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हिमाचली राजमा, खुबानी की विदेशों में धूम

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5 Dariya News

रामपुर , 12 Sep 2015

Last updated on: Sep 12, 2015, 00:00 IST

हिमाचल प्रदेश की सर्द आबोहवा में उपजाए जाने वाले जैविक राजमा और खुबानी के स्वाद का जादू अब विदेशियों के भी सिर चढ़कर बोलने लगा है। यूरोप और लैटिन अमेरिका के बाजारों में इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है।हिमालयन ऑर्गेनिक एग्री-प्रॉडक्ट रिसर्च ऐंड डेवेलपमेंट नामक संस्था के अध्यक्ष आर.एस. मिन्हास ने आईएएनएस को बताया कि इस वर्ष लैटिन अमेरिका से राजमा की अच्छी मांग है।उन्होंने कहा कि इस सीजन हमें 22 टन राजमा का ऑर्डर मिला है। चूंकि केंद्र सरकार ने दालों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा रखा है, इसलिए हम इसका निर्यात करने को लेकर असमंजस में हैं।उन्होंने बताया कि संस्था ने पिछले साल आठ टन और वर्ष 2013 में 11 टन राजमा का निर्यात किया था। इसी तरह 375 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से सात टन खुबानी के निर्यात का भी ऑर्डर मिला है।

मिन्हास ने बताया कि प्रदेश में प्रति वर्ष 13 टन खुबानी की पैदावार होती है। हर साल औसतन सात से आठ टन खुबानी का निर्यात मुख्य रूप से स्पेन व ऑस्ट्रिया को किया जाता है; इस बार हमें सात टन के निर्यात का ऑर्डर मिला है।गौरतलब है कि प्रदेश के 15,000 से भी अधिक किसान सम्मिलित रूप से संस्था के तहत फल, सब्जी, अखरोट, मसाले, अनाज और दाल का घरेलू एवं अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में विपणन कर रहे हैं। इस संस्था की स्थापना वर्ष 2001 में हुई थी।संस्था ने अब अखरोट के तेल के कारोबार में भी पदार्पण किया है, जो सिर्फ स्पेन और ऑस्ट्रिया में ही मिलता है। मिन्हास ने बताया, "हमने प्रयोग के तौर पर पहली बार अतिरिक्त फसल से थोड़ी मात्रा में अखरोट का तेल निकाला है। यह भोजन पकाने और देह मालिश के लिए बेहद अच्छा है इसकी कीमत 1600 रुपये प्रति लीटर है। 'आई से ऑर्गेनिक' नामक दिल्ली स्थित ऑनलाइन ग्रोसरी स्टोर ने 250 लीटर अखरोट के तेल की पूरी खेप ही खरीद ली है।"मिन्हास ने कहा, "अगर इसका रिस्पॉन्स अच्छा रहता है तो अगले वर्ष से हम प्रचूर मात्रा में अखरोट तेल का उत्पादन करेंगे।"

उन्होंने बताया कि संस्था 40:60 के अनुपात में खुबानी तेल के सम्मिश्रण से अखरोट के तेल का उत्पादन करने की योजना बना रही है।प्रदेश के कृषि निदेशक जे.सी. राणा ने कहा कि राज्य में वर्ष 2002 में जैविक खेती शुरू हुई, उस वक्त लगभग 2500 हेक्टेयर भूमि पर 4000 से अधिक किसान जैविक खेती के काम में जुटे थे।राणा ने कहा, "आज हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि फिलहाल 18,000 हेक्टेयर जमीन पर जैविक खेती हो रही है और इस काम में 30,000 किसान शामिल हैं।"राज्य में जैव कृषि के बाबत किसानों के मार्गदर्शन के लिए पांच अधिकृत एजेंसियां कार्यरत हैं। जैविक खेती अपनाने वाले अधिकांश किसान ऊपरी शिमला जिले के रामपुर इलाके के हैं। यहां जैविक खेती परियोजना की शुरुआत वर्ष 2005 में हुई थी।शिमला से लगभग 120 किमी दूर रामपुर के समीप सूरज ठाकुर नामक एक दलहन किसान ने बताया कि राजमा की ज्वाला व चित्रा किस्मों की घरेलू व विदेशी बाजारों में अच्छी कीमत मिलती है।

उन्होंने बताया कि निर्यात से औसतन हमें प्रति किलोग्राम 130-140 रुपये मिल रहे हैं। राजमा की जैविक किस्म की घरेलू बाजार में भी 10 से 20 प्रतिशत अधिक कीमत मिल रही है।राज्य में राजमा की कटाई सितंबर के आखिर में शुरू होती है, जो दिसंबर तक चलती है।जीवन सिंह नामक एक अन्य किसान ने कहा कि जैविक पद्धति अपनाकर किसान न सिर्फ कृषि लागत 70 प्रतिशत तक कम कर सकते हैं, बल्कि मिट्टी की उर्वरक क्षमता भी बढ़ा सकते हैं। इस पहाड़ी राज्य में कृषि लोगों की आजीविका का प्रमुख आधार है। इससे 71 प्रतिशत लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिल रहा है।

उल्लेखनीय है कि चंबा जिले के पंगी और शिमला जिले के डोडरा क्वार इलाकों में किसान फसलों के लिए कभी कीटनाशक और खाद का इस्तेमाल नहीं करते। राज्य सरकार मुख्य रूप से जैविक खेती पर जोर दे रही है। जैविक पद्धति अपनाकर कृषि आय बढ़ाने, फसलों की विविधता पर जोर देने और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन करने के उद्देश्य से जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी-जेआईसीए के सहयोग से 321 करोड़ रुपये की परियोजना पर फिलहाल काम चल रहा है। राज्य सरकार के अनुसार, इस वित वर्ष के दौरान 2000 हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि को जैविक खेती के तहत लाया जाएगा और 200 गांवों को पूरी तरह से जैविक गांव में परिवर्तित किया जाएगा।

 

Tags: FOOD

 

 

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