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डॉ. जितेंद्र सिंह ने डीबीटी के 40वें स्थापना दिवस पर एआई-संचालित बायोटेक डेटा पोर्टल “सुजविका” लॉन्च किया

"2,000 करोड़ रुपये की आरडीआई राष्ट्रीय पहल जैव प्रौद्योगिकी उद्यमों को बढ़ावा देगी; एआई-जैव प्रौद्योगिकी तालमेल अनुसंधान और नवाचार को गति देगा" : डॉ. जितेंद्र सिंह

Dr Jitendra Singh, Bharatiya Janata Party, BJP, Union Minister of Earth Sciences, Department of Biotechnology, DBT, SUJVIKA
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नई दिल्ली , 24 Feb 2026

Last updated on: Feb 25, 2026, 11:53 IST

जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) के 40वें स्थापना दिवस के अवसर पर, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने उद्योग साझेदार एबीएलई के सहयोग से विकसित एआई संचालित बायोटेक उत्पाद डेटा पोर्टल "सुजविका" का शुभारंभ किया।

सुजविका एक व्यापार सांख्यिकी डिजिटल इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म है जो प्रमाणित जैव प्रौद्योगिकी उत्पाद आयात डेटा को संरचित और सुलभ प्रारूप में प्रस्तुत करता है। यह पोर्टल जैव रासायनिक उत्पादों, औद्योगिक एंजाइमों और अन्य जैव प्रौद्योगिकी आयातों के क्षेत्रवार विश्लेषण प्रदान करता है। यह शोधकर्ताओं, स्टार्टअप्स और उद्योग को उच्च मूल्य और उच्च मात्रा वाले आयातों की पहचान करने, आयात पर निर्भरता का आकलन करने और स्वदेशीकरण एवं अनुसंधान तथा विकास प्रयासों को प्राथमिकता देने में सक्षम बनाता है।

यह पोर्टल साक्ष्य-आधारित योजना का समर्थन करता है और घरेलू जैव विनिर्माण को मजबूत करने के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावा देता है। डॉ. जितेंद्र सिंह ने उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि अगली औद्योगिक क्रांति जैव प्रौद्योगिकी द्वारा संचालित होगी और भारत 'विकसित भारत' की परिकल्पना के अंतर्गत 2047 तक 1 ट्रिलियन डॉलर की जैव अर्थव्यवस्था के निर्माण की दिशा में निरंतर प्रगति कर रहा है।

उन्होंने कहा कि भारत ने यह सुनिश्चित किया है कि वह उभरती प्रौद्योगिकियों में पिछड़ने वाला देश नहीं रहेगा और जैव प्रौद्योगिकी को भविष्य के आर्थिक विकास के प्रमुख चालक के रूप में स्थापित किया है। डॉ. जितेंद्र सिंह नई दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित सिविल सर्विसेज ऑफिसर्स इंस्टीट्यूट (सीएसओआई) में जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) के 40वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित कर रहे थे।

इस कार्यक्रम में डीबीटी के सचिव डॉ. राजेश एस. गोखले, संयुक्त सचिव सुश्री एकता विश्नोई, डीबीटी, बीआईआरएसी और ब्रिक के वरिष्ठ अधिकारी, वैज्ञानिक समुदाय के सदस्य, संस्थानों के निदेशक, उद्योग प्रतिनिधि और युवा शोधकर्ता उपस्थित थे। इस कार्यक्रम में युवा वैज्ञानिकों और डीबीटी निदेशालयों द्वारा प्रस्तुतियाँ, डीबीटी के 40 वर्षों के सफर पर एक प्रस्तुति और डीबीटी की नई वेबसाइट तथा "सुजविका" जैव उत्पाद वेब पोर्टल का शुभारंभ शामिल था।

1986 में अपनी स्थापना के बाद से चार दशक पूरे होने पर डीबीटी  को बधाई देते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि विभाग स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने, शैक्षणिक-औद्योगिक साझेदारी को मजबूत करने, वैज्ञानिक बुनियादी ढांचे का निर्माण करने और सामाजिक उपयोग के लिए नवाचार को सक्षम बनाने वाला एक प्रमुख संगठन बन गया है। 

उन्होंने कहा कि जहां 2014 में भारत में 100 से भी कम बायोटेक स्टार्टअप थे, वहीं अब यह संख्या 11,000 से अधिक हो गई है, जो इकोसिस्टम के मजबूत विस्तार को दर्शाता है। इस अवधि के दौरान, भारत की जैव अर्थव्यवस्था 2014 में लगभग 10 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2024 में लगभग 165.7 अरब अमेरिकी डॉलर हो गई है। 

देश अब वैश्विक स्तर पर शीर्ष बायोटेक गंतव्यों में शुमार है और दुनिया के अग्रणी वैक्सीन निर्माताओं में से एक है। नीतिगत सुधारों का जिक्र करते हुए मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जैव प्रौद्योगिकी भारत की विकास रणनीति का एक केंद्रीय स्तंभ बनकर उभरी है। उन्होंने याद दिलाया कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एकीकृत जैव प्रौद्योगिकी नीति - अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव प्रौद्योगिकी - को मंजूरी दी है इसका उद्देश्य देश  में उच्च प्रदर्शन वाले जैव विनिर्माण को बढ़ावा देना है। 

उन्होंने कहा कि स्वदेशी क्षमताओं को मजबूत करने और भारत के जैव-औद्योगिक आधार का विस्तार करने के लिए डीबीटी, बीआईआरएसी और जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान और नवाचार परिषद (बीआरआईसी) इस नीति को लागू कर रहे हैं। डॉ. जितेंद्र सिंह ने देश  में स्थापित राष्ट्रीय बायोफाउंड्री नेटवर्क के बारे में बताया, जिसमें छह विशेषीकृत बायोफाउंड्री और 21 उन्नत बायो-इनेबलर सुविधाएं शामिल हैं। 

इसका उद्देश्य विस्तार और व्यावसायीकरण को गति देना है। उन्होंने 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में फैले 95 बायो-इनक्यूबेटरों, चार क्षेत्रीय मेंटरिंग केंद्रों और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यालयों के नेटवर्क का भी उल्लेख किया जो 1,800 से अधिक इनक्यूबेटियों को सहयोग प्रदान कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हाल ही में घोषित 1 लाख करोड़ रुपये की अनुसंधान, विकास और नवाचार (आरडीआई) पहल के अंतर्गत 2,000 करोड़ रुपये की पहली राष्ट्रीय निधि आवंटन से जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र को और मजबूती मिलेगी और बड़े पैमाने पर विकास के लिए तैयार उद्यमों को सहायता मिलेगी।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने उभरते क्षेत्रों पर प्रकाश डालते हुए  कहा कि डीबीटी और आईएसआरओ/अंतरिक्ष विभाग के बीच हुए समझौता ज्ञापन के माध्यम से भारत ने अंतरिक्ष जैव प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष चिकित्सा जैसे नए क्षेत्रों में प्रवेश किया है। उन्होंने अंतरिक्ष अभियानों में किए गए जैव प्रौद्योगिकी प्रयोगों का उल्लेख किया, जिनमें जीवन विज्ञान और मांसपेशी शरीर विज्ञान से संबंधित अध्ययन शामिल हैं, और कहा कि ऐसी पहल भारत को अत्याधुनिक वैज्ञानिक अन्वेषण में अग्रणी बनाती हैं।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने जीनोमइंडिया परियोजना का भी उल्लेख किया, जिसके अंतर्गत भारतीय जैविक डेटा केंद्र के माध्यम से 99 विविध आबादी के 10,000 व्यक्तियों के संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण डेटा को उपलब्ध कराया गया है। उन्होंने कहा कि इससे भविष्य में व्यक्तिगत उपचारों के विकास में मदद मिलेगी और भारत की जीनोमिक अनुसंधान क्षमताओं को मजबूती मिलेगी। 

उन्होंने डीबीटी और बीआईआरएसी के सहयोग से किए गए गंभीर हीमोफिलिया ए के लिए भारत के पहले मानव जीन थेरेपी परीक्षण का भी जिक्र किया, जिसमें फैक्टर VIII का निरंतर उत्पादन सुनिश्चित हुआ और बार-बार इन्फ्यूजन पर निर्भरता कम हुई। डॉ जितेंद्र सिंह ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहित डिजिटल उपकरणों के साथ जैव प्रौद्योगिकी का एकीकरण जीन अनुक्रमण, निदान और औषधि खोज जैसे क्षेत्रों में अनुसंधान दक्षता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाएगा, समय को कम करेगा और सटीकता में सुधार करेगा। 

उन्होंने जैव प्रौद्योगिकी की पूरी क्षमता का उपयोग करने के लिए वैज्ञानिक विभागों के बीच अधिक समन्वय के महत्व पर बल दिया। इस अवसर पर, डॉ. जितेंद्र सिंह ने भारत सरकार के डिजिटल ब्रांड आइडेंटिटी मैनुअल (डीबीआईएम) ढांचे के अनुरूप डीबीटी की संशोधित वेबसाइट का शुभारंभ किया, जिसे एमईआईटीवाई/एनआईसी द्वारा तैयार किया गया है, जो मंत्रालयों और विभागों में एक एकीकृत और मानकीकृत डिजिटल उपस्थिति की दिशा में एक कदम है।

इससे पहले, डीबीटी के सचिव डॉ. राजेश एस. गोखले ने डीबीटी को परिवर्तनकारी बदलाव का प्रेरक बताया और वैज्ञानिक क्षमता निर्माण से लेकर उद्यमिता को बढ़ावा देने और जैव-अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने तक इसके विकास की रूपरेखा प्रस्तुत की। उन्होंने ज्ञान सृजन, स्टार्टअप और साझेदारी के माध्यम से इसके प्रसार और सामाजिक प्रभाव को समाहित करने वाले विभाग के एकीकृत दृष्टिकोण को समझाया। 

उन्होंने जीनोम संपादन और उच्च-प्रदर्शन जैव-विनिर्माण में हाल की प्रगति पर प्रकाश डाला और कहा कि बायोई3 ढांचा सतत विकास मॉडल बनाने के लिए जैविक प्रणालियों, डिजिटल बुद्धिमत्ता और सामाजिक-आर्थिक डिजाइन को एकीकृत करता है। अपने संबोधन के समापन में डॉ. जितेंद्र सिंह ने विश्वास व्यक्त किया कि डीबीटी, बीआईआरएसी और ब्रिक मिलकर भारत की जैव क्रांति को प्रयोगशाला अनुसंधान से लेकर बड़े पैमाने पर औद्योगिक अनुप्रयोग तक ले जाएंगे, जिससे सतत विकास में योगदान मिलेगा और भारत विश्व की अग्रणी जैव अर्थव्यवस्थाओं में शुमार होगा।.

इस कार्यक्रम में अन्य लोगों के अलावा, डीबीटी की संयुक्त सचिव एकता विश्नोई; डीबीटी, बीआईआरएसी और ब्रिक के वरिष्ठ अधिकारी; वैज्ञानिक समुदाय के सदस्य; संस्थानों के निदेशक; उद्योग प्रतिनिधि; और युवा शोधकर्ता उपस्थित थे। इस कार्यक्रम में युवा वैज्ञानिकों और डीबीटी निदेशालयों द्वारा प्रस्तुतियाँ और डीबीटी के 40 वर्षों के सफर पर एक प्रस्तुति शामिल थी

 

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