कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मंगलवार को कहा कि नेहरूवादी सामंजस्य के सामने आज चुनौती खड़ी है, जबकि देश इसी मजबूत बुनियाद पर खड़ा है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की 125वीं जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित करते हुए सोनिया ने कहा कि सिर्फ लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और समग्रता के सिद्धांतों का पालन करने की ही आवश्यकता नहीं है, बल्कि उन्हें मजबूत करने की कठिन लड़ाई भी लड़ने की जरूरत है। गांधी ने कहा, "आज के भारत में नेहरूवादी सामंजस्य के सामने चुनौती खड़ी है। यह वह दृढ़ बुनियाद है, जिसपर देख खड़ा हुआ था।"सोनिया ने कहा कि दो दिवसीय सम्मेलन ने अंतर्राष्ट्रीय रुचि पैदा की है और सामान्य सत्र में स्वीकृत घोषणा पत्र नेहरू के मूल्यों के प्रति वचनबद्धता जाहिर करता है।
इसके पहले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि नेहरू के स्वतंत्रता सेनानी, एक महान संवेदना और मजबूत प्रतिबद्धताओं के नेता थे। उन्होंने कहा कि नेहरू ने समाजवाद को सिर्फ आर्थिक सिद्धांतों के रूप में नहीं देखा, बल्कि एक जीवन के तरीके रूप में देखा, जो व्यक्ति की आदतों और प्रवृत्ति में एक प्रभावी बदलाव लाता है। सिंह ने कहा, "भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू ने सामाजिक न्याय के साथ विकास को बढ़ावा देने के लिए डिजान की गई एक व्यावहारिक कार्ययोजना तैयार की। मिश्रित अर्थव्यवस्था, जनता का सहअस्तित्व और निजी क्षेत्र नेहरू की विचार प्रक्रियाओं के एक महत्वपूर्ण अवयव थे। नेहरू के लिए समाजवाद मुख्यरूप से समता और समानता के लिए एक जुनून था।"मनमोहन ने कहा कि नेहरू ने अपनी प्रतिभा के जरिए समाजवाद को वैश्विक संदर्भ में भारत के लिए प्रासंगिक बनाया। मनमोहन सिंह ने कहा कि नेहरू का वैश्विक दृष्टिकोण दुनिया के हर कोने में आज भी प्रासंगिक है।
पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा, "जहां संघर्ष और हिंसा मनुष्य के अंदर पैठ बनाती, वहा नेहरू शांति और सद्भाव की बात करते, और उन्होंने एक लोकतांत्रिक व बहुपक्षीय वैश्विक व्यवस्था को बढ़ावा देने का प्रयास किया, जहां एकतरफा के बदले सामंजस्य निर्माण निर्दिष्ट सिद्धांत हो।"मनमोहन ने कहा कि नेहरू ने भारतीयों को सिखाया कि अंतर्राष्ट्रीय मामलों में बगैर किसी भय या पक्षपात के स्वतंत्र होकर निर्णय लें। उन्होंने कहा, "उन्होंने हमें एक व्यवहार्य सामंजस्य निर्माण का मूल्य भी सिखाया। यह अन्य दृष्टिकोण के लिए सहिष्णुता हासिल करने की क्षमता है।"सिंह ने कहा कि गुटनिरपेक्ष आंदोलन (नाम) के सिद्धांत उभरते और विकासशील देशों को अंतर निर्भर वैश्विक अर्थव्यवस्था व राजनीति के समान प्रबंधन के लिए सहयोग में मददगार हो सकते हैं।
उन्होंने कहा, "वास्तव में नाम के प्रमुख सिद्धांत अभी भी प्रासंगिक हैं और 21वीं सदी में विश्व राजनीति में एक अधिक सक्रिया भूमिका निभाने में भारत की मदद कर सकते हैं।"मनमोहन ने कहा, "नेहरू के लिहाज से भारत का विचार अनेकता में एकता का विचार है।"उन्होंने कहा, "बहुलतावाद का विचार, यानी जहां सभ्यताओं का संघर्ष न हो, सभ्यताओं के एक संगम की दिशा में काम करने की संभावना की जड़ में निहित है। इस विचार की सार्वभौमिक प्रासंगिता है। संघर्ष और नफरत से घिरी दुनिया में ये विचार सूर्य की एक किरण की तरह है, जो हममें आशा का संचार करते हैं और आम मानवता में हमारे विश्वास को तरोताजा करते हैं।"