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मोटापे और कुपोषण से सीधे निपटना: मिशन सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 रणनीति : अन्नपूर्णा देवी

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5 Dariya News

चंडीगढ़ , 03 Oct 2025

Last updated on: Oct 04, 2025, 10:35 IST

2018 में, माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में, भारत के पोषण परिदृश्य को रूपांतरित करने के लिए एक प्रमुख योजना के रूप में पोषण अभियान शुरू किया गया था। महिलाओं और बच्चों के पोषण एवं कल्याण पर केंद्रित यह मिशन, भारत की कुपोषण के विरुद्ध लड़ाई में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ है। 

यह केवल एक योजना नहीं, बल्कि एक विकासशील भारत के निर्माण हेतु प्रतिबद्धता है- एक ऐसा भारत जो स्वस्थ, सशक्त और समावेशी हो।‘विकसित भारत@2047’ की यात्रा में पोषण अभियान एक प्रमुख स्तंभ बनकर उभरा है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु संकल्पित है- एक ऐसा भारत जहाँ हर बच्चा सुपोषित हो, हर माँ सशक्त हो, और हर नागरिक को आगे बढ़ने का अवसर मिले।

जब एक बच्चा सही पोषण पाता है, अच्छी तरह सीखता है और मजबूती से बढ़ता है- तो हम केवल एक जीवन नहीं, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र की दिशा बदलते हैं। बच्चों को पर्याप्त पोषण, शिक्षा और सामुदायिक देखभाल प्रदान करके हम एक सुरक्षित और समृद्ध भविष्य में निवेश कर रहे हैं- विकसित भारत के भावी नेतृत्व को आकार दे रहे हैं। एक स्वस्थ बच्चा केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि भारत के उज्ज्वल भविष्य की चिंगारी है।

मिशन सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 के माध्यम से मंत्रालय बच्चों, किशोरियों, गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं के पोषण परिणामों को बेहतर बनाने हेतु एक समन्वित तंत्र विकसित कर रहा है। इस अभियान का केंद्र है, देशभर में फैले 14 लाख आंगनवाड़ी केंद्रों का विशाल नेटवर्क, जो लगभग 10 करोड़ लाभार्थियों को सेवा प्रदान कर रहा है। 

यद्यपि इसमें 1 करोड़ से अधिक महिलाएँ और 23 लाख से अधिक किशोरियाँ शामिल हैं, लेकिन लाभार्थियों में से अधिकांश 6 महीने से 6 वर्ष की आयु के बच्चे हैं। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ‘एक समय पर एक भोजन’ के सिद्धांत पर कार्य करते हुए 8 करोड़ से अधिक बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण के ज़रिए, भविष्य को पोषित कर रहा है। 

इस प्रयास का मूल है- पूरक पोषण कार्यक्रम, जिसके अंतर्गत बच्चों को गर्म पका हुआ भोजन और सभी लाभार्थियों को पौष्टिक टेक होम राशन प्रदान किया जाता है, जिसका उद्देश्य अनुशंसित आहार भत्ता (आरडीए) और औसत दैनिक सेवन (एडीआई) के बीच के महत्वपूर्ण अंतर को पाटना है। हम विविध आहार को अपनाते हुए स्थानीय, मौसमी और पारंपरिक खाद्य पदार्थों जैसे श्री अन्न- जैसे ज्वार, बाजरा, रागी, कुट्टू आदि को बढ़ावा देकर- हम यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे हैं कि प्रत्येक बच्चे को सीखने, बढ़ने और फलने-फूलने के लिए आवश्यक ऊर्जा मिले।

जहाँ हमने बच्चों में स्टंटिंग और वेस्टिंग की समस्याओं से निपटने में प्रगति की है, वहीं अब हम एक अन्य महत्वपूर्ण पोषण संकेतक- अधिक वजन और मोटापे की समस्या को भी दूर करने की दिशा में अग्रसर हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, बचपन में मोटापा बच्चों के वयस्क होने पर उनके लिए गंभीर परिणाम उत्पन्न कर सकता है, जिससे टाइप-2 मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी गैर-संचारी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। 

मोटापे और अधिक वजन के मनोवैज्ञानिक परिणाम भी हो सकते हैं, जो स्कूल के प्रदर्शन और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं, और बढ़ते भेदभाव और कलंक के कारण यह स्थिति और भी बदतर हो जाती है। यूनिवर्सिटी ऑफ़ सदर्न कैलिफ़ोर्निया द्वारा यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया बर्कले और मैकगिल के सहयोग से किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि जिन बच्चों को गर्भावस्था के दौरान गर्भ में रहते हुए भी, अपने पहले 1,000 दिनों के दौरान चीनी सेवन पर नियंत्रण लगाया गया, उनमें वयस्क होने पर टाइप 2 मधुमेह होने का जोखिम 35 प्रतिशत तक कम और उच्च रक्तचाप होने का जोखिम 20 प्रतिशत तक कम हो गया। 

यह दर्शाता है कि गर्भवती माँ का चीनी सेवन भी बच्चों के दीर्घकालिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डालता है। इस समस्या के समाधान और पूरक पोषण की समग्र गुणवत्ता में सुधार के लिए, मंत्रालय ने हाल ही में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पूरक पोषण की संरचना के संबंध में एक परामर्श जारी किया है। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन(WHO) और राष्ट्रीय पोषण संस्थान (NIN) की सिफारिशों के अनुरूप है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दिशानिर्देशों के अनुसार, वयस्कों और बच्चों, दोनों के लिए चीनी का सेवन कुल दैनिक ऊर्जा सेवन के 10 प्रतिशत तक कम किया जाना चाहिए। WHO दैनिक ऊर्जा सेवन में अधिमुक्त शर्करा (free sugars)की मात्रा को और घटाकर 5 प्रतिशत करने की सिफारिश की गई है। राष्ट्रीय पोषण संस्थान NIN की 2024 के आहार दिशानिर्देशों के अनुसार, 2 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को कोई अतिरिक्त चीनी नहीं दी जानी चाहिए और गर्भवती महिलाओं सहित सभी आयु व जेंडर समूहों के लिए चीनी का सेवन 5 प्रतिशत से कम होना चाहिए।

अधिमुक्त शर्करा बच्चों में दंत क्षय (cavities) और दांतों की सड़न- का एक प्रमुख कारण भी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, यह “दंत क्षय(कैविटी)कोबढ़ाने में एक आवश्यक आहार कारक” है। चीनी सेवन को सीमित करने से बच्चों में दांतों की सड़न और क्षय को कम किया जा सकता है। हमारे मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को परामर्श दिया है कि परिष्कृत चीनी का उपयोग सीमित किया जाए, ज़रूरत पड़ने पर गुड़ या अन्य प्राकृतिक मिठास का इस्तेमाल करें, और इसे कुल ऊर्जा सेवन के 5 प्रतिशत से कम तक सीमित रखें। हमने अनुरोध किया है कि पूरक पोषण में नमक का इस्तेमाल कम से कम किया जाए। 

हम राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से सुबह के नाश्ते और स्वास्थ्यवर्धक आहार में मिठास वाले व्यंजनों की संख्या भी घटाने का आग्रह किया गया है। हम राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को ऐसे THR व्यंजन विकसित करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं जिनमें अतिरिक्त नमक और चीनी न हो, जिससे लाभार्थी अपनी व्यक्तिगत पसंद के अनुसार स्वाद बदल सकें। सभी आयु समूहों में वसा, नमक और चीनी (HFSS) की अधिकता वाले खाद्य पदार्थों के उपयोग को भी हतोत्साहित किया गया है। 

खाद्य गुणवत्ता में सुधार के लिए हमने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से आग्रह किया है कि सामग्री को खाद्य सुरक्षा और मानक विनियम 2011 का पालन करना चाहिए और शिशु आहार खाद्य सुरक्षा और मानक (शिशु पोषण हेतु खाद्य) विनियम, 2020 का पालन करना चाहिए।अतिरिक्त चीनी को ‘ना’ कहकर, भारत मोटापे, उच्च रक्तचाप व मधुमेह जैसी रोकथाम योग्य बीमारियों से मुक्त भविष्य के लिए ‘हाँ’ कह रहा है।

जहाँ पारंपरिक खाद्य पदार्थ बाज़ार में लोकप्रिय हो रहे हैं, वहीं मंत्रालय पहले से ही ‘पुष्टाहार’- स्थानीय, मौसमी सामग्री और अनाज जैसे रागी, बाजरा, टुकड़ा गेहूँ, चना और फोर्टिफाइड चावल से बने पौष्टिक प्रीमिक्स प्रदान कर रहा है। ये मिश्रण- स्वाद और पोषण दोनों में समृद्ध हैं, जिन्हें स्थानीय स्वादानुसार मीठे या नमकीन रूप में तैयार किया जा सकता है। पुष्टाहार, दुकानों से खरीदे जाने वाले मिश्रणों का एक स्वास्थ्यवर्धक और अधिक बहुमुखी विकल्प है, जो स्थानीय, मौसमी स्वाद और संपूर्ण पोषण प्रदान करता है।

जैसे-जैसे हम अपने नागरिकों को पर्याप्त कैलोरी प्रदान करके सुपोषित भारत की ओर बढ़ रहे हैं, यह भी महत्वपूर्ण है कि हमारे बच्चों और महिलाओं को जो भोजन दिया जा रहा है,उसकी गुणवत्ता पर ध्यान दें। यह आवश्यक है कि हम अपने बच्चों, जो हमारे देश का भविष्य हैं, को जो भोजन प्रदान करते हैं, वह उनके समग्र विकास और स्वास्थ्य के लिए उपयुक्त होना चाहिए।

हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी ने कहा है, “अपने खान-पान की आदतों में छोटे-छोटे बदलाव करके हम अपने भविष्य को अधिक मजबूत, स्वस्थ और रोग-मुक्त बना सकते हैं।” इस अमृत काल में, हमारे बच्चों को पौष्टिक भोजन और पर्याप्त कैलोरी उपलब्ध होनी चाहिए। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उनके लिए भोजन न केवल पर्याप्त होना चाहिए, बल्कि पौष्टिक भी होना चाहिए, जो उनके समग्र विकास और वृद्धि में योगदान दे।

 

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