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मराठी रंगमंच के महानायक 'बालगंधर्व', जिन्होंने निभाए स्त्री पात्र और रचा इतिहास

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Gurpreet Singh

Gurpreet Singh

5 Dariya News

नई दिल्ली , 14 Jul 2026

Last updated on: Jul 14, 2026, 14:57 IST

26 जून 1888 को जन्मे 'नारायण श्रीपाद राजहंस' (बालगंधर्व) ने उस काल में भारतीय रंगमंच को पुनर्जीवित किया जब महिलाओं का मंच पर आना सामाजिक रूप से निषेध था। मराठी रंगमंच पर वे स्त्री का किरदार निभाया करते। 'नारायण श्रीपाद राजहंस' का जन्म महाराष्ट्र के सांगली जिले के पलुस तालुका के नागठाणे गांव में एक पारंपरिक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

उनके परिवार का माहौल संगीत और अध्यात्म से ओतप्रोत था। उनकी माता स्वयं गाती थीं, और उनके नाना अप्पा शास्त्री बाबा महाराज की सभाओं में पुराणों का वाचन करते थे। बचपन में जब नारायण का रुझान संगीत की ओर बढ़ने लगा, तो उनके पिता इस बात के खिलाफ थे कि उनका पुत्र रंगमंच जैसे तत्कालीन समय में कम सम्मानित समझे जाने वाले पेशे को अपनाए।

पिता उन्हें एक बार वापस घर ले आए थे, लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन के प्रणेता लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने स्वयं हस्तक्षेप किया और 'नारायण श्रीपाद राजहंस' के पिता को नाटक मंडली की गरिमा और सुरक्षा का आश्वासन देकर नारायण को मंच पर लौटने की अनुमति दिलाई। बाल गंगाधर तिलक ने ही पुणे में डेक्कन कॉलेज के पास 'नारायण श्रीपाद राजहंस' के एक गायन कार्यक्रम को सुनने के बाद उनकी पीठ थपथपाई थी और भावविभोर होकर उन्हें 'बालगंधर्व' (बाल देवदूत गायक) की उपाधि दी थी।

इसके बाद कोल्हापुर के छत्रपति शाहू महाराज ने उनकी प्रतिभा को पहचाना, उनकी श्रवण संबंधी समस्याओं का इलाज कराया और उन्हें प्रतिष्ठित 'किर्लोस्कर नाटक मंडली' में भेजा। यहीं से वर्ष 1905 में उनके पेशेवर अभिनय जीवन की शुरुआत हुई। बालगंधर्व ने अपने गुरु गोविंद देवल के कड़े अनुशासन में अभिनय और संगीत का प्रशिक्षण लिया।

वर्ष 1906 में मिरज में शकुंतला के रूप में उनकी पहली प्रस्तुति ने ही दर्शकों का दिल जीत लिया। वे इस कदर लोकप्रिय हुए कि मुंबई और पुणे की संभ्रांत महिलाएं उनकी साड़ियों के डिजाइन, उनके द्वारा पहने जाने वाले विशेष जैकेट, बालों के जूड़े और यहां तक कि उनकी चाल-ढाल की नकल करने लगीं। पुरुषों के फैशन में भी 'गंधर्व टोपी' और 'गंधर्व कोट' का भारी चलन शुरू हो गया।

12 मार्च 1911 को जब 'संगीत मानापमान' नाटक का पहला शो होने जा रहा था, उसी सुबह उनकी नवजात पुत्री का निधन हो गया। वर्ष 1911 में नानासाहेब जोगलेकर की असामयिक मृत्यु के बाद किर्लोस्कर मंडली में बिखराव आ गया, जिसके बाद बालगंधर्व ने 1913 में गणपतराव बोडस और गोविंदराव तांबे के साथ मिलकर 'गंधर्व नाटक मंडली' की स्थापना की।

इस मंडली के नाटकों के भव्य और यथार्थवादी सेटों के निर्माण, असली इत्रों के छिड़काव और महंगे कपड़ों के कारण कंपनी भारी कर्ज में डूब गई। बाद में उन्होंने सिनेमा की ओर रुख किया और वी. शांताराम की फिल्म 'धर्मात्मा' (1935) में संत एकनाथ की भूमिका निभाई लेकिन यह साझेदारी केवल एक ही फिल्म तक सीमित रही। उनकी पहली पत्नी लक्ष्मीबाई का निधन वर्ष 1940 में हुआ।

बाद में वर्ष 1951 में उन्होंने सुप्रसिद्ध गायिका-अभिनेत्री गौहरबाई कर्नाटकी से विवाह किया। 1964 में गौहरबाई के निधन ने उन्हें पूरी तरह से तोड़ दिया। भारत सरकार ने वर्ष 1955 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और वर्ष 1964 में पद्म भूषण प्रदान किया। आखिरकार लगभग तीन महीने से अधिक समय तक कोमा में रहने के बाद 15 जुलाई 1967 को इस महान नट सम्राट का पुणे में निधन हो गया। पुणे में स्थित 'बाल गंधर्व रंग मंदिर' की नींव स्वयं उनके हाथों से रखी गई थी।

 

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