Wednesday, 22 July 2026

 

 

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पटियाला के ड्राइवर की मां ने कैंसर को हराया ; मुख्यमंत्री सेहत योजना बनी मुश्किल समय की सहारा

योजना के तहत कवर किया गया 8 लाख रुपये से अधिक का इलाज

Mukh Mantri Sehat Yojna, Chandigarh, Patiala
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Gurpreet Singh

Gurpreet Singh

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चंडीगढ़/पटियाला , 18 Apr 2026

Last updated on: Apr 18, 2026, 15:35 IST

पटियाला के रहने वाले गुरपिंदर जीत सिंह की जिंदगी पांच महीने पहले अचानक ऐसे मोड़ पर आ खड़ी हुई, जहां हर रास्ता मुश्किल नजर आने लगा था। उनकी 65 वर्षीय माता बलजीत कौर ने गंभीर बीमारी के कारण धीरे-धीरे खाना-पीना छोड़ दिया था। मजबूर और बेबस बेटे के लिए यह सिर्फ बीमारी नहीं, बल्कि रोज टूटती जा रही उम्मीदों का दर्द था।

गुरपिंदर जीत के अनुसार पहले निजी डॉक्टरों के पास दौड़-भाग की गई, फिर मां को राजिंद्रा अस्पताल, पटियाला रेफर कर दिया गया। दवाइयां चलीं, टेस्ट हुए, लेकिन हालत सुधरने की बजाय और गंभीर हो गई। जब रिपोर्ट आई तो जैसे आसमान ही ढह पड़ा—मां को बच्चेदानी का कैंसर था।

गुरपिंदर के लिए यह बहुत मुश्किल घड़ी थी, यह उस मां की जिंदगी का सवाल था जिसने उसे जन्म दिया और पाला-पोसा। आज वह जिंदगी और मौत से जूझ रही थी। बिना देरी किए वह मां को संगरूर के टाटा कैंसर अस्पताल ले गया। इलाज शुरू हुआ, लेकिन पहले ही झटके में 60 हजार रुपये से अधिक खर्च हो गए। 

एक ड्राइवर की सीमित आय के सामने यह राशि पहाड़ जैसी थी। गुरपिंदर के मन में एक ही सवाल था—“मां को कैसे बचाऊं?” कर्ज लेने की नौबत भी आ गई थी। तभी, जैसे अंधेरे में एक रोशनी की किरण उसके सामने आई। अस्पताल में उसे मुख्यमंत्री स्वास्थ्य योजना के बारे में पता लगा।

बिना और देरी किए गुरपिंदर ने वहीं रजिस्ट्रेशन करवा लिया। कुछ समय बाद ही उसके मोबाइल पर मैसेज आ गया और स्मार्ट कार्ड बन गया। इसके बाद जो हुआ, वह उसके लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। लाखों रुपये का इलाज—जिसमें महंगे टेस्ट, बार-बार कीमोथेरेपी, दवाइयां, ऑपरेशन, आईसीयू, वेंटिलेटर और अस्पताल में रहने-खाने तक का खर्च शामिल था—सारा खर्च सरकार ने उठाया।

गुरपिंदर की आंखें भर आती हैं जब वह कहता है, “मां तो मां होती है… उसे हर हाल में बचाना था। पैसे नहीं थे, लेकिन रब ने इस योजना के रूप में रास्ता दिखा दिया।” डॉक्टरों के लिए भी यह केस बहुत चुनौतीपूर्ण था। कैंसर बच्चेदानी से आगे बढ़कर लीवर और फेफड़ों तक फैल गया था। 

पहले तीन बार कीमोथेरेपी दी गई, लेकिन शरीर कमजोर होने के कारण साइड इफेक्ट सामने आए। फिर धीरे-धीरे डोज कम करके नौ बार और कीमोथेरेपी दी गई। इलाज के बाद ट्यूमर एक जगह सिमट गया और डॉक्टरों ने लगभग आठ घंटे लंबा ऑपरेशन करके उसे निकाल दिया। 

35 से 40 टांकों के साथ मां ने दर्द सहते हुए भी जिंदगी की डोर थामे रखी। मां ऑपरेशन के बाद दो-तीन दिनों के लिए आईसीयू में और वेंटिलेटर पर रहीं, फिर उन्हें वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। गुरपिंदर हर वक्त मां के पास बैठा रहता—कभी दवाई देता, कभी सिर सहलाता। 

आठ दिन अस्पताल में बिताने के बाद जब मां की हालत सुधरने लगी, तो जैसे उनकी दुनिया वापस आ गई। 24 नवंबर 2025 से शुरू हुआ यह सफर अभी भी जारी है। अगले इलाज और जांच के लिए वे मुल्लांपुर स्थित अस्पताल में फॉलोअप के लिए जाएंगे। 

कुछ दवाइयां जो अस्पताल में उपलब्ध नहीं थीं, उनका खर्च गुरपिंदर ने खुद उठाया, लेकिन बाकी सारा इलाज योजना के तहत मुफ्त हुआ। अस्पताल में गायनेकोलॉजी की डॉ. शिवाली ने सर्जरी के डॉक्टरों के साथ मिलकर ऑपरेशन किया।टाटा मेमोरियल के डॉक्टरों के अनुसार, इस सर्जरी पर दवाइयों को मिलाकर कम से कम 8 से 10 लाख रुपये का खर्च हुआ है।

दो बच्चों के पिता और एक साधारण ड्राइवर गुरपिंदर के लिए यह राहत शब्दों से परे है। वह कहता है, “अब सुकून है कि मां बिना इलाज के नहीं मरेगी… सरकार ने हमें उम्मीद दी है।” यह सिर्फ इलाज की कहानी नहीं, बल्कि एक बेटे के संघर्ष, मां के लिए प्यार और एक ऐसी योजना की कहानी है, जिसने मुश्किल वक्त में सहारा बनकर एक परिवार को टूटने से बचा लिया। 

यह सफर इस परिवार के लिए गंभीर बीमारी की कठोर हकीकत को बयान करता है, साथ ही यह भी दर्शाता है कि सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं और प्रभावशाली सरकारी मदद कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यह यकीनी बनाता है कि आर्थिक तंगी किसी भी व्यक्ति के जीवन बचाने वाले इलाज के रास्ते में रुकावट न बने।

 

Tags: Mukh Mantri Sehat Yojna , Chandigarh , Patiala

 

 

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