ब्रिक-राष्ट्रीय कृषि-खाद्य एवं बायो-मैन्युफैक्चरिंग संस्थान (ब्रिक-नाबी), मोहाली के अंतर्गत स्थापित नाबी बायो-फाउंड्री (एग्री-फूड बायो-मग) द्वारा 9 जुलाई, 2026 को बायोमैन्युफैक्चरिंग वर्कशॉप 5.0 का आयोजन किया गया। इस वर्कशॉप का उद्देश्य शोधकर्ताओं, प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों, उद्यमियों तथा बायो-इकोसिस्टम से जुड़े हितधारकों को एक साझा मंच पर लाकर भारत के फर्मेंटेशन-आधारित स्मार्ट प्रोटीन क्षेत्र में मौजूद चुनौतियों की पहचान करना तथा भविष्य की संभावनाओं पर विचार-विमर्श करना था।
कार्यशाला में देशभर से आए प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों, नवाचारकर्ताओं एवं उद्यमियों ने भाग लिया, जो भारत के बायो-मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को सशक्त बनाने की दिशा में कार्यरत हैं। कार्यक्रम का उद्घाटन प्रो. अश्वनी पारीक, एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर, ब्रिक-नाबी ने किया।
इस अवसर पर डॉ. एल. एस. शशिधरा, निदेशक, नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंसेज़ (एनसीबीएस), सुश्री शिवाली सुगंध, सह-संस्थापक, ग्रीनग्राही, तथा श्री सिद्धार्थ शर्मा, सह-संस्थापक, ग्रीनग्राही ने विशेषज्ञ व्याख्यान देते हुए विज्ञान-आधारित इनोवेशन और उद्यमिता पर अपने अनुभव साझा किए। अपने उद्घाटन संबोधन में प्रो. अश्वनी पारीक ने सतत बायो-मैन्युफैक्चरिंग तकनीकों के विकास में बायो-फाउंड्री की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला।
उन्होंने जैविक संसाधनों के प्रभावी उपयोग, कीट-आधारित प्रोटीन उत्पादन तथा कृषि एवं औद्योगिक अपशिष्ट को आर्थिक रूप से उपयोगी उत्पादों में परिवर्तित करने की दिशा में संस्थान के प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि ब्रिक-नाबी इस क्षेत्र में अब तक 13 नवीन प्रौद्योगिकियों का विकास कर चुका है, जो परिपत्र जैव-अर्थव्यवस्था (Circular Bioeconomy) को बढ़ावा देने की दिशा में संस्थान की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
उन्होंने संस्थान में संचालित विभिन्न राष्ट्रीय मिशनों एवं अत्याधुनिक अनुसंधान सुविधाओं की भी जानकारी दी। मुख्य व्याख्यान देते हुए डॉ. एल. एस. शशिधरा ने स्वतंत्रता के बाद भारत में वैज्ञानिक अनुसंधान की विकास यात्रा का विस्तृत उल्लेख किया।
उन्होंने मूलभूत विज्ञान से व्यावहारिक अनुप्रयोगों तक की यात्रा, कोशिका को जीवन की मूल इकाई से जीवन के केंद्र के रूप में समझने, जीनोटाइप से फीनोटाइप तथा डार्विन के सिद्धांतों से आधुनिक रोग विज्ञान तक की वैज्ञानिक प्रगति पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि विज्ञान सार्वभौमिक है और इसका विकास प्रत्येक क्षेत्र में होना चाहिए।
उन्होंने श्वेत क्रांति, रक्त बैंकिंग प्रणाली के विकास, पारंपरिक बासमती चावल की डीएनए बारकोडिंग तथा कोविड-19 महामारी से मुकाबले में भारतीय वैज्ञानिकों के योगदान जैसे उल्लेखनीय उदाहरण भी प्रस्तुत किए। मिस शिवाली सुगंध ने अपने उद्यमिता सफर को साझा करते हुए बताया, कि छात्र जीवन के दौरान बढ़ती अपशिष्ट प्रबंधन चुनौतियों ने उन्हें ग्रीनग्राही की स्थापना के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने भारत एवं विदेशों में अपशिष्ट प्रबंधन संबंधी नीतियों की चर्चा करते हुए युवा शोधकर्ताओं को अनिश्चितताओं को स्वीकार करने तथा असफलताओं से सीखने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि "जितनी जल्दी आप असफल होंगे, उतनी ही जल्दी सीखेंगे।"
उन्होंने बताया कि किस प्रकार वैज्ञानिक नवाचारों को परिपत्र अर्थव्यवस्था के माध्यम से व्यावसायिक रूप से सफल समाधानों में बदला जा सकता है। उन्होंने ग्रीनग्राही द्वारा गीले जैविक अपशिष्ट को उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन में परिवर्तित करने की तकनीक तथा कंपनी के वैलिडेशन फ्रेमवर्क की भी जानकारी दी।
श्री सिद्धार्थ शर्मा ने अपने उद्यमिता अनुभव साझा करते हुए ग्रीनग्राही की स्थापना के उद्देश्य और दीर्घकालिक दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला। वर्ष 2021 में स्थापित ग्रीनग्राही उन्नत प्रौद्योगिकी और जीवन विज्ञान के समन्वय से अपशिष्ट के मूल्य संवर्धन तथा परिपत्र जैव-अर्थव्यवस्था के लिए नवाचारपूर्ण समाधान विकसित करने की दिशा में कार्य कर रही है।
इस वर्कशॉप ने वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, स्टार्ट-अप्स तथा उद्योग जगत के प्रतिनिधियों को विचारों के आदान-प्रदान, सहयोग बढ़ाने तथा बायो-मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में उभरती संभावनाओं पर सार्थक चर्चा का अवसर प्रदान किया। कार्यक्रम का समापन भारत के स्मार्ट प्रोटीन इकोसिस्टम को नवाचार, अनुसंधान सहयोग तथा सतत तकनीकी हस्तक्षेपों के माध्यम से सशक्त बनाने पर केंद्रित विचार-विमर्श के साथ हुआ।