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ब्लड ग्रुप एक सा न होने पर भी मुमकिन है किडनी ट्रांसप्लांट

मोहाली के फोर्टिस हॉस्पिटल में इस तकनीक का फायदा कई लोगों ने उठाया

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5 दरिया न्यूज

जालंधर , 19 Dec 2014

Last updated on: Dec 19, 2014, 00:00 IST

एक वक्त था जब किडनी दान करने वाले और मरीज के ब्लड ग्रुप एक से न होने पर ट्रांसप्लांट हो नहीं पाता था। पर अब लेटेस्ट और एडवांस्ड तकनीक की बदौलत यह बदल चुका है। मोहाली का फोर्टिस हॉस्पिटल सफलतापूर्वक एबीओ इंकंपैटिबल ट्रांसप्लांट करता आ रहा है जिससे कई मरीजों को मानो नई जिंदगी मिल रही हो। यह तकनीक इन मरीजों के लिए किसी वरदान से कम नहीं। फोर्टिस मोहाली से क्लीनिशियंस और सर्जन की एक टीम आज यहां मीडियाकर्मियों से मिलने पहुंची और बात की एबीओ इंकंपैटिबल ट्रांसप्लांट के विषय पर। ऐसे ही एक ट्रांसप्लांट के मरीज जालंधर के रहने वाले जतिंदर कुमार हैं जिनके पिता ने उन्हें अपनी किडनी दान की है, हालांकि दोनों का ब्लड ग्रुप अलग-अलग है।डॉक्टर्स की इस टीम में शामिल थे डॉ. (कर्नल) एच.जे.एस. गिल (सीनियर कंसल्टेंट - नेफ्रोलॉजी), डॉ. प्रियदर्शी रंजन (किडनी ट्रांसप्लांट सर्जन) और डॉ. अमित शर्मा (कंसल्टेंट - नेफ्रोलॉजी)। साथ ही थीं हेमाफेरेसिस एक्सपर्ट और ब्लड बैंक की हेड डॉ. अपरा कालड़ा।

मरीज जतिंदर कुमार का परिचय देते हुए डॉ. रंजन ने कहा कि यह उन 11 मरीजों में से एक हैं जिनका यह इंकंपैटिबल ट्रांसप्लांट किया गया। जतिंदर कुमार खास तौर से यूएसए से यह सर्जरी करवाने आए हैं। डॉ. रंजन ने कहा, 'पारंपरिक इलाज में ट्रांसप्लांट के लिए एक जैसे ब्लड ग्रुप की जरूरत पड़ती थी ताकि किडनी के काम करने का चांस बना रहे। हालांकि अब ऐसा कोई जरूरी नहीं कि डोनर और मरीज का ब्लड ग्रुप ट्रांसप्लांट के लिए एक जैसा हो। आज कल एबीओ इंकंपैटिबल ब्लड टाइप किडनी ट्रांसप्लांट एक सच्चाई है और फोर्टिस मोहाली में इस तरह के ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक किए जा रहे हैं जिसका सबूत जतिंदर कुमार का केस भी है। फोर्टिस मोहाली में ऐसे 12 से ज्यादा मरीजों का ट्रांसप्लांट हुआ है जिनमें से तीन हिमाचल प्रदेश से हैं।

डॉ. (कर्नल) गिल ने कहा कि दुनिया भर में उन मरीजों की गिनती लगातार बढ़ रही है जिनकी किडनी काम करना बंद कर देती है। ऐसे में किडनी ट्रांसप्लांट ही एकमात्र रास्ता है। इस तकनीक से अनगिनत जिंदगियां बचाना मुमकिन है। उन्होंने जानकारी दी कि एबीओ इंकंपैटिबल ट्रांसप्लांटेशन की तैयारी के लिए एक सरल सा ब्लड टेस्ट किया जाता है जिससे ब्ल्डस्ट्रीम में एंटीबॉडी की मात्रा जानी जाती है। ज्यादातर लोगों में एंटीबॉडी का इतना स्तर होता है जिसका इलाज मुमकिन है।डॉ. शर्मा ने इस तकनीक पर आगे बात करते हुए कहा कि इम्यून कंडीशनिंग जैसी नई तकनीक की बदौलत किसी भी ब्लड ग्रुप के अंगों को ट्रांसप्लांट करना मुमकिन है। यह उन लोगों के लिए वरदान है जिनके परिवार में समान ब्लड ग्रुप वाले डोनर नहीं हैं। इस प्रक्रिया में अगला कदम किडनी ट्रांसप्लांट सर्जरी को शेड्यूल करना और मरीज को प्री-ट्रांसप्लांट के लिए ट्रीटमेंट देना है जिससे ब्लड ग्रुप एंटीबॉडी कम हो सकें।

इन सभी मरीजों का प्लाज्माफेरेसिस करने वालीं डॉ. अपरा कालड़ा ने कहा, 'इन पेचीदा किडनी ट्रांसप्लांट में एक प्रक्रिया ऐसी भी की जाती है जहां मरीज के ब्लड प्लाज्मा में से एंटीबॉडीज को निकाल दिया जाता है। इसे प्लाज्माफेरेसिस कहा जाता है। यह सुनिश्चित करता है कि मरीज किसी दूसरे ब्लड ग्रुप वाले रिश्तेदार से किडनी ले सकता है और यह उसके शरीर में बिना किसी दिक्कत के अपनी जगह बना लेगी। 'यूएसए के जॉन हॉप्किंस कॉम्प्रीहेंसिव ट्रांसप्लांट सेंटर में प्रो. रॉबर्ट मॉन्टगोमरी के साथ ऑफिशियल ट्रेनिंग ले चुके डॉ. रंजन ने बताया कि पहले समय में जब भी आप किसी दूसरे ब्लड ग्रुप का ट्रांसप्लांट ग्रहण करते थे, आपका शरीर उसे रिजेक्ट कर देता था पर अब ऐसा नहीं। ऑपरेशन के दो हफ्तों बाद दवाइयों और इलाज का रुटीन ठीक वैसा ही हो जाता है जैसा कि कंपैटिबल ब्लड ग्रुप ट्रांसप्लांट मरीजों के केस में होता है।

 

 

Tags: Fortis

 

 

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