दियोटसिद्ध मंदिर ट्रस्ट पर श्रद्धालुओं की आय से अर्जित धन के दुरुपयोग के गंभीर आरोप लगे हैं। मंदिर के महंत श्रीश्रीश्री 1008 राजेंद्र गिरि ने कहा है कि मंदिर के धन को बिना किसी योजना के टैंपल एक्ट के नियमों को ताक पर रखकर बर्बाद किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्य यह है कि इतनी बड़ी व्यवस्था में किसी की कोई जवाबदेही फिक्स नहीं की जाती है। उन्होंने कहा है कि करोड़ों के चढ़ावे के बावजूद श्रद्धालु दियोटसिद्ध मंदिर परिसर में सुविधाओं से वंचित हैं, लेकिन मंदिर के चढ़ावे से लोग करोड़ों की पगार ले रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि बिना किसी योजना व मनमर्जी के राज के चलते करोड़ों के चढ़ावे को सालाना इधर-उधर फूंका जाता है। महंत श्रीश्रीश्री 1008 राजेंद्र गिरि ने आरोप लगाया कि 2010 में ट्रस्ट द्वारा शुरू की गई गौशाला का निर्माण अभी तक अधर में लटका हुआ है। हैरानी यह है कि इस निर्माण पर करीब 32 लाख रुपए ट्रस्ट खर्च कर चुका है, लेकिन इस योजना का किसी को अभी तक कोई लाभ नहीं मिला है। ऐसे ही ट्रस्ट द्वारा करोड़ों की लागत से बनाए गए चकमोह अस्पताल का निर्माण पिछले 20 वर्षों से घिसट रहा था, उसके बाद मंदिर एक्ट नियमों को ताक पर रखकर ट्रस्ट ने इस करोड़ों की संपत्ति को सरकार के हवाले कर दिया। आलम यह है कि मात्र एक चिकित्सक के सहारे यह अस्पताल चल रहा है, जिसका लोगों को कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। महंत ने कहा कि हैरानी यह है कि मंदिर की संपत्ति को टेंपल एक्ट नियमों के विरुद्ध किस मंशा से सरकार के हवाले किया गया। इस गंभीर मामले पर अभी तक किसी की भी जवाबदेही फिक्स नहीं की गई है। धन की बर्बादी की इसी कड़ी में मंदिर ट्रस्ट ने दो करोड़ रुपए फूंककर पर्यटन विभाग का चला चलाया होटल खरीदा और अब वह होटल देखरेख के अभाव में दिनोंदिन खंडहर बनता जा रहा है। उन्होंने कहा है कि कर्मचारियों व अधिकारियों के दिनोंदिन बढ़ते वेतन भत्तों पर ट्रस्ट का सालाना बजट करीब-करीब पूरा खर्च हो जाता है। मंदिर धन के दुरुपयोग के ऊपर प्रतिबंध लगाने की जिम्मेदारी किसकी है यह कोई नहीं जानता है। महंत श्रीश्रीश्री 1008 राजेंद्र गिरी ने अंदेशा प्रकट किया है कि मंदिर के धन की बर्बादी यूं ही अगर जारी रही, तो शीघ्र यह मंदिर ओवर बजट हो जाएगा, जिसकी जवाबदेही से मंदिर ट्रस्ट या सरकार हरगिज नहीं बच सकते हैं। महंत ने कहा कि हैरानी तो यह है कि पिछले 30 वर्षों से करोड़ों रुपए विभिन्न योजनाओं पर फूंकने के बावजूद मंदिर ट्रस्ट अभी तक आय का कोई स्रोत नहीं बना पाया है और सारी व्यवस्था अभी भी श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए धन पर निर्भर है।