एंटीबायोटिक की प्रतिरोधक क्षमता के कम होते हुए प्रभाव को रोकने के लिए चितकारा यूनिवर्सिटी को एक अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट मिला है। यूनिवर्सिटी को तीन साल का रिस्क मैनेजमेट एंड प्रिवेंशन आफ एंटीबायोटिक्स रजिस्टेंस- “प्रिवेंट इट” के नाम से इरास्मस प्रोजेक्ट मिला है।इस प्रोजेक्ट के तहत एंटीबायोटिक रजिस्टेंस के क्षेत्र में नवीनतम खोज करने का मौका मिलेगा। यूरोपियन कमीशन द्वारा संयुक्त रूप से इस प्रोजेक्ट के लिए करीब आठ करोड रुपये की वित्तीय मदद दी है। इस राशि को अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की एक ऐसी टीम को दिया जाएगा जो कि एंटीबायोटिक रजिस्टेंस के क्षेत्र में जागरूकता फैलाएंगे व लोगों को शिक्षित करेंगे। यह मदद प्रतिष्ठित इरेसमस प्लस प्रोग्राम के तहत दी जा रही है जो कि यूरोप में शिक्षा को बढावा देने के साथ दुनिया भर में सबसे प्रतिभाशाली विचारों को बढावा देते हैं। प्रिेवेंट इट चितकारा यूनिवर्सिटी को मिलने वाला चौथा इरास्मस प्रोजेक्ट हैं। इसके साथ ही चितकारा यूनिवर्सिटी पूरे दक्षिण एशिया में सबसे सफल इंस्टीट्यूशन बन गया है जो जिसे यह प्रोजेक्ट हासिल हुआ है। मानवीय व पशुओं की सेहत, फूड सिक्योरिटी व विकास के लिए एंटीबायोटिक रजिस्टेंस एक तरह से सबसे बडी वैश्विक खतरा बन गया है। ऐसी आशंका है कि 2050 तक दस मिलियन मौतों के लिए यह चुनौती कारण बन सकती है जो कि कैंसर व डायबीटिज से भी ज्यादा संख्या है।प्रिवेंट इट चितकारा यूनिवर्सिटी की अगुवाई में एक इंटरनेशनल कंजोरटियम है जिसको जिसमें पांच भारतीय यूनिवर्सिटीज व दो भारतीय एनजीओ व चार यूरोपियन यूनिवर्सिटीज शामिल हैं।इस प्रोजेक्ट का कांसेप्ट एंटीबायोटिक रजिस्टेंस के क्षेत्र में इंडियन नेशनल एक्शन प्लान से प्रेरित हैं। इसका उद्देश्य समाज में इसके प्रति जागरूकता फैलाना है। इस पहल का उद्देश्य हैल्थकेयर प्रोवाइडर्स, एजुकेटर्स व कम्यूनिटी लीडर्स को इस क्षेत्र में जागरूक करना है। यह एबीआर के क्षेत्र में बेस्ट प्रेक्टिस के जरिए हासिल की जा सकती है।