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कुल्लू के शाईरोपा में 24 से 26 मई को वन अधिकार कानून पर होगा देश व्यापी सम्मेलन

देश भर से आयेंगे डेढ़ सौ प्रतिनिधि, वनाधिकार के साथ होगी विभिन्न मसलों पर गंभीर चर्चा

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5 दरिया न्यूज ( धर्मचंद यादव)

कुल्लू , 23 May 2013

Last updated on: May 23, 2013, 00:00 IST

हिमाचल प्रदेश में वन अधिकार कानून 2006 को लागू करने में जानबुझ कर जल विद्युत परियोजनाओं व वन विभाग के दबाव के कारण किये जा रहे विलंब व संवैधानिक अवहेलना को ले कर हिमालय नीति अभियान 24-25-26 मई को शाई रोपा, बन्जार, कुल्लू में देशव्यापी सम्मेलन का आयोजन  कर रही है। इस में देश भर से 50 व प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों के 150 प्रतिनिधि भाग लेंगे। यह जानकारी देते हुये हिमालय नीति अभियान के प्रमुख व प्रदेश के प्रमुख पर्यावरणविद कुलभुषण उपमन्यु बताया कि हिमाचल सरकार, सभी राजनैतिक दलों व सामाजिक संगठनों को भी सम्मेलन में भाग लेने का निमंत्रण दिया गया है ताकि इस मसले पर आम सहमती बन सके। वनाधिकार कानून-2006, जनवरी 2008 से पूरे देश में लागू है, परन्तु हिमाचल प्रदेश की पिछली सरकार ने इसे जानबूझ कर अमल में नहीं लाया। अप्रैल 2008 को पहले चरण में प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में यह कानून लागू करने की प्रक्रिया शुरू की गई परन्तु अभी तक भी अधिकारों के हस्तांतरण का काम अधुरा पड़ा है।  जन दवाब व केन्द्रिय सरकार के बार-बार स्पष्टीकरणों के बाद 27 मार्च 2012 को प्रदेश सरकार ने गैर आदिवासी इलाकों में अन्य वन निवासी श्रेणी के लिए इस कानून को लागू करने के आदेश जारी किये। जिला व उप-मण्डल स्तर की वन अधिकार समितियों के गठन के आदेश सभी जिलाधीशों को जारी हुए परन्तु एक साल बाद भी इन समितियों का गठन नहीं हो पाया है। 

उन्होंने बताया कि इस वर्ष हिमाचल सरकार ने प्रदेश में 7 अप्रैल 2013 को आयोजित होने वाली ग्राम सभाओं की बैठक में  आदिवासी एवम अन्य परम्परागत वन निवासी वन अधिकार मान्यता  कानून -2006  के तहत वन अधिकार कमेंटियॉं गठित करने का  ऐजेंडा शामिल किया गया था। ग्राम सभाओं में ऐजेंडे की सूची दी गई जिस में वन अधिकार कमेंटी गठित करना शामिल था परन्तु न तो नियम की प्रति व न ही गठन के तरीके का हवाला संलग्न था। जिस कारण ग्राम सभाओं में कमेंटियों का गठन नहीं हो पाया है और जहां इनका गठन हुआ भी वह भी कानून सम्मत नहीं है।उपमन्यु ने बताया कि जल विद्युत परियोजनाओं वन भूमि हस्तांतरण में संवैधानिक अवहेलना इस कानून के प्रावधानों के मूताबिक किसी भी तरह की वन भूमि का गैर वानिकी कार्यो के लिए तब तक हस्तांतरण नहीं हो सकता जब तक यह कानून अमल में ला कर वन निवासियों के वन अधिकार के दावों को निपटा कर उन्हें सौंपा न जाए। परन्तु प्रदेश में 2008 के बाद वन  भूमि हस्तांतरण के कई मामले सामने आए हैं। खास कर जल विद्युत परियोजनाओं से संबंधित हस्तातरण बड़े पैमाने पर हुए। हिमाचल सरकार के अधिकारीयों व मुख्य मन्त्री ने वर्ष 2012 में वन व पर्यावरण मंत्रालय को पत्र लिख कर अनुरोध किया था कि प्रदेश में जल विद्युत परियोजनाओं के वन हस्तांतरण के मामलों में वन अधिकार कानून को अवरोध न माना जाए, क्योंकि यहां वन अधिकार अंग्रेजों के समय हुए बन्दोवस्तों में दर्ज कर लिए गए हैं। पर्यावरण व वन मंत्रालय ने भी जवाबी पत्र में प्रदेश सरकार को इस कानून के प्रावधानों को अमल में लाने से छुट दे दी और केवल जिलाधीश के प्रमाण पत्र की शर्त लगाई। कब्जा हटाओ अभियान में संवैधानिक अवहेलना वनाधिकार कानून-2006 एक विशेष अधिनियम है, जो इस से पहले के वन व अन्य अधिनियमों के प्रावधनों को रोकता है। इस कानून में यह प्रावधान है कि जब तक सरकार इस कानून के अनुसार आदिवासी एवं परम्परागत अन्य वन निवासियों के वन अधिकारों के दावों का निपटारा पुरा नहीं कर लेती, तब तक वन भूमि पर हुए किसी तरह के हस्तक्षेप व कब्जा को हटाने की कार्यवाही किसी भी वन व अन्य कानूनों के आधार पर नहीं की जा सकती है। जबकि आज कल वन विभाग ने कांगड़ा, सिरमौर व प्रदेश के अन्य हिस्सों में न्यायलय के आदेशों की आड़ में कब्जा हटाओ अभियान चला रखा है तथा वन निवासियों के कई घर तोडे जा चुके हैं। 

कुलभुषण उपमन्य का कहना है कि यह कार्यवाही गैर कानूनी हुई है और संवैधानिक अवहेलना के दायरे में आती है।हिमाचल प्रदेश में वन निवासी समुदाय इस कानून के अनुसार प्रदेश में वन निवासी श्रेणी में तीन परम्परागत वन उपभोगी समूह शामिल हैं। आदिवासी इलाकों में रहने वाले परम्परागत वन उपभोगी समूह। गैर आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले घुमंतू पशुचारी समुदाय जैसे गद्दी, गूज्जर व अन्य पशुपालक जिनमें आदिवासी व गैर आदिवासी परम्परागत वन उपभोगी समूह शामिल हैं। गैर आदिवासी इलाकों में रहने वाले परम्परागत वन उपभोगी अन्य वन निवासी समुदाय-वन बर्तनदार भी शामिल हैं। ऐसे में प्रदेश की लगभग 95 प्रतिशत आबादी वन निवासी श्रेणी में आ जाती है जिन्हें इससे फायदा होगा।  

हिमालय नीति अभियान के प्रमुख व प्रदेश के प्रमुख पर्यावरणविद कुलभुषण उपमन्यु के मुताबिक उक्त तीनों श्रेणीयों के परम्परागत वन निवासियों को न्यायोचित तरीके से उनके वन अधिकार सौंपने होंगे। वन अधिकार कानून हिमाचल प्रदेश के 67 प्रतिशत भूभाग पर भूमि के उपयोग, संरक्षण व प्रबन्धन की नई व्यवस्था, व वन उत्पादों के स्वामित्व में बदलाव को नए ढग़ से परिभाषित करेगा। इस के लिए वर्तमान में चल रही वन व सरकारी भूमि की भू व्यवस्था  में बदलाव लाना होगा। यह प्रक्रिया एक तरह से पूरा बन्दोवस्त जैसी होगी। उनका कहना है कि यह एक महत्वपूर्ण कानून है जिस के तहत सरकारों द्वारा सदियों से दी जा रही वन बतर्नदारी रियायतों को कानूनी अधिकार का दर्जा मिलेगा। वह सभी वन निवासी जो 13 दिसम्बर 2005 से पहले आजिविका के लिए वन भूमि पर निर्भर है और वन भूमि से लघु वन उपज-घास, पती, ईन्धन, जड़ी बूटी इत्यादी व वन भूमि पर रिहायश तथा खेती करता है का उसे अधिकार प्राप्त हो जाएगा। सरकार अपने प्रदेश वासियों को यह कानूनी अधिकार देने के बजाए कम्पनियों की हित पोशक बनती दिख रही है। ऐसे में प्रदेश में बड़े आन्दोलन के हालात बन सकते है।

उपमन्यु ने कहा कि हिमालय नीति अभियान  मांग करती है कि  वन अधिकार कानून 2006 के प्रावधानों का उलंघन करने वालों पर  संवैधानिक अवहेलना की कार्यवाही की जाए। तथा वन अधिकार कानून लागू करने की प्रकिया पूरी राजनैतिक ईच्छा शक्ति से शुरू की जाए। ग्राम सभा में वन अधिकार समितियों के गठन से पहले प्रदेश भर में वन अधिकार कानून की जानकारी के लिए जागरूकता अभियान चलाया जाया तथा उप मण्डल, जिला व राज्य स्तर की समितियों का तुरन्त गठन किया जाए। इसके साथ ही  हिमाचल प्रदेश में वन विभाग द्वारा चलाया गया कब्जा हटाओ अभियान व कम्पनियों को वन भूमि के हस्तांतरण की प्रक्रिया को तब तक रोका जाए, जब तक कि  सभी वन निवासियों के वन अधिकारों के दावों को इस कानून के अनुसार निपटाया न जाए व उन्हें सौंपने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती। 

उन्होंने मांग की है कि हिमाचल सरकार को कानून के दायरे में व लोक हित में उच्च न्यायलय में कब्जा हटाने के न्यायलय के आदेश के स्थगन बारे रिव्यू पटीशन दायर करनी चाहिए। यह प्रक्रिया पूरी होने तक वन विभाग द्वारा चलाए जा रहे कब्जा हटाओ अभियान को रोकाने के आदेश जारी हों व लोगों पर दर्ज मुकदमें वापिस लिए जाऐं। यह केन्द्रिय सरकार का एक फलैगशिप कार्यक्रम है और इसे अमल में लाने के लिए गम्भीर है। ऐसे में लगभग 95 प्रतिशत आबादी के वन अधिकारों को ध्यान में रख कर प्रदेश सरकार को भी पूरी राजनैतिक ईच्छा शक्ति के साथ न्याय पूर्ण तरीके से वन अधिकार प्रदेश की जनता को सौंपने के लिए तैयार होना चाहिए। 

हिमालय नीति अभियान के प्रमुख व प्रदेश के प्रमुख पर्यावरणविद कुलभुषण उपमन्यु बताया कि सम्मेलन में प्रदेश में वन अधिकार कानून को लागू करवाने, सामुदायिक वन प्रबन्ध व संरक्षण पर चर्चा होगी इस के लिए प्रदेश व्यापी जन अभियान का आवाहन किया जाएगा। अगर सरकार गैर कानूनी रूप से वन भूमि का व्यवसायिक परियोजनाओं को हस्तंातरण व कब्जा हटाओ अभियान नहीं रोकती तो प्रदेश स्तर पर बड़े आन्दोलन के लिए कमर कसी जाएगी व संवैधानिक अवहेलन करने वाले सभी दोषी अधिकारियों पर कानूनी कार्यवाही की जाएगी। 

 

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