हिमाचल प्रदेष अपनी प्राकृतिक सुदरंता व देव संस्कृति के लिए देवभूमि के नाम से विष्वभर में प्रसिद्ध है। यहां की देव संस्कृति देष.विदेष से यहां आने वाले पर्यटकों को मोह लेती है। प्रदेष के गांव.गांव शहर.शहर में सुन्दर व आकर्षक देवी.देवताओं के मंदिर हैं। इन देवी.देवताओं की कई अनके चमत्कारी व अनोखी बातों की जानकारियां देखने को मिलती हैं। यहां के लोगों का सारा जीवन विभिन्न देवी.देवताओं से जुड़ा रहता है तभी तो सभी तरह के मेलों तीज.त्यौहारों व शादी.ब्याहों आदि में हमारे इन लोक देवताओं का अपना विषेष महत्व रहता है।वर्ष भर कांगडा जिला के तीन मुख्य शक्तिपीठों श्री ज्वालामुखी श्री ब्रजेष्वरी एंव श्री चामुण्डा नंदीकेष्वर धाम में श्रद्धालुओं का तांता रहता है लेकिन नवरात्रों के पावन पर्व पर इन शक्तिपीठों की आभा निराली ही होती है। शक्तिपीठों से जुड़ी प्रगाढ़ आस्था के वषीभूत होकर श्रद्वालु दूर.दूर से उपवास के साथ नंगे पांव पैदल यात्रा करके नतमस्तक होकर ढोल नगाड़े के साथ जय माता दी का उद्घोष करते हुए मां के दर्षन तथा आषीर्वाद पाने के लिये उमड़ पड़ते हैं ।इन शक्तिपीठों में वर्ष के दौरान चार नवरात्रों के अवसर पर मां के दर्षन और पूजा.अर्चना का विषेष महत्व होता है। यह नवरात्रे नव वर्ष सम्वत के आगमन पर चैत्र मास मेंए आषाढ़ मास में गुप्त नवरात्रे श्रावण मास में श्रावणाष्टमी नवरात्रे और अष्विनी मास में शरद नवरात्रे बड़ी श्रद्धा एवं आस्था के साथ मनाए जाते हैं। सुख.समृद्धि पाने के लिए शरद नवरात्रों में लोग शक्ति की अराधना लक्ष्मी रूप में करते हैं जिसका विषेष महत्व होता है। क्योंकि इसके उपरांत दीपावली का आगमन होता है। इस वर्ष शरद् नवरात्रों का आयोजन 5 अक्तूबर से 13 अक्तूबर तक किया जा रहा हैए जिसके लिये तीनों शक्तिपीठों में मन्दिर प्रबन्धन समिति द्वारा श्रद्धालुओं की सुविधा एवं सुरक्षा के सभी पुख्ता प्रबन्ध किये गये हैं।
शक्तिपीठों का प्रादुर्भाव माता पार्वती के यज्ञषाला में कूदकर आत्मदाह करने से जुड़ा है। धार्मिक गंरथों के अनुसार दक्ष प्रजापति महाराज द्वारा आदि काल में हरिद्वार के समीप कनखल नामक तीर्थस्थल पर आयोजित यज्ञ में अपने दामाद भगवान षिव को आमंत्रित न करने पर माता पार्वती ने स्त्रीहठ के वषीभूत होकर यज्ञ समारोह में बिना बुलाए शामिल होने का निर्णय लिया। परन्तु वहां भगवान षिव का अपमान होते देख वह यज्ञषाला में कूद गईं तथा भगवान षिव को मालूम होते ही उन्होंने मां का अधजला शरीर कंधे पर उठाकर ताण्डव नृत्य करना प्रारम्भ कर दिया जिससे पूरे ब्रह्मण्ड में प्रलय मच गई। तभी सभी देवताओं के आग्रह पर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्षन चक्र से माता पार्वती के अधजले शरीर के टुकडे़ करके भगवान षिव को भारमुक्त किया और जहां.जहां माता पार्वती के अंग गिरे वह कालांतर में शक्तिपीठ कहलाये। धर्मग्रंथों के अनुसार ज्वालामुखी में जिह्वा तथा नगरकोट धाम में माता का धड़ होने की विद्वानों ने पुष्टि की है।ज्वालामुखी मन्दिर विष्व का पहला ऐसा तीर्थस्थल हैए जहां आदिषक्ति भवानी किसी मूर्त रूप में न होकरए साक्षात् ज्योति के रूप में विराजमान है। इस मन्दिर में नवदुर्गा के रूप में नौ ज्योतियां प्राकृतिक रूप से आदिकाल से निरन्तर प्रज्जवलित हो रही हैं और श्रद्धालु इन ज्योतियों का दर्षन पाकर अपना सौभाग्य मानकर पुण्य प्राप्त करते हैं।इस शक्तिपीठ का इतिहास सोलहवीं शताब्दी के मुगल साम्राज्य से भी जुड़ा है। जनश्रुति के अनुसार मुगल सम्राट अकबर ने मां ज्वालाजी की परीक्षा के लिये ज्योति को बुझाने हेतू नहरए तबे इत्यादि का प्रयोग किया। परन्तु ज्योति ज्यों कि त्यों प्रज्जलित रही। अकबर सम्राट ने मां ज्वालाजी से क्षमा मांग कर अभिमान स्वरूप सोने का छत्र भेंट किया। परन्तु इसे चढ़ाते ही छत्र अधातु बन गया तथा मुगल सम्राट अकबर का अभिमान चूर.चूर हो गया। यह छत्र धरोहर के रूप में आज भी मन्दिर में श्रद्धालुओं के दर्षनार्थ मौजूद है। माता के हर गुणगान में अकबर के घमण्ड के चूर होने का उल्लेख मिलता है। नंगे.नंगे पैरी मां अकबर आयाए तवा फाड़कर निकली ज्वाला अकबर शीष नवाया इत्यादि पंक्तियां सोलहवीं शताब्दी से आज तक मां की गाथाएं लोकगीतों के रूप में गाई जाती हैं। ज्वालाजी मंन्दिर परिसर में नौ ज्योतियों के अतिरिक्त गोरखडिब्बी राधाकृष्ण मन्दिर तारामन्दिर लाल षिवालय पिलकेष्वर टेड़ा मन्दिर नागार्जुन अम्बिकेष्वर गणेष भैरव इत्यादि मन्दिर मौजूद हैं।
ब्रजेष्वरी धाम कांगडा में मां भवानी पिंडी रूप में अवस्थित हैं। यह मन्दिर सर्वधर्म का परिचायक है जिसमें हिंदू मुस्लिम सिख एवं ईसाई धर्म के मंदिरों की शैली स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है। इसी प्रकार श्री चामुण्डा नंदिकेष्वर धाम में माता चामुण्डा मूर्ति रूप में विद्यमान हैं और इसके साथ गुफा में भगवान षिव परिवार सहित षिवलिंग एंव अन्य देवताओं मूर्तियों के साथ विराजमान हैं। मन्दिर के साथ धौलाधार पर्वत से निकलने वाली नदी बाण गंगा श्रद्वालुओं के लिये स्नान एंव आकर्षण का केन्द्र है। मन्दिर के साथ बना शमषान घाट इस तीर्थ स्थल की अनेक दंत कथाआंे को दर्षाता है ।उपायुक्त कांगड़ा सी.ण्पॉलरासु के अनुसार इन तीर्थ स्थलों पर सुरक्षा के व्यापक प्रबन्ध किये गये हैं ताकि किसी प्रकार की कोई अप्रिय घटना होने की कोई संभावना न रहे। इसके अतिरिक्त मेले में यात्रियों की सुविधा के लिये ठहरने पेयजल शौचालय तथा पार्किंग व्यवस्था इत्यादि के पुख्ता प्रबन्ध किये गये हैं ताकि बाहर से आने वाले यात्रियों को कोई असुविधा न हो। जिला प्रषासन द्वारा मेले के दौरान इन शक्तिपीठों में शांति तथा सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के दृष्टिगत सम्बन्धित क्षेत्र में 4 से 14 अक्तूबर तक तीनों शक्तिपीठों में आग्नेयए धारदार शस्त्र तथा विस्फोटक सामग्री उठाने पर पूर्ण पाबन्दी लगाई गई है। इसके अतिरिक्त नारियल चढ़ाने तथा ऊंची आवाज में ढोल इत्यादि बजाने तथा पॉलीथीन एवं प्लास्टिक बैग इस्तेमाल पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है।मंदिर एवं देवालय जहां प्रदेष की समृद्ध संस्कृति का संरक्षण करते हैं वहीं पर इनमें लोगों की धार्मिक आस्था एवं अगाध श्रद्धा होने से लोगों में आपसी प्यारए सद्भाव परस्पर सहयोग के साथ.साथ राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता को बढ़ावा मिलता है।