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चार साल की उम्र में थामा सितार, 18 की उम्र में आकाशवाणी तक पहुंच गए थे पंडित देवब्रत चौधरी

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मुंबई , 29 May 2026

Last updated on: May 30, 2026, 12:51 IST

भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में पंडित देवब्रत चौधरी को लोग प्यार से देबू चौधरी कहते थे। उन्होंने अपने सितार की धुन से दुनिया भर में लोगों के दिलों को जीते। उनकी जिंदगी की सबसे खास बात यह थी कि जिस उम्र में बच्चे ठीक से स्कूल जाना भी शुरू नहीं करते, उस उम्र में देबू चौधरी ने हाथों में सितार को थाम लिया था।

महज चार साल की उम्र में उन्होंने सितार उठाया और फिर पूरी जिंदगी उसी संगीत को समर्पित कर दी।  पंडित देवब्रत चौधरी का जन्म 30 मई 1935 को रामगोपालपुर में हुआ था, जो आज बांग्लादेश का हिस्सा है। बचपन से ही उनका मन संगीत में लगता था। बहुत छोटी उम्र से ही उनका रुझान सितार की ओर बढ़ने लगा।

चार साल की उम्र में उन्होंने सितार बजाना शुरू कर दिया था। जिस उम्र में बच्चे खिलौनों से खेलते हैं, उस उम्र में देबू चौधरी सुरों की दुनिया में खो चुके थे। वहीं, 18 साल की उम्र में उनका पहला कार्यक्रम आकाशवाणी पर प्रसारित हुआ। उस दौर में आकाशवाणी पर प्रस्तुति मिलना किसी बड़े सम्मान से कम नहीं माना जाता था।

भारत विभाजन के बाद उनका परिवार कोलकाता आ गया। उस समय कोलकाता को देश की सांस्कृतिक राजधानी माना जाता था। वहां रहते हुए उन्हें कई बड़े कलाकारों को सुनने और समझने का मौका मिला। उन्होंने उस्ताद बड़े गुलाम अली खान और उस्ताद मुश्ताक अली खान जैसे महान कलाकारों से प्रेरणा ली।

बाद में उन्होंने उस्ताद मुश्ताक अली खान से विधिवत सितार की शिक्षा शुरू की। करीब 38 सालों तक उन्होंने अपने गुरु के साथ रहकर संगीत सीखा। देबू चौधरी सेनिया घराने से जुड़े थे। यह घराना तानसेन की परंपरा से माना जाता है और रागों की शुद्धता के लिए मशहूर है। उनकी शैली बाकी कलाकारों से अलग मानी जाती थी।

वह 17 फ्रेट वाला सितार बजाते थे, जिसे बजाना बेहद कठिन होता है। उनके सितार की आवाज इतनी मधुर होती थी कि लोग उसे 'गाने वाला सितार' कहते थे। उन्होंने संगीत शिक्षा में भी बड़ा योगदान दिया। वह दिल्ली विश्वविद्यालय के संगीत विभाग में प्रोफेसर और बाद में डीन भी रहे। उन्होंने हजारों छात्रों को संगीत सिखाया।

उनका मानना था कि संगीत सिर्फ कला नहीं, बल्कि इंसान को बेहतर बनाने का माध्यम है। पंडित देवब्रत चौधरी लेखक भी थे। उन्होंने भारतीय संगीत पर कई किताबें लिखीं और आठ नए रागों की रचना की। उन्होंने भारत के साथ-साथ विदेशों में भी भारतीय शास्त्रीय संगीत को नई पहचान दिलाई। 

अमेरिका में उन्होंने दिन के अलग-अलग समय के हिसाब से 24 रागों की रिकॉर्डिंग भी की थी, जिसे एक अनोखा प्रयोग माना गया। भारतीय संगीत में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री और बाद में पद्मभूषण सम्मान से सम्मानित किया। इसके अलावा, उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित कई बड़े सम्मान मिले।

उनका नाम पंडित रविशंकर, उस्ताद विलायत खान और पंडित निखिल बनर्जी जैसे महान कलाकारों के साथ लिया जाता था। साल 2021 में कोरोना महामारी संक्रमण के कारण पंडित देवब्रत चौधरी की तबीयत बिगड़ गई और उन्हें दिल्ली के गुरु तेग बहादुर अस्पताल में भर्ती कराया गया। 1 मई 2021 को उन्होंने अंतिम सांस ली।

 

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