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कानन देवी : अपने दौर की सुपरस्टार जो एक समय हुईं बेघर, फिर परदे पर ऐसा जादू बिखेरा कि सबको बना लिया अपना दीवाना

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Armaan

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नई दिल्ली , 16 Jul 2026

Last updated on: Jul 16, 2026, 16:28 IST

कुछ कहानियां सिर्फ एक कलाकार की नहीं होतीं, वे पूरे दौर का इतिहास बन जाती हैं। ऐसी ही कहानी है कानन देवी की, जिन्होंने भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर में ही एक बहुत बड़ा नाम बना लिया था। उन्हें संघर्ष करना पड़ा और अपने मजबूत इरादों और आजाद व्यक्तित्व के दम पर वह खुद एक अद्भुत मिसाल बनीं। 22 अप्रैल 1916 को पश्चिम बंगाल के हावड़ा में जन्मी कानन का बचपन बीता भी नहीं था, सिर पर पिता का साया उठ चुका था।

पिता के निधन के बाद वे अपनी मां के साथ बिल्कुल अकेली रह गईं। बताया जाता है कि उन्होंने अपनी पढ़ाई भी पूरी नहीं की थी। परिवार में आर्थिक संकट था और गुजारा करने के लिए नातेदारों के यहां काम करने के अलावा कोई विकल्प बाकी नहीं था। वहीं, रिश्तेदारों के यहां रहना नौकरों से भी बदतर था। कुछ लेखों में जिक्र मिलता है कि जब एक दिन मां के हाथ से चीनी की प्लेट टूट गई थी, तब उन्हें इतना जलील किया गया कि वे घर छोड़ने को मजबूर हो गईं।

अक्सर कहा जाता है कि जब किस्मत एक दरवाजा बंद करती है तो दूसरा दरवाजा भी खोलती है। कानन देवी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। कानन बहुत छोटी थीं, तब उनके एक शुभचिंतक तुलसी बनर्जी, जिन्हें वे बड़े प्यार से काका बाबू कहकर पुकारा करती थीं, ने कानन का परिचय मदन थिएटर से कराया। कनन ने मूक फिल्मों के दौर में कलकत्ता के मदन थिएटर में बाल कलाकार बाला के रूप में अपने करियर की शुरुआत की।

वे मूक फिल्मों के दौर की एकमात्र ऐसी कलाकार थीं, जिन्होंने बोलती फिल्मों में सहजता से कदम रखा। 1926 में जब उम्र लगभग 10 बरस थी, तब उन्हें फिल्म 'जय देव' में एक छोटा सा रोल मिला था। कानन ने अपने शुरुआती दौर में मदन थिएटर के साथ लगभग 5 फिल्मों में काम किया। इसके बाद 1933 से 1936 तक वे 'राधा फिल्म' के साथ जुड़ीं।

1931 की फिल्मों 'जोरे बारात', 'खूनी कौन' और 'मां' में कानन ने अभिनय किया। कुछ लेखों में जिक्र मिलता है कि पीसी बरुआ ने उन्हें अपनी सदाबहार क्लासिक फिल्म 'देवदास' में पारो का रोल करने का ऑफर भी दिया। राधा फिल्म्स के साथ कॉन्ट्रैक्ट की वजह से कानन यह ऑफर स्वीकार नहीं कर सकीं लेकिन अपने पूरे करियर के दौरान उन्हें इस फिल्म का हिस्सा न बन पाने का अफसोस रहा।

कानन बाला 1936 में अपने सुनहरे दौर में कोलकाता के मशहूर 'न्यू थिएटर्स' से जुड़ीं। देबाकी बोस ने उन्हें अपनी बेहतरीन फिल्म 'विद्यापति' (1937) में एक अहम रोल दिया। नजरुल इस्लाम के बनाए किरदार 'अनुराधा' के तौर पर अपनी शानदार एक्टिंग से उन्होंने फिल्म में अपनी छाप छोड़ी। लोग इनकी अभिनय के दीवाने थे और आवाज का जादू सिर चढ़कर बोलता था।

जब कानन सिनेमा में आईं तो वे एक शौकिया गायिका थीं लेकिन बाद में उन्होंने लखनऊ के मशहूर उस्ताद अल्लाह रक्खा से शास्त्रीय संगीत की ट्रेनिंग ली। इससे उन्हें हल्के शास्त्रीय या सेमी-क्लासिकल संगीत, जिसमें गजल गायकी भी शामिल थी, में महारत हासिल करने में मदद मिली। अपने वक्त के बहुत बड़े संगीतकार रायचंद बोरल के साथ कानन की जोड़ी खूब जमी।

बोरल साहब ने इन्हें सिखाया भी और हिंदी का उच्चारण भी दुरुस्त किया। आगे जाकर भीष्मदेव चटर्जी से भी इन्होंने संगीत की शिक्षा ली। अनादि कुमार दस्तीदार से उन्होंने रविंद्र संगीत भी सीखा। कानन ने 1941 के बाद बंगाली और हिंदी सिनेमा दोनों में काम करना शुरू किया। उस जमाने के सुपरस्टार केएल सहगल और पंकज मलिक के साथ इनकी जोड़ी जमी।

प्रमथेश बरुआ, पहाड़ी सान्याल, छवि विश्वास और अशोक कुमार जैसे दिग्गज कलाकारों की संगत भी इन्हें मिली। आज की पीढ़ी के लिए उनका नाम शायद उतना महत्वपूर्ण न हो लेकिन अपने समय में वे न सिर्फ मधुर संगीत की रानी थीं बल्कि भारतीय सिनेमा की एक ग्लैमरस सुपरस्टार भी थीं। हालांकि, उनकी निजी जिंदगी में उतार-चढ़ाव का दौर बना रहा।

बंगाल के एक बहुत बड़े शिक्षाविद के बेटे अशोक मैत्रा के साथ उनकी पहली शादी टूट गई क्योंकि समाज उन्हें एक सम्मानित सदस्य के तौर पर स्वीकार करने और पहचानने को तैयार नहीं था। 1947 में वह पश्चिमी दुनिया के सिनेमा की गतिविधियों को समझने के लिए विदेश गईं। उन्हें हॉलीवुड जाने और क्लार्क गेबल, स्पेंसर ट्रेसी, रॉबर्ट टेलर और अन्य दिग्गजों से मिलने की खुशी मिली।

लौटने पर उन्होंने अपना प्रोफेशनल करियर फिर से शुरू किया और अपनी खुद की 'श्रीमती प्रोडक्शंस' कंपनी शुरू करने से पहले कुछ फिल्मों में काम किया। इसी बीच, 1949 में उन्होंने हरिदास भट्टाचार्य से शादी की, जो बाद में एक डायरेक्टर के तौर पर फिल्मों से जुड़े। उन्होंने साथ मिलकर कई बंगाली फिल्में बनाईं और 1966 में कानन ने इंडस्ट्री से रिटायरमेंट ले लिया।

उनकी यादों की किताब 'सबेरे अमी नामी' में एक अनपढ़ झुग्गी-बस्ती की लड़की से एक मशहूर सोशल सेलिब्रिटी बनने तक के उनके सफर का ब्योरा मिलता है। 17 जुलाई 1992 को कलकत्ता में उनका निधन हो गया था।

 

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