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सी. पी. राधाकृष्णन ने संविधान सदन के केंद्रीय कक्ष में संविधान दिवस स्मृति समारोह को संबोधित किया

सी. पी. राधाकृष्णन ने कहा कि संविधान, स्वतंत्रता संग्राम में शामिल रहे लाखों लोगों की सामूहिक बुद्धिमता, बलिदान और स्वप्न का प्रतीक है

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नई दिल्ली , 26 Nov 2025

Last updated on: Nov 27, 2025, 13:12 IST

उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने आज संविधान सदन के सेंट्रल हॉल में संविधान दिवस स्मृति समारोह को संबोधित किया और भारतीय संविधान के दृष्टिकोण, निहित मूल्यों और स्थायी विरासत को रेखांकित किया। श्री राधाकृष्णन ने कहा कि वर्ष 2015 से 26 नवंबर को संविधान दिवस मनाया जा रहा है जो  अब देश के प्रत्येक नागरिक के लिए एक महत्वपूर्ण आयोजन बन गया है। 

उन्होंने कहा कि असाधारण प्रतिभावान नेताओं - बाबासाहेब डॉ. भीम राव अंबेडकर, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, श्री एन. गोपालस्वामी अय्यंगर, श्री अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर, श्री दुर्गा बाई देशमुख और अन्य दूरदर्शी व्यक्तियों ने संविधान को इतनी गहनता से गढ़ा कि इसका प्रत्येक पृष्ठ राष्ट्र की आत्मा को प्रतिबिंबित करता है।  

उपराष्ट्रपति ने कहा कि संविधान का मसौदा, उस पर चर्चा और उसे अंगीकार भारत के कुछ सर्वश्रेष्ठ नेताओं द्वारा किया गया, जो स्वतंत्रता संग्राम के लाखों लोगों की सामूहिक बुद्धिमत्ता, बलिदान और स्वप्न का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि संविधान समिति और संविधान सभा के सदस्यों के योगदान ने करोड़ों भारतीयों की आशाएं और आकांक्षाएं पूरी कीं और भारत को विश्व  के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में उभरने की बुनियाद रखी। 

उन्होंने कहा कि बुद्धिमत्ता, अनुभव, बलिदानों और आकांक्षाओं से उत्पन्न संविधान से सुनिश्चित हुआ है कि भारत सदा अखंड रहे। उपराष्ट्रपति ने कहा कि व्यावहारिक और परिपूर्णता आधारित दृष्टिकोण द्वारा भारत ने विकास संकेतकों में उल्लेखनीय प्रगति की है। उन्होंने कहा कि औसत अर्थव्यवस्था से, भारत अब चौथी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बन गया है और शीघ्र ही तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। 

उन्होंने कहा कि पिछले दशक में 25 करोड़ लोगों को निर्धनता से मुक्त किया गया है, और 100 करोड़ से अधिक लोगों को विभिन्न सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के दायरे में लाया गया है - जो दर्शाता है कि असंभव को संभव बनाया गया है। श्री राधाकृष्णन ने रेखांकित किया कि भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था नई नहीं है। 

उत्तर में वैशाली और दक्षिण में चोल शासकों की "कुदावोलाई" व्यवस्था के ऐतिहासिक उदाहरणों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत दीर्घकाल से लोकतंत्र की जननी रहा है। उन्होंने कहा कि नागरिकों की सजग भागीदारी के बिना कोई भी लोकतंत्र विकसित नहीं हो सकता और जम्मू-कश्मीर तथा बिहार में हुए हाल के चुनाव में उच्च मतदान प्रतिशत लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लोगों के अडिग विश्वास दर्शाते हैं।

उपराष्ट्रपति ने संविधान सभा की महिला सदस्यों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए हंसा मेहता के शब्दों का स्मरण किया कि "हमने सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय और राजनीतिक न्याय की मांग की है"। उपराष्ट्रपति ने कहा कि वर्ष 2023 में पारित किया गया नारी शक्ति वंदन अधिनियम उन महिला नेताओं के योगदान के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है और यह राष्ट्र निर्माण में महिलाओं को सार्थक भागीदारी के समान अवसर सुनिश्चित करता है। 

उपराष्ट्रपति ने स्वतंत्रता आंदोलन और संविधान सभा में आदिवासी समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका और बलिदान का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2021 से, उनके योगदान के सम्मान में जनजातीय गौरव दिवस मनाया जा रहा है। श्री राधाकृष्णन ने फिर से पुष्टि की कि संविधान अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, पिछड़े वर्गों और समाज के अन्य कमजोर वर्गों के सामाजिक न्याय और आर्थिक सशक्तिकरण के प्रति भारत की दृढ़ प्रतिबद्धता दर्शाता है। 

उन्होंने कहा कि संविधान की प्रस्तावना में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्श सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक नागरिक - चाहे वह किसी भी जाति, पंथ, लिंग, भाषा, क्षेत्र या धर्म का हो - उसे भारत में समुचित स्थान मिले। उपराष्ट्रपति ने कहा कि तेज़ी से बदलते वैश्विक, आर्थिक और भू-राजनीतिक परिवेश में, चुनावी, न्यायिक और वित्तीय प्रणालियों में सुधार आवश्यक हैं। 

उन्होंने कहा कि एक राष्ट्र-एक कर व्यवस्था-जीएसटी और जेएएम-जन-धन, आधार, मोबाइल जैसी पहल ने शासन को सरल बनाया है और व्यापार में सुगमता लाकर सुनिश्चित किया है कि सरकार द्वारा पहुंचाए जा रहे लाभ सीधे नागरिकों तक पहुंचें। उन्होंने लोगों से आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी तकनीकों का रचनात्मक उपयोग कर विकसित भारत के महत्वाकांक्षी दृष्टिकोण को साकार बनाने का आह्वान किया और इस बात पर ज़ोर दिया कि राष्ट्र निर्माण में प्रत्येक व्यक्ति का सजग योगदान आवश्यक है।

अपने संबोधन का समापन करते हुए श्री राधाकृष्णन ने कहा कि संविधान के प्रति सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यह है कि हम इसके मूल्यों और सिद्धांतों को बनाए रखने का संकल्प लें और वर्ष 2047 तक एक सुदृढ़, समावेशी और समृद्ध विकसित भारत के लिए मिल कर काम करें।

 

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