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14 अप्रैल : बाबासाहेब अंबेडकर की जयंती समानता और न्याय का उत्सव

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5 Dariya News

नई दिल्ली , 13 Apr 2026

Last updated on: Apr 14, 2026, 12:21 IST

हर साल 14 अप्रैल उस चेतना का उत्सव है, जिसने भारत को बराबरी की नजर से देखना सिखाया। यह दिन डॉ. भीमराव अंबेडकर का है, जिनका जीवन संघर्ष, शिक्षा और सामाजिक न्याय की ऐसी यात्रा है, जो आज भी समाज को दिशा देती है। मध्य प्रदेश की महू छावनी में 14 अप्रैल 1891 को जन्मे बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने बचपन से ही उस समाज का सामना किया, जहां जन्म ही पहचान तय कर देता था। भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पकार और सामाजिक न्याय के महान योद्धा डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती हर वर्ष 14 अप्रैल को अंबेडकर जयंती के रूप में मनाई जाती है।

उन्होंने दलितों के उत्थान और समाज में समानता एवं न्याय स्थापित करने के लिए आजीवन संघर्ष किया। सतारा, महाराष्ट्र में उनकी प्राथमिक शिक्षा और बॉम्बे के एलफिंस्टन हाई स्कूल से माध्यमिक शिक्षा पूरी हुई, लेकिन यह रास्ता उनके लिए आसान नहीं था। अनुसूचित जाति से होने के कारण उन्हें हर कदम पर भेदभाव झेलना पड़ा।

अपनी आत्मकथात्मक टिप्पणी 'वेटिंग फॉर ए वीजा' में उन्होंने उस पीड़ा को शब्द दिए, जब स्कूल में उन्हें आम नल से पानी पीने तक की अनुमति नहीं थी। उन्होंने लिखा कि कोई चपरासी नहीं, तो पानी नहीं। यह वाक्य उस दौर की सामाजिक व्यवस्था का आईना था। इन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने 1912 में बॉम्बे विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में बीए की उपाधि प्राप्त की।

उनकी प्रतिभा ने उन्हें सीमाओं से बाहर पहुंचाया और 1913 में बड़ौदा राज्य के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ की छात्रवृत्ति के सहारे वे अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित कोलंबिया विश्वविद्यालय पहुंचे। यहां उन्होंने 1916 में 'ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त' विषय पर अपनी मास्टर थीसिस प्रस्तुत की और 'भारत में प्रांतीय वित्त का विकास: शाही वित्त के प्रांतीय विकेंद्रीकरण में एक अध्ययन' विषय पर पीएचडी पूरी की।

कोलंबिया के बाद उनकी यात्रा लंदन पहुंची, जहां उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अर्थशास्त्र और ग्रेज इन में कानून की पढ़ाई शुरू की। हालांकि, आर्थिक कठिनाइयों के कारण उन्हें 1917 में भारत लौटना पड़ा, लेकिन उनका लक्ष्य अधूरा नहीं रहा। 1918 में सिडेनहैम कॉलेज, मुंबई में राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्रोफेसर के रूप में, उन्होंने न केवल पढ़ाया, बल्कि साउथबोरो समिति के सामने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की मांग रखकर राजनीतिक अधिकारों की नींव भी मजबूत की।

1920 में छत्रपति शाहूजी महाराज की सहायता, मित्रों के ऋण और अपनी बचत के बल पर वे फिर लंदन लौटे। 1922 में बैरिस्टर-एट-लॉ बने, एलएसई से एमएससी और डीएससी पूरी की, और उनकी डॉक्टरेट थीसिस 'रुपए की समस्या' के रूप में प्रकाशित हुई। यह केवल शैक्षणिक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि उस व्यक्ति की जीत थी जिसने हर बाधा को अवसर में बदला।

भारत लौटकर उन्होंने बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना की और समाज के वंचित वर्गों के लिए न्याय और समान अधिकारों की लड़ाई को संगठित रूप दिया। 1927 का महाड सत्याग्रह इस संघर्ष का प्रतीक बना, जहां उन्होंने सार्वजनिक संसाधनों तक समान पहुंच की मांग को आंदोलन का रूप दिया। उसी वर्ष बॉम्बे विधान परिषद में उनका प्रवेश हुआ, जहां उन्होंने नीति और अधिकारों की आवाज को संस्थागत रूप दिया।

1928 में साइमन आयोग के सामने अपनी बात रखते हुए, उन्होंने संवैधानिक सुधारों में वंचितों की भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग की। इसके बाद, 1930 से 1932 के बीच हुए गोलमेज सम्मेलनों में, उन्होंने अपने विचारों को वैश्विक मंच पर रखा। 1935 में गवर्नमेंट लॉ कॉलेज, मुंबई के प्रिंसिपल के रूप में उनकी नियुक्ति और बाद में वायसराय की कार्यकारी परिषद में श्रम सदस्य के रूप में उनकी भूमिका ने प्रशासनिक और नीतिगत स्तर पर उनके प्रभाव को और मजबूत किया।

1946 में संविधान सभा के सदस्य के रूप में उनका चयन उस ऐतिहासिक मोड़ की शुरुआत थी, जहां उनका विचार पूरे राष्ट्र का मार्गदर्शक बनने वाला था। 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद उन्हें संविधान सभा की मसौदा समिति का अध्यक्ष चुना गया। उन्होंने भारत के संविधान का मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया का नेतृत्व किया।

उनके इस योगदान को संविधान सभा के सदस्य महावीर त्यागी ने “मुख्य कलाकार” कहकर सम्मानित किया, जबकि डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उनके समर्पण और कार्यशैली की सराहना करते हुए माना कि जिस निष्ठा और उत्साह से उन्होंने काम किया, वह अद्वितीय था। स्वतंत्र भारत में भी उनका योगदान जारी रहा। 1952 में वे राज्यसभा के सदस्य बने, और उसी वर्ष कोलंबिया विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डॉक्टरेट से सम्मानित किया।

1953 में उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद से भी उन्हें एक और मानद उपाधि मिली। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि उस विचार के लिए था जिसने समाज को नई दिशा दी। लंबी बीमारी के चलते 1955 में उनका स्वास्थ्य गिरने लगा और 6 दिसंबर 1956 को दिल्ली में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी विरासत किसी एक जीवनकाल में सीमित नहीं रही।

 

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