गम ने अपने फैकल्टी मेंटर डॉ. अभिनॉय किशोर के मार्गदर्शन में विकसित किया है, का मुख्य उद्देश्य गेहूं की पराली को सेलूलोज़ नैनो क्रिस्टल्स  की मदद से पायज़ोइलेक्ट्रिक मटेरियल में बदलना है। 

सेलूलोज़ की प्राकृतिक नॉन-सेंट्रोसिमेट्रिक संरचना का उपयोग करते हुए, टीम ने एनर्जी हार्वेस्टिंग, वियरेबल सेंसर और बायोमेडिकल अनुप्रयोगों के लिए एक पर्यावरण अनुकूल तकनीक विकसित की है। इसके साथ ही हस्क बायोटेक नामक स्टार्टअप, जिसे एम.एससी. बायोटेक्नोलॉजी के स्टूडेंट्स अंकेश बशिष्ठ, महिमा, कलश जैन और राहुल रंजन ने मिलकर विकसित किया है, उन्होंने राइस हस्क जो एक आम एग्रीकल्चर बाय प्रोडक्ट है, उसको एनवायरनमेंट अनुकूल उत्पादों जैसे नोटबुक कवर, पेन स्टैंड और प्लाईवुड में बदल दिया है। 

यह प्रोजेक्ट दर्शाता है कि किस प्रकार वेस्ट को मजबूत, बायोडिग्रेडेबल और टिकाऊ उपभोक्ता उत्पादों में परिवर्तित किया जा सकता है, जो प्लास्टिक पर निर्भरता कम करने और एनवायर्नमेंटल बैलेंस बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ‘इको वॉल पैनल्स’ प्रोजेक्ट में एम.एससी. बायोटेक्नोलॉजी की स्टूडेंट्स नवजोत, मोनिका, जूही, तमन्ना और सोनाक्षी, गाय के गोबर और पराली का उपयोग करके नॉन टॉक्सिक वॉल पैनल्स विकसित कर रही हैं, जो पीवीसी पैनल्स का एक टिकाऊ विकल्प हो सकते हैं। 

ये इको-पैनल हल्के, थर्मल इंसुलेशन प्रदान करने वाले और वोलेटाइल आर्गेनिक कंपाउंड्स से पूरी तरह मुक्त होंगे। यह प्रोजेक्ट वेस्ट में कमी और इको फ्रेंडली कंस्ट्रक्शन प्रैक्टिसेज करने की दिशा में एक प्रभावी कदम है। सीजीसी लांडरां के चेयरमैन सतनाम सिंह संधू और प्रेसिडेंट रशपाल सिंह धालीवाल  ने इन प्रोजेक्ट्स को विकसित करने में स्टूडेंट्स के प्रयासों और समर्पण की सराहना की। 

उन्होंने कहा, “हमारे स्टूडेंट्स उद्देश्यपूर्ण नवाचार की भावना का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। इन प्रोजेक्ट्स के माध्यम से वे न केवल महत्वपूर्ण पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान कर रहे हैं, बल्कि बायोटेक्नोलॉजी को सामाजिक कल्याण, सतत विकास और आर्थिक सशक्तिकरण की शक्ति के रूप में रीडिफाइन भी कर रहे हैं।”

सीसीटी, की डायरेक्टर प्रिंसिपल डॉ. पलकी साहिब कौर ने कहा कि पराली जलाना और उसका निपटान एक गंभीर समस्या बनी हुई है। सीसीटी, सीजीसी लांडरां में हम छात्रों को ऐसे नवाचार विकसित करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं, जो इस चुनौती का टिकाऊ समाधान प्रदान कर सकें और हम ऐसे प्रयासों को निरंतर समर्थन देते रहेंगे। 

इन छात्र-नेतृत्वित इन्नोवेशंस से सीजीसी की सतत विकास, एप्लाइड बायोटेक्नोलॉजी और एंटरप्रेंयूर्शिप के प्रति प्रतिबद्धता स्पष्ट होती है। एग्रीकल्चर बाय प्रोडक्ट्स को वैल्युएबल रिसोर्स में बदलकर, ये प्रोजेक्ट न केवल महत्वपूर्ण एनवायर्नमेंटल चैलेंजेज का समाधान प्रस्तुत करते हैं, बल्कि स्टूडेंट्स को ऐसे इन्नोवेटर्स बनने में भी सक्षम बनाते हैं जो सोशल और इकनोमिक परिवर्तन को आगे बढ़ा सकते हैं।

 

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