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आज नई दिल्ली में डब्ल्यूएचओ का पारंपरिक चिकित्सा पर दूसरा वैश्विक शिखर सम्मेलन शुरू हुआ

जेपी नड्डा ने प्रतापराव जाधव की उपस्थिति में वैश्विक शिखर सम्मेलन के उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता की

Jagat Prakash Nadda, JP Nadda, BJP, Bharatiya Janata Party, Prataprao Jadhav, Second WHO Global Summit
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नई दिल्ली , 17 Dec 2025

Last updated on: Dec 18, 2025, 15:08 IST

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के वैश्विक शिखर सम्मेलन में पारंपरिक चिकित्सा और वैश्विक स्वास्थ्य प्रणालियों में संतुलन बहाल करने पर पूर्ण सत्रों का शुभारंभ हुआ। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री श्री जेपी नड्डा ने केंद्रीय मंत्री श्री प्रतापराव जाधव की उपस्थिति में आज नई दिल्ली के भारत मंडपम में पारंपरिक चिकित्सा पर दूसरे डब्ल्यूएचओ वैश्विक शिखर सम्मेलन का उद्घाटन किया। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अदनोम घेब्रेयेसस ने भी एक विशेष वीडियो संदेश साझा किया, जिसे उद्घाटन सत्र के दौरान चलाया गया। यह सत्र 17 से 19 दिसंबर 2025 तक आयोजित होने वाले तीन दिवसीय विशाल वैश्विक वैज्ञानिक सम्मेलन की शुरुआत का प्रतीक है। 19 दिसंबर 2025 को शिखर सम्मेलन के समापन समारोह में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के शामिल होने की उम्मीद है। 

“संतुलन की बहाली: स्वास्थ्य और कल्याण का विज्ञान और अभ्यास” विषय पर केंद्रित यह शिखर सम्मेलन विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और भारत सरकार के आयुष मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया जा रहा है। यह आयोजन संतुलित, समावेशी और टिकाऊ स्वास्थ्य प्रणालियों के साझा दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने के लिए दुनिया भर के नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, अपने देश के जानकार लोगों और सिविल सोसायटी के लीडर्स को एक साथ लाता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस अदनोम घेब्रेयेसस ने अपने विडियो संदेश में पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में भारत की साझेदारी और नेतृत्व की सराहना की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि स्वास्थ्य केवल तकनीक और उपचार के बारे में नहीं है, बल्कि संतुलन, गरिमा और मानवता के साझा ज्ञान के बारे में भी है।

उन्होंने कहा कि इस वर्ष की शुरुआत में विश्व स्वास्थ्य सभा ने डब्ल्यूएचओ वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा रणनीति 2025-2034 को अपनाया था। यह रणनीति विज्ञान और आंकड़ों के माध्यम से निर्णयों का मार्गदर्शन करने के लिए साक्ष्य आधार को मजबूत करने, प्रभावी विनियमन के माध्यम से सुरक्षा और गुणवत्ता सुनिश्चित करने, प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल से शुरू होने वाली राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणालियों में पारंपरिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा (टीसीआईएम) को एकीकृत करने और जैव विविधता, स्थिरता और सामुदायिक कल्याण के लिए इसके व्यापक मूल्य को उजागर करने पर केंद्रित है। 

उन्होंने आगे बताया कि इस रणनीति को अमल में लाने के लिए डब्ल्यूएचओ ने भारत में पारंपरिक चिकित्सा के लिए वैश्विक केंद्र की स्थापना की है। केंद्रीय मंत्री श्री प्रतापराव जाधव ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ भारत का सहयोग विज्ञान, मानकों और साक्ष्यों के माध्यम से पारंपरिक चिकित्सा को वैश्विक स्वास्थ्य सेवा की मुख्यधारा में लाने की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

2016 में साझेदारी शुरू होने के बाद से कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की गई हैं, जिनमें 2024 में आईसीडी-11 मॉड्यूल 2 का शुभारंभ शामिल है, जो आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी रुग्णता कोड को अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य वर्गीकरण में एकीकृत करता है। स्वास्थ्य प्रणाली के अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरण (आईसीएचआई) पर चल रहा कार्य और जामनगर में आगामी डब्ल्यूएचओ वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा केंद्र, जिसका निर्माण अक्टूबर 2025 में पूरा होने वाला है, पारंपरिक चिकित्सा की वैश्विक स्वीकृति, सामंजस्य और संस्थागत सुदृढ़ीकरण की दिशा में एक निर्णायक बदलाव को रेखांकित करता है।

श्री जाधव ने यह भी कहा कि भारत शिक्षा, अनुसंधान और क्षमता निर्माण के माध्यम से पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग का विस्तार करना जारी रखे हुए है। देश प्रतिवर्ष विदेशी नागरिकों को 104 छात्रवृत्तियां प्रदान करता है, इसने 26 देश-स्तरीय समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए हैं, विश्व स्तर पर 50 से अधिक संस्थानों के साथ सहयोग करता है और 15 विश्वविद्यालयों में आयुष पीठ और 43 देशों में आयुष सूचना प्रकोष्ठ स्थापित किए हैं। 

यूनाइटेड किंगडम में अश्वगंधा परीक्षण, जर्मनी में गुडुची अध्ययन और लातविया में आयुर्वेद आधारित मधुमेह अनुसंधान सहित सहयोगात्मक अनुसंधान पहल, साक्ष्यों का एक बढ़ता हुआ समूह उत्पन्न कर रही हैं। आयुष ग्रिड जैसे डिजिटल प्लैटफॉर्म और कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहित उन्नत प्रौद्योगिकियों का लाभ उठाते हुए भारत समकालीन वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने के लिए पारंपरिक ज्ञान का व्यवस्थित रूप से दस्तावेजीकरण और सत्यापन कर रहा है।

आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने इस बात पर प्रकाश डाला कि यह शिखर सम्मेलन पारंपरिक चिकित्सा पर पहले डब्ल्यूएचओ वैश्विक शिखर सम्मेलन और गुजरात घोषणापत्र की गति को आगे बढ़ाता है, जो विज्ञान आधारित, सतत और न्यायसंगत पारंपरिक चिकित्सा के प्रति साझा वैश्विक प्रतिबद्धता को पुष्ट करता है। उन्होंने डब्ल्यूएचओ और सदस्य देशों के एक प्रतिबद्ध भागीदार के रूप में भारत की भूमिका पर जोर दिया। 

साथ ही नीति, अनुसंधान और नवाचार के लिए एक वैश्विक केंद्र के रूप में जामनगर स्थित डब्ल्यूएचओ वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा केंद्र के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने यह भी बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा रणनीति 2025-2034 द्वारा निर्देशित इस शिखर सम्मेलन का उद्देश्य स्वास्थ्य व्यवस्थाओं में पारंपरिक चिकित्सा के विनियमन और एकीकरण को मजबूत करना, जैव विविधता और पारंपरिक ज्ञान की रक्षा करना और अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग करना है, जो सभी लोगों और पृथ्वी के लिए 'संतुलन बहाल करना' विषय पर आधारित हैं।

इस समारोह में मलेशिया से डॉ. गोह चेंग सून  और दक्षिण अफ्रीका से प्रो. मोटलालेपुला मात्साबिसा, जो पारंपरिक चिकित्सा पर दूसरे विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) वैश्विक शिखर सम्मेलन की संचालन समिति के सह-अध्यक्ष हैं; डब्ल्यूएचओ वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा केंद्र की कार्यवाहक निदेशक डॉ. श्यामा कुरुविला; दक्षिण अफ्रीका गणराज्य के स्वास्थ्य मंत्री आरोन मोत्सोलेदी;  चीन के पारंपरिक चीनी चिकित्सा के राष्ट्रीय प्रशासन के उप आयुक्त लुकी हुआंग; चिली से रोड्रिगो एडुआर्डो पैलालेफ मोनार्ड, संयुक्त राष्ट्र स्वदेशी मुद्दों पर स्थायी मंच (यूएनएफपीआईआई) के सदस्य और आयुष मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी सहित कई प्रतिष्ठित गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

इस कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण समानांतर सत्र था, जिसका शीर्षक था 'अश्वगंधा: पारंपरिक ज्ञान से वैश्विक प्रभाव तक - अग्रणी वैश्विक विशेषज्ञों के दृष्टिकोण', जिसे अश्वगंधा के चिकित्सीय लाभों पर नैदानिक साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए तैयार किया गया था। इस सत्र में अश्वगंधा (विथानिया सोम्निफेरा) के विकसित होते वैज्ञानिक, नियामक और सुरक्षा परिदृश्य की जांच करने के लिए अग्रणी अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ, नियामक और शोधकर्ता एक साथ आए। 

इस सत्र में अश्वगंधा के अनुकूलनकारी, तंत्रिका सुरक्षात्मक और प्रतिरक्षा-संशोधक गुणों के लिए इसकी बढ़ती वैश्विक मान्यता पर भी प्रकाश डाला गया, साथ ही सही पूर्व-नैदानिक और नैदानिक अनुसंधान, मानकीकरण, सुरक्षा मूल्यांकन और औषधि सुरक्षा निगरानी (फार्माकोविजिलेंस) के महत्व पर जोर दिया गया। 

विशेषज्ञों की प्रस्तुतियों और एक संवादात्मक पैनल चर्चा में वैश्विक मानकों में सामंजस्य स्थापित करने, साक्ष्य-आधारित सत्यापन को मजबूत करने और पारंपरिक ज्ञान की समाकलन को संरक्षित करते हुए अश्वगंधा को आधुनिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों में जिम्मेदारी से एकीकृत करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने पर जोर दिया 

उद्घाटन समारोह के बाद शिखर सम्मेलन में वैश्विक स्वास्थ्य प्रणालियों में संतुलन बहाल करने, ज्ञान शासन, जैव विविधता संरक्षण और समानता के प्रमुख आयामों की जांच करने के लिए केंद्रित पूर्ण सत्रों की एक शृंखला शुरू हुई।

पहला सत्र, अधिवेशन - 1 - संतुलन बहाल करना: 'स्वास्थ्य और कल्याण का विज्ञान और अभ्यास' नामक इस कार्यक्रम में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ), आयुष मंत्रालय, चीन के पारंपरिक चीनी चिकित्सा के राष्ट्रीय प्रशासन, दक्षिण अफ्रीकी स्वदेशी जानकारों के साथ-साथ कनाडा और न्यूजीलैंड के विशेषज्ञ भी शामिल हुए। इस संवाद ने ज्ञान तक पहुंच, शासन संरचनाओं और पृथ्वी के स्वास्थ्य में लगातार मौजूद असंतुलनों को रेखांकित किया और वैश्विक स्वास्थ्य समानता को आगे बढ़ाने के लिए विविध ज्ञान प्रणालियों को एकीकृत करने, वैज्ञानिक दृढ़ता को मजबूत करने और जैव विविधता की रक्षा करने के महत्व पर प्रकाश डाला।

अधिवेशन 1ए में इस बात का पता लगाया गया कि पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान वैश्विक स्वास्थ्य समझ की व्यापक निरंतरता के साथ कैसे मेल खाता है। इस सत्र में पारंपरिक चिकित्सा वैश्विक पुस्तकालय का परिचय दिया गया और यह जांच की गई कि विभिन्न संस्कृतियों में ज्ञान प्रणालियों को ऐतिहासिक रूप से कैसे महत्व दिया गया है या हाशिए पर रखा गया है। भारत, चीन, अफ्रीका, यूरोप और लैटिन अमेरिका के वक्ताओं ने वैज्ञानिक सत्यनिष्ठा सुनिश्चित करते हुए समकालीन स्वास्थ्य ढांचों में बहुल साक्ष्य मॉडल को शामिल करने के तरीकों पर चर्चा की।

अधिवेशन 1बी में पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान में समानता के विषय पर ध्यान केंद्रित किया गया। विशेष रूप से स्वदेशी ज्ञान के उपयोग, व्यावसायीकरण और अपर्याप्त मान्यता के ऐतिहासिक स्वरूपों को संबोधित किया गया। बोलिविया, डब्ल्यूआईपीओ, एआरआईपीओ, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और नागरिक समाज के पैनलिस्टों ने न्याय-आधारित शासन मॉडल और पारंपरिक जानकारों के लिए समान लाभ-साझाकरण प्रक्रिया की आवश्यकता पर बल दिया।

अधिवेशन 1सी में चर्चा पारिस्थितिक संतुलन और पृथ्वी के स्वास्थ्य की ओर मुड़ गई, जिसमें जैव विविधता संरक्षण और जलवायु-अनुकूल स्वास्थ्य रणनीतियों में पारंपरिक चिकित्सा की भूमिका की जांच की गई। ऑस्ट्रेलिया, केन्या, भारत, ग्वाटेमाला, इंडोनेशिया, मिस्र और युगांडा के विशेषज्ञों ने सांस्कृतिक ज्ञान, सतत पारिस्थितिक तंत्र और समग्र सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच अंतर्निहित संबंधों पर जोर दिया।

दिन के अंतिम सत्र, अधिवेशन 1 डी में पारंपरिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा (टीसीआईएम) के लिए शासन और संसाधन ढांचे पर चर्चा की गई। माली, तंजानिया, जर्मनी, इराक, मलेशिया और क्यूबा के वक्ताओं ने नीतिगत संरचनाओं को मजबूत करने, गुणवत्ता प्रणालियों में सुधार करने और सतत दृष्टिकोणों का समर्थन करने पर अपने विचार साझा किए, जिससे टीसीआईएम वैश्विक स्वास्थ्य प्रणालियों में प्रभावी ढंग से योगदान कर सके।

सत्रों ने सामूहिक रूप से इस समझ को मजबूत किया कि स्वास्थ्य व्यक्तियों, उनके समूहों और पर्यावरण के बीच संतुलन में गहराई से निहित है। पर्यावरणीय दबावों, संरचनात्मक असमानताओं और शासन संबंधी कमियों के कारण यह संतुलन तेजी से बिगड़ रहा है। ऐसे में वक्ताओं ने समग्र दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया जो स्वदेशी अधिकारों को बनाए रखें, ज्ञान प्रणालियों की रक्षा करें, साक्ष्य संरचनाओं को मजबूत करें और निष्पक्ष लाभ-साझाकरण सुनिश्चित करें। 

इन विचार-विमर्शों से प्राप्त अंतर्दृष्टि पारंपरिक चिकित्सा को लोगों और पारिस्थितिक तंत्रों के बीच सामंजस्य बहाल करने के लिए एक महत्वपूर्ण उत्प्रेरक के रूप में स्थापित करती है, जो शिखर सम्मेलन की आगामी तकनीकी चर्चाओं और नीतिगत संवादों के लिए वैचारिक नींव स्थापित करती है।

 

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