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सेरेंगसिया घाटी के शहीदों को दी श्रद्धांजलि, आदिवासी लड़ाकों ने अंग्रेजी फौज को किया था परास्त

Hemant Soren, Chief Minister of Jharkhand, Jharkhand, Ranchi, Jharkhand Mukti Morcha
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चाईबासा , 02 Feb 2026

Last updated on: Feb 03, 2026, 11:02 IST

झारखंड के कोल्हान प्रमंडल की सेरेंगसिया घाटी हर साल 2 फरवरी को इतिहास के उन पन्नों को फिर से खोल देती है, जब 1837 में आदिवासी लड़ाकों ने अंग्रेजी हुकूमत की बड़ी फौज को तीर-धनुष, विशेष किस्म के गुलेल और पत्थरों के हथियारों से परास्त कर दिया था।  इस छापामार युद्ध में अंग्रेजी फौज के 100 से ज्यादा सैनिक मारे गए थे। इस भीषण संघर्ष में 26 आदिवासी लड़ाके भी शहीद हुए थे। 

बाद में अंग्रेजी हुकूमत ने इस विद्रोह के नायक पोटो हो और उनके साथियों को गिरफ्तार कर उन्हें सरेआम फांसी दे दी थी।शहादत की इस गौरवशाली गाथा का स्मरण करने के लिए हर साल 2 फरवरी को सेरेंगसिया घाटी में शहीद मेला आयोजित होता है। सोमवार को यहां जुटे हजारों लोगों ने शहीदों को श्रद्धांजलि दी। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, मंत्री दीपक बिरुआ, सांसद जोबा माझी ने सेरेंगसिया पहुंचकर शहीदों के स्मारकों पर शीश नवाया।

सीएम हेमंत ने कहा,“अंग्रेजों से लोहा लेते हुए शहीद हुए पुरखों के सपनों का राज स्थापित करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। हमारी सरकार इस दिशा में निरंतर काम कर रही है।”सेरेंगसिया घाटी में बनाए गए शहीदों के स्मारक पर आदिवासी लड़ाकों की बहादुरी और शहादत की दास्तान दर्ज है। अंग्रेजी शासन के दौर में कोल्हान नामक यह इलाका बंगाल प्रेसिडेंसी का हिस्सा था, लेकिन ‘हो’ जनजाति के लोग खुद को स्वतंत्र मानते थे।

1821 से ही उनके भीतर असंतोष पनपने लगा था, जो धीरे-धीरे विद्रोह में बदल गया। अंग्रेजों ने इस इलाके पर कब्जा जमाने के लिए गवर्नर जनरल के एजेंट कैप्टन विलकिंसन के नेतृत्व में एक सैन्य योजना बनाई। 17-18 नवंबर 1837 को कैप्टन आर्मस्ट्रांग के नेतृत्व में 400 सशस्त्र सैनिकों और 60 घुड़सवारों की एक बड़ी टुकड़ी कोल्हान की ओर बढ़ी। लेकिन इसकी भनक विद्रोह के नायक पोटो हो को पहले ही लग चुकी थी।

उन्होंने अपने साथियों के साथ सेरेंगसिया घाटी में घात लगाई। जैसे ही अंग्रेजी सेना घाटी में पहुंची, चारों ओर से तीरों की बौछार शुरू हो गई। दुर्गम पहाड़ियों और जंगलों में छेड़ा गया यह छापामार युद्ध अंग्रेजों के लिए भारी पड़ गया। तोपों और बंदूकों के बावजूद कंपनी की सेना को पीछे हटना पड़ा।इस संघर्ष में अंग्रेजों के 100 से अधिक सैनिक मारे गए, जबकि 26 आदिवासी योद्धा शहीद हुए। 

यह हार अंग्रेजी हुकूमत के लिए अपमानजनक थी। बदले की कार्रवाई में उन्होंने राजाबसा गांव पर हमला कर भारी रक्तपात मचाया।दिसंबर 1837 में पोटो हो और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया। मुकदमे के बाद 1 जनवरी 1838 को पोटो हो, बुड़ई हो और नारा हो को जगन्नाथपुर में फांसी दी गई, जबकि अगले दिन बोरा हो और पंडुवा हो को सेरेंगसिया घाटी में फांसी दी गई। इसके अलावा 79 आदिवासी लड़ाकों को जेल भेजा गया।

 

Tags: Hemant Soren , Chief Minister of Jharkhand , Jharkhand , Ranchi , Jharkhand Mukti Morcha

 

 

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