Tuesday, 21 July 2026

 

 

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बहु-क्षेत्रीय अभियान – रण संवाद पर दो-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का बेंगलुरु में शुभारंभ

एमडीओ का आशय छहों क्षेत्रों में समानांतर परिचालन नहीं, अपितु निरंतर और गतिशील अंतःक्रिया है, जहां महत्व बदलता है और नेतृत्व भी परिवर्तित होता है : सेना प्रमुख

Military, Indian Army, General Anil Chauhan, General Upendra Dwivedi, Air Marshal Ashutosh Dixit, Bengaluru
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Armaan

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बेंगलुरु , 09 Apr 2026

Last updated on: Apr 10, 2026, 12:59 IST

तीनों सेनाओं की रणनीतिक संगोष्ठी रण संवाद का दूसरा संस्करण 9 अप्रैल 2026 को बेंगलुरु में मुख्यालय एकीकृत रक्षा स्टाफ (आईडीएस) के तत्वावधान में प्रारंभ हुआ। वायु सेना प्रशिक्षण कमान द्वारा आयोजित की जा रही इस दो दिवसीय संगोष्ठी का उद्घाटन चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने किया। 

संगोष्ठी का विषय “बहु-क्षेत्रीय अभियान: पारंपरिक और अनियमित खतरों से निपटने की अनिवार्यता” है। एमडीओ सिद्धांत का उद्देश्य सैन्य और गैर-सैन्य संस्थाओं के विभिन्न हितधारकों के बीच समन्वय स्थापित कर भारत की संयुक्त युद्ध क्षमता को सभी छह  क्षेत्रों—स्थल, समुद्र, वायु, अंतरिक्ष, साइबर और संज्ञानात्मक में सशक्त बनाना है।

चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ टू द चेयरमैन, चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी (सीआईएससी) एयर मार्शल आशुतोष दीक्षित ने अपने मुख्य भाषण में बहु-क्षेत्रीय अभियान (एमडीओ) पर केंद्रित भारत के सैन्य भविष्य के लिए एक परिवर्तनकारी विजन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि युद्ध का स्वरूप मौलिक रूप से बदल चुका है और अब यह सिलसिलेवार नहीं रहा, बल्कि अंतरिक्ष, साइबर स्पेस, विद्युत-चुंबकीय स्पेक्ट्रम और संज्ञानात्मक क्षेत्र में एक साथ संचालित होता है।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत के लिए बहु-क्षेत्रीय अभियान कोई भविष्य की अवधारणा नहीं, बल्कि वर्तमान की अनिवार्यता है। आधुनिक युग को “विखंडित, अघोषित विश्व युद्ध” के रूप में वर्णित करते हुए सेना प्रमुख (सीओएएस) जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने जोर देकर कहा कि युद्धक्षेत्र अब केवल नक्शे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक बहु-स्तरीय और जटिल अनुकूलनशील प्रणाली बन चुका है।

उन्होंने “स्थायी संघर्ष” वाली दुनिया की वास्तविकता को रेखांकित करते हुए बताया कि एक थल सेना कमांडर को अब विभिन्न क्षेत्रों में फैल रहे युद्ध को समझना चाहिए और यह भी देखना चाहिए कि कार्रवाइयों के दौरान ये क्षेत्र किस प्रकार परस्पर क्रिया करते हैं। उन्होंने कहा कि सेना एमडीओ को एक अवधारणा से आगे बढ़ाकर वास्तविक क्षमता में बदल रही है।

उनके अनुसार, एमडीओ का आशय छह क्षेत्रों का समानांतर संचालन नहीं, अपितु यह निरंतर और गतिशील अंतःक्रिया है, जहां महत्व बदलता है और नेतृत्व भी परिवर्तित होता है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि सेना “डोमेन शुद्धता” से आगे बढ़कर पूर्ण “डोमेन फ्यूजन” की दिशा में अग्रसर होने के लिए एकीकरण, सूचनाकरण और इंटेलिजेंटाइजेशन की प्रक्रिया को तेज कर रही है।

ऑपरेशनल उपलब्धियों की चर्चा करते हुए जनरल द्विवेदी ने बताया कि भारतीय सेना ने एकीकृत युद्ध समूह (आईबीजी), दिव्यास्त्र ड्रोन बैटरीज और कमांड साइबर ऑपरेशन्स प्रकोष्‍ठों सहित अनेक क्षमताओं को संचालित किया है। उन्होंने एक ऐसी नई कमांड संस्कृति की आवश्यकता पर बल दिया, जहां नेतृत्व को “केवल तकनीक का उपयोग करने के बजाय उसे कमांड करना चाहिए”, ताकि निर्णय लेने में फायदा सुनिश्चित हो सके।

उन्होंने कहा कि यद्यपि ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की एकजुटता सिद्ध की है, लेकिन अंतिम लक्ष्य एक ऐसे बेजोड़ “संपूर्ण राष्ट्र” की संरचना करना है, जहां विभिन्न क्षेत्रों के बीच की सीमाएं पूरी तरह समाप्त हो जाएं। नौसेना प्रमुख (सीएनएस) एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने अपने संबोधन में बहु-क्षेत्रीय अभियान का व्यापक समुद्री दृश्यांकन प्रस्तुत किया, जिसमें आधुनिक नौसैनिक रणनीति को तकनीक के मेल और कौटिल्य की समझ दोनों आधार पर दिखाया गया।

उन्होंने आधुनिक समुद्री क्षेत्र को समुद्र की गहराइयों से लेकर अंतरिक्ष तक फैले परस्‍पर जुड़े ग्रिड के रूप में परिभाषित किया। उन्होंने विस्तार से बताया कि किस प्रकार समुद्री युद्धक्षेत्र अब एक सघन, पारदर्शी और गहराई से परस्पर जुड़ा हुआ नेटवर्क बन चुका है, जो गति, पैमाने और एक साथ होने वाली गतिविधियों से आकार लेता है।

नौसेना प्रमुख ने कहा कि भारतीय नौसेना 2035 तक 200 से अधिक जहाजों वाली नौसेना बनने की दिशा में दृढ़तापूर्वक अग्रसर है और शामिल किए जाने वाले हर नए जहाज में प्रतिरूपकता और तकनीकी विकास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि इसके साथ ही, नौसेना “मानव रहित प्रणालियों के लिए भारतीय नौसेना का विजन 2022-30” के अनुरूप विभिन्न क्षेत्रों में मानवरहित और स्वायत्त प्रणालियों के माध्यम से अपनी फ्लीट क्षमताओं को बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

यह दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी तीनों सेनाओं के बीच क्रमिक आधार पर प्रतिवर्ष आयोजित की जाती है। इसमें तीनों सेनाओं के वरिष्ठ अधिकारी, शिक्षाविद, थिंक-टैंक के विशेषज्ञ, उद्योग जगत के दिग्‍गज तथा मित्र देशों के विदेश सेवा अताशे सम्मिलित होते हैं और विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श सत्रों में भाग लेते हैं। यह संगोष्ठी भारतीय सशस्त्र बलों को बहु-क्षेत्रीय संघर्ष के लिए तैयार करने से लिए एक सहयोगात्मक रोडमैप के साथ 10 अप्रैल 2026 को समाप्त संपन्‍न होगी।

 

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