मुख्य सचिव एस. रॉय ने कहा कि जलागम परियोजनाओं के कार्यान्वयन में विपणन, स्वयं सहायता समूहों की आजीविका के लिए चलाए जा रहे कार्य इत्यादि के विषय में विभिन्न एजेंसियों के साथ तालमेल के अनुसार आर्थिक मॉडल अपनाया जाना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि इन परियोजनाओं के कार्यान्वयन में भू-कटाव, जल संरक्षण को प्रोत्साहन तथा लोगों विशेषकर कृषक समुदाय को आर्थिक रूप से लाभान्वित करने जैसी मूलभूत बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए।मुख्य सचिव आज यहां एकीकृत जलागम प्रबंधन योजना की राज्य स्तरीय नोडल एजेंसी की छठी बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे।मुख्य सचिव ने जलागम प्रबंधन योजनाओं की दीर्घावधि सतत्ता पर बल देते हुए कहा कि यह तभी संभव है जब क्षेत्र विशेष में परियोजना के आरम्भ होने से पहले पूर्ण योजना तैयार की जाए। उन्होंने कहा कि यदि इस प्रकार उत्पादित होने वाले उत्पादों की ब्रांडिंग की जाए, हिस्सेदारों को चिन्हित किया जाए तो इससे ग्रामीण क्षेत्रों की आर्थिकी को मजबूत बनाने में सहायता मिलेगी। उन्होंने कहा कि प्रदेश में कृषि क्षेत्र की सफलता के लिए जल प्रबंधन आवश्यक है, इसलिए यह आवश्यक है कि विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करते समय सभी आवश्यक पहलुओं पर विचार किया जाए और इसके बाद नियमित अनुश्रवण सुनिश्चित बनाया जाए।
श्री रॉय ने कहा कि हिमाचल प्रदेश केंद्र सरकार की विश्व बैंक पोषित मध्य हिमालय विकास परियोजना से विशेष रूप से लाभान्वित हुआ है। यह परियोजना प्रदेश के 10 जिलों में कार्यान्वित की जा रही है। इसकी सफलता को देखते हुए केंद्र सरकार ने एकीकृत जलागम प्रबंधन परियोजना को प्रदेश में ग्रामीण विकास एजेंसी के माध्यम से आरम्भ किया है।उन्होंने कहा कि हालांकि कई पंचायतों में विभिन्न परियोजना क्षेत्र ‘ओवरलैप’ कर रहे हैं, किन्तु एकीकृत जलागम प्रबंधन परियाजना तथा हिमाचल प्रदेश मध्य हिमालय जलागम विकास परियोजना द्वारा परियोजनाएं आरम्भ करने से पूर्व अपनी गतिविधियों को तय किया जा सकता है ताकि लोग दोनों योजनाओं से लाभान्वित हों। उन्होंने कहा कि दोनों एजेंसियां विश्वसनीयता तथा सहयोग स्थापित करने के उद्देश्य के साथ-साथ ग्रामीण आर्थिकी को सुदृढ़ करने और आजीविका के साधन सृजित करने के लिए कार्यरत हैं।
उन्होंने कहा कि दोनों एजेंसियों को एक-दूसरे को सहायता प्रदान करनी चाहिए और एक ग्राम पंचायत में कार्य करते हुए ग्राम पंचायत स्तर पर ही ग्रामीण जनता के लाभ के अनुसार परियोजना क्षेत्र का निर्धारण करना चाहिए ताकि ‘ओवर लैपिंग’ न हो। इन दोनों योजनाओं के तहत प्रदान की गई धनराशि न तो स्थानांतरित की जा सकती है और न ही तय कार्य के अलावा किसी अन्य कार्य में व्यय की जा सकती है। इसलिए कई बार समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है और योजना क्षेत्र के एकीकरण की अनुपस्थिति में कुछ योजनाएं न तो लम्बे समय तक चल पाती हैं और न ही वांछित परिणाम दे पाती हैं।मुख्य सचिव ने कहा कि जलागम प्रबंधन एकांत में संभव नहीं है, क्योंकि इस कार्य में राज्य सरकार की विभिन्न प्रशासकीय इकाइयों को मिलजुल कर काम करना होता है। प्रभावी जलागम प्रबंधन योजनाओं के लिए आवश्यक है कि केंद्र सरकार की विभिन्न फलैगशिप योजनाओं को परिणाम के अनुसार कार्यान्वित किया जाना चाहिए। उन्होंने अंतरविभागीय समन्वय की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि इससे जलागम प्रबंधन के लिए आवश्यक अधोसंरचना सृजित करने में सहायता मिलेगी।बैठक में वर्ष 2013-14 के लिए 10 प्रस्तावों को भी स्वीकृति प्रदान की गई।प्रधान सचिव, ग्रामीण विकास श्रीमती उपमा चौधरी ने प्रदेश में एकीकृत जलागम प्रबंधन परियोजना के कार्यान्वयन के विषय में विस्तृत जानकारी प्रदान की। उन्होंने मुख्य सचिव को विश्वास दिलाया कि कार्यरत योजनाओं का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित बनाया जाएगा और लक्ष्यों को निर्धारित समयावधि में प्राप्त किया जाएगा।
ग्रामीण विकास विभाग के निदेशक श्री जे.सी. चौहान ने एकीकृत जलागम प्रबंधन परियोजना की वस्तुस्थिति के बारे में प्रस्तुतिकरण दिया।राज्य स्तरीय नोडल एजेंसी के परियोजना निदेशक श्री योगेश चौहान, केंद्र सरकार के प्रतिनिधि, प्रदेश से आए ग्रामीण विकास विभाग के परियोजना अधिकारी, वरिष्ठ अधिकारी तथा विभिन्न विभागों के अधिकारी इस अवसर पर उपस्थित थे।