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विश्व मधुमेह दिवस की पूर्व संध्या पर, डॉ. जितेंद्र सिंह ने भारत के सबसे बड़े समूह स्वास्थ्य अध्ययन का शुभारंभ किया

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि स्वास्थ्य ही विकसित भारत 2047 का निर्णायक पैरामीटर होगा, कोहार्ट स्टडीज को राष्ट्रीय अनिवार्यता बताया

Dr Jitendra Singh, Bharatiya Janata Party, BJP, Union Minister of Earth Sciences
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भुवनेश्वर , 13 Nov 2025

Last updated on: Nov 14, 2025, 14:31 IST

कल मनाए जाने वाले विश्व मधुमेह दिवस की पूर्व संध्या पर, केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), पीएमओ, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री, डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज यहाँ सीएसआईआर-आईएमएमटी में "लॉन्गिट्यूडिनल कोहोर्ट स्टडीज पर फीनोम नेशनल कॉन्क्लेव: कोहोर्ट कनेक्ट 2025" का शुभारंभ किया।

कोहोर्ट कनेक्ट को बीमारी के आनुवंशिक, जीवनशैली और पर्यावरणीय कारकों पर भारत का सबसे बड़ा साक्ष्य-आधारित अध्ययन बताया जा रहा है। उद्घाटन भाषण देते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि विश्व मधुमेह दिवस से ठीक एक दिन पहले हो रही इस चर्चा का विशेष महत्व है, क्योंकि मधुमेह जैसे मेटाबॉलिक संबंधी विकार  तेज़ी से एक बड़ी राष्ट्रीय स्वास्थ्य चुनौती के रूप में उभर रहे हैं। 

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि आज मधुमेह केवल एक नैदानिक स्थिति नहीं है, बल्कि यह वैस्कुलर, तंत्रिका संबंधी, और गुर्दे संबंधी जटिलताओं का एक संपूर्ण स्पेक्ट्रम है, जो इस क्षेत्र में वैज्ञानिक अनुसंधान को राष्ट्रीय योजना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है। विश्व मधुमेह दिवस की पूर्व संध्या पर, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि मधुमेह और अन्य बढ़ते मेटाबॉलिक विकारों के खिलाफ भारत की लड़ाई के लिए दीर्घकालिक वैज्ञानिक साक्ष्य द्वारा समर्थित भारतीय समाधानों के लिए भारतीय डेटा की आवश्यकता है।

मंत्री ने याद दिलाया कि मेटाबॉलिक विकार, विशेष रूप से टाइप-2 मधुमेह, जिसे कभी क्षेत्र-विशेष की बीमारी माना जाता था, अब जीवनशैली में बदलाव  और बदलते पर्यावरणीय पैटर्न के कारण पूरे देश में फैल गया है। जो स्थिति पहले केवल दक्षिण भारत में प्रमुख थी, वह अब पूरे भारत की चुनौती बन गई है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भारत एक साथ संक्रामक और गैर-संक्रामक बीमारियों दोनों से जूझ रहा है। 

मधुमेह और तपेदिक जैसे संक्रमणों के बीच के पारस्परिक संबंध के लिए विभाजित कार्यक्रमों के बजाय एकीकृत नीतिगत प्रतिक्रियाओं  की आवश्यकता है। डॉ. जितेंद्र सिंह ने रेखांकित किया कि भारत की फेनोटाइपिक विशिष्टता  को दशकों से स्वीकार किया गया है, लेकिन सीमित जीनोमिक और महामारी विज्ञान संबंधी बुनियादी ढाँचे  के कारण इसे कभी भी वैज्ञानिक रूप से सत्यापित नहीं किया जा सका। 

उन्होंने कहा कि सीएसआईआर के नेतृत्व वाले फीनोम इंडिया और किए जा रहे बड़े पैमाने के लॉन्गिट्यूडिनल कोहोर्ट अध्ययन जैसी पहलों के साथ, भारत अब सटीक रूप से यह पता लगा सकता है कि आनुवंशिकी, पर्यावरण, आहार और जीवनशैली भारतीय आबादी में रोगों की आशंका को कैसे आकार देते हैं।

मंत्री ने यह भी कहा कि यहाँ तक कि विदेशों में पीढ़ियों से रह रहे भारतीय भी मेटाबॉलिक विकारों के प्रति विशिष्ट संवेदनशीलता दर्शाते हैं, जो वंशानुगत लक्षणों की मौलिक भूमिका को उजागर करता है। मंत्री ने नैदानिक और ऐतिहासिक अंतर्दृष्टि साझा की, जो दर्शाती है कि वैश्विक चिकित्सा समझ कैसे विकसित हुई है पूर्व में इंसुलिन के अकाल वाले य़ुग में मधुमेह प्रबंधन से लेकर आज की आनुवंशिक चिकित्सा तक।

उन्होंने भारतीय आबादी के लिए उपयुक्त दीर्घकालिक साक्ष्य के बिना नई दवाओं और प्रौद्योगिकियों को अपनाने में सावधानी बरतने का आग्रह किया। उन्होंने याद किया कि एक समय पर रिफाइंड तेलों  को हृदय-अनुरूप बताकर बढ़ावा दिया गया था, लेकिन बाद में उन्हें भारत में बढ़ते कोरोनरी धमनी रोग से जोड़ा गया। 

यह उदाहरण सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी सिफारिशें करने से पहले सख्त, दीर्घकालिक, भारत-विशिष्ट अध्ययनों की आवश्यकता को पुष्ट करता है। सरकारी पहलों पर प्रकाश डालते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सीएसआईआर और जैव प्रौद्योगिकी विभाग दोनों ही मानव जीनोम अनुक्रमण पर सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। 

उन्होंने बताया कि लगभग 10,000 मानव जीनोम का अनुक्रमण पहले ही किया जा चुका है और एक मिलियन जीनोम का लक्ष्य तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने स्वदेशी रूप से विकसित फैक्टर VIII के साथ भारत के पहले सफल हीमोफीलिया परीक्षण का भी उल्लेख किया, जो उन्नत बायोमेडिकल अनुसंधान में भारत की बढ़ती क्षमताओं को रेखांकित करता है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने आगे कहा कि सरकार एक साथ डेंगू, मलेरिया और तपेदिक जैसी बीमारियों के लिए टीकों पर भी काम कर रही है, जबकि एआई-संचालित निदान, डिजिटल स्वास्थ्य प्लेटफॉर्म और क्वांटम-सक्षम समाधान भारत के चिकित्सा इकोसिस्टम का तेजी से हिस्सा बन रहे हैं। मंत्री ने दोहराया कि भारत की 70% आबादी 40 वर्ष से कम होने के कारण, रोकथाम भारत की भविष्य की स्वास्थ्य रणनीति का केंद्रीय स्तंभ होना चाहिए। 

उन्होंने कहा कि एक मज़बूत कोहोर्ट अध्ययन इकोसिस्टम भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप निवारक, रोगनिरोधी और चिकित्सीय मार्गों के लिए कार्रवाई योग्य डेटासेट उत्पन्न करेगा। उन्होंने सीएसआईआर संस्थानों, परियोजना अन्वेषकों और निजी क्षेत्र के भागीदारों की सराहना की कि उन्होंने एमओयू और उद्यम सहयोगों के माध्यम से विज्ञान, साक्ष्य निर्माण और अनुप्रयुक्त अनुप्रयोग  को एकीकृत करने वाला एक मंच तैयार किया है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने यह कहकर निष्कर्ष निकाला कि 2047 में भारत की स्वास्थ्य स्थिति ही विकसित भारत  के दृष्टिकोण को परिभाषित करेगी, और फीनोम इंडिया और कोहोर्ट कनेक्ट 2025  जैसी वैज्ञानिक पहलें उस लक्ष्य को प्राप्त करने में बुनियादी स्तंभों के रूप में काम करेंगी। हिप्पोक्रेट्स का हवाला देते हुए, उन्होंने कहा कि औजारों या दवाओं के बिना भी, एक डॉक्टर का ज्ञान ठीक कर सकता है; इसी तरह, भारत का सामूहिक वैज्ञानिक ज्ञान आने वाले दशकों में इसके स्वास्थ्य परिवर्तन को प्रेरित करेगा।

उद्घाटन सत्र में डॉ. रामानुज नारायण, निदेशक, सीएसआईआर-आईएमएमटी, डॉ. मैती (सीएसआईआर-आईजीआईबी), डॉ. कूटी, डॉ. देबाशीष, वरिष्ठ वैज्ञानिक, परियोजना अन्वेषक और मीडिया प्रतिनिधि उपस्थित थे। उन्होंने प्रेस को फीनोम इंडिया लॉन्गिट्यूडिनल कोहोर्ट के उद्देश्यों और उभरती हुई अंतर्दृष्टि के साथ-साथ सीएसआईआर-आईएमएमटी, भुवनेश्वर में आयोजित होने वाले आगामी लॉन्गिट्यूडिनल कोहोर्ट स्टडीज पर नेशनल कॉन्क्लेव: कोहोर्ट कनेक्ट 2025 के एजेंडे के बारे में जानकारी दी।

 

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