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डॉ. जितेन्द्र सिंह ने विश्व पर्यावरण दिवस ​​पर कहा : अगली पीढ़ी के लिए पर्यावरण को संरक्षित करना हमारा कर्तव्य है

'विज्ञान, स्थिरता और युवा परिवर्तन लाएंगे': डॉ. जितेंद्र सिंह ने हरित भविष्य के लिए डीएसटी के विजन का खुलासा किया

Dr Jitendra Singh, Bharatiya Janata Party, BJP, World Environment Day, Ek Ped Maa Ke Naam
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5 Dariya News

नई दिल्ली , 05 Jun 2025

Last updated on: Jun 06, 2025, 13:14 IST

आज "विश्व पर्यावरण दिवस" ​​के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए केन्द्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा प्रधानमंत्री कार्यालय, परमाणु ऊर्जा विभाग, अंतरिक्ष विभाग, कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन राज्य मंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह ने कहा कि "अगली पीढ़ी के लिए पर्यावरण को संरक्षित करना हमारा कर्तव्य है।"

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री ने वैश्विक जलवायु कार्रवाई में भारत की अग्रणी भूमिका की पुन: पुष्टि की तथा नागरिकों और संस्थानों से राष्ट्रीय कर्तव्य के रूप में स्थायी प्रथाओं को अपनाने का आग्रह किया।  आज वर्चुअल रूप से आयोजित टीएटीडब्ल्यूए कार्यक्रम- ट्रास्फार्मिंग (उत्सर्जन) वायु, (बढ़ता) तापमान और जल (गुणवत्ता) जलवायु कार्रवाई के माध्यम से- को संबोधित करते हुए, जो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर आयोजित किया गया था, उन्होंने रेखाकिंत किया कि भारत का जलवायु प्रतिस्कंदन दृष्टिकोण वैज्ञानिक नवाचार और जन भागीदारी में निहित है।

"पृथ्वी हमें सब कुछ देती है- स्वच्छ हवा, ताजा पानी, उपजाऊ भूमि। लेकिन हम इन उपहारों को हलके में लेते हैं,’’ डॉ. जितेंद्र सिंह ने वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं, स्टार्ट-अप और छात्रों से भरे सभागार को संबोधित करते हुए कहा।  प्रदूषण, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन से बढ़ते खतरों की चेतावनी देते हुए उन्होंने कहा कि इन चुनौतियों का मुकाबला सामूहिक जिम्मेदारी बनना चाहिए, जो  व्यवहार परिवर्तन और मिशन लाइफ-लाइफस्टाइल फॉर एनवायरनमेंट जैसे जीवनशैली-प्रेरित आंदोलनों द्वारा संभव हो।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की साहसिक जलवायु प्रतिज्ञाओं, विशेष रूप से सीओपी26 में घोषित 'पंचामृत' प्रतिबद्धताओं पर प्रकाश डाला। इनमें 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन ऊर्जा क्षमता प्राप्त करना और नवीकरणीय ऊर्जा के माध्यम से 50 प्रतिशत ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करना, कार्बन उत्सर्जन में 1 बिलियन टन की कटौती करना, कार्बन तीव्रता में 45 प्रतिशत  की कमी करना और 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन प्राप्त करना शामिल है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने इन लक्ष्यों को प्राप्त करने में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की रणनीतिक भूमिका पर भी जोर दिया। उन्होंने जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना के तहत विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा संचालित दो राष्ट्रीय जलवायु मिशनों का उल्लेख किया: हिमालयी इकोसिस्टम को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय मिशन (एनएमएसएचई) और जलवायु परिवर्तन संबंधी रणनीतिक ज्ञान पर राष्ट्रीय मिशन (एनएमएसकेसीसी)। 

दोनों का उद्देश्य जलवायु अनुसंधान को मजबूत करना, नाजुक इकोसिस्टम्स की रक्षा करना और दीर्घकालिक स्थिरता का निर्माण करना है। डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग वैज्ञानिक बुनियादी ढांचे और क्षमता निर्माण में भारी निवेश कर रहा है। 

प्रमुख पहलों में कश्मीर विश्वविद्यालय में भारत का दूसरा आइस-कोर अनुसंधान सुविधा केंद्र, स्वचालित मौसम स्टेशनों की स्थापना और शैक्षणिक संस्थानों में उच्च स्तरीय कंप्यूटिंग क्षमताएं शामिल हैं। डॉ. जितेंद्र सिंह ने जलवायु नवाचार में युवाओं की बढ़ती भूमिका पर भी प्रकाश डाला, जिसमें आईआईटी मंडी के 'हिमालयन स्टार्टअप ट्रेक' को पहाड़ी इकोसिस्टम चुनौतियों पर केंद्रित स्टार्टअप का समर्थन करने वाली एक उत्कृष्ट पहल के रूप में उल्लेख किया।

एक महत्वपूर्ण नीतिगत पहल के रूप में डीएसटी ने शहरी जलवायु और चरम घटनाओं का अनुसंधान का समर्थन करने के लिए एक विशेष कॉल शुरू की - भारतीय शहरों की बढ़ती कमज़ोरियों को स्वीकार करते हुए। शमन के मोर्चे पर, डीएसटी बिजली और सीमेंट क्षेत्रों के लिए हाइड्रोजन वैली इनोवेशन क्लस्टर (एचवीआईसी) और कार्बन कैप्चर एंड यूटिलाइजेशन (सीसीयू) प्रौद्योगिकियों जैसी पहलों के माध्यम से डीकार्बोनाइजेशन और स्वच्छ ऊर्जा में अत्याधुनिक कार्य को आगे बढ़ा रहा है। 

इन कार्यक्रमों ने मिशन इनोवेशन ढांचे के तहत यूके और स्वीडन जैसे देशों के साथ मजबूत अंतरराष्ट्रीय साझेदारी को भी सक्षम बनाया है। इन प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए कई सीएसआईआर प्रयोगशालाएं - जिनमें आईआईसीटी, एनसीएल, एनईईआरआई, एनआईआईएसटी और आईआईपी शामिल हैं - हरित हाइड्रोजन और बायोडिग्रेडेबल पॉलिमर से लेकर अपशिष्ट से संपदा समाधान और जलवायु अनुकूल निर्माण सामग्रियों तक की प्रौद्योगिकियों पर काम कर रही हैं।

मंत्री महोदय ने भारत की बायोई3 नीति- अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव प्रौद्योगिकी- को देश के नेट जीरो कार्बन अर्थव्यवस्था रोडमैप के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में भी रेखांकित किया। यह नीति जैव विनिर्माण, जैव-आधारित रसायनों और जलवायु-प्रतिस्कंदी कृषि का समर्थन करके एक चक्रीय जैव अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देती है, साथ ही जैव प्रौद्योगिकी नवाचार और रोजगार को बढ़ाने के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी को भी बढ़ावा देती है।

व्यापक जलवायु रणनीतियों की रूपरेखा भी तैयार की गई, जिसमें नीली अर्थव्यवस्था पर राष्ट्रीय नीति भी शामिल है, जिसका उद्देश्य मत्स्य पालन, पर्यटन और समुद्री ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में समुद्री संसाधनों का अनुकूलन करना है। प्रधानमंत्री द्वारा हाल ही में भुज में किए गए 50,000 करोड़ रुपये के विकास कार्य को समुद्र आधारित सतत विकास के प्रति भारत की प्रतिबद्धता के प्रमाण के रूप में उद्धृत किया गया। 

'मिशन मौसम' जैसी पहलों को भी अगली पीढ़ी की पूर्वानुमान प्रोद्योगिकियों का उपयोग करके भारत की मौसम निगरानी और जलवायु प्रतिस्पंधन बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण बताया गया। डॉ. जितेंद्र सिंह ने इन विविध निवेशों को "भारत सरकार द्वारा जलवायु कार्रवाई को दी जाने वाली तत्परता और महत्व का प्रमाण" बताया। 

उन्होंने टीएटीडब्ल्यूए कार्यक्रम के आयोजन और भारत के अनुसंधान-संचालित स्थिरता एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए डीएसटी टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा, "डीएसटी के सचिव प्रो. अभय करंदीकर के नेतृत्व और सीईएसटी प्रभाग की प्रमुख डॉ. अनीता गुप्ता के मार्गदर्शन में डीएसटी विज्ञान-आधारित, लोगों द्वारा संचालित हरित भविष्य की नींव रख रहा है।"

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) ने स्वच्छ, स्थायी और प्रतिस्तंबी ऊर्जा एवं जलवायु भविष्य की ओर भारत के परिवर्तन को तेज करने के उद्देश्य से कई प्रमुख पहलें शुरू कीं। प्रमुख रिलीज में स्वच्छ कोयला प्रौद्योगिकियों का संग्रह शामिल था, जो वर्ष 2017 में शुरू किए गए स्वच्छ कोयला अनुसंधान एवं विकास कार्यक्रम की उपलब्धियों को उजागर करता है। 

यह संग्रह 188 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश के साथ बहु-संस्थागत और पीआई-नेतृत्व वाले सहयोग के माध्यम से विकसित 34 नवीन प्रौद्योगिकियों को प्रदर्शित करता है। इसके अलावा, डीकार्बोनाइजेशन पर प्रौद्योगिकी आवश्यकता मूल्यांकन (टीएनए) का कार्यकारी सारांश भी जारी किया गया, जो ऊर्जा, परिवहन, उद्योग, कृषि और अन्य क्षेत्रों में जलवायु शमन और अनुकूलन के लिए क्षेत्र-विशिष्ट प्रौद्योगिकियों को प्राथमिकता देता है।

इसके अतिरिक्त, डीएसटी ने स्थिरता के महत्वपूर्ण क्षेत्रों को कवर करने वाली नई परियोजनाएं शुरू कीं। इनमें एंड-ऑफ़-लाइफ़ सोलर पीवी मॉड्यूल की रिकवरी और रिसाइकिलिंग पर पहल शामिल है, जो चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए 15 चयनित प्रस्तावों का समर्थन करती है; और शहरी जलवायु परिवर्तन अनुसंधान, जो तेज़ी से बढ़ते भारतीय शहरों में प्रतिस्कंदन बढ़ाने का लक्ष्य रखता है। 

अंतर्राष्ट्रीय सहयोगों पर भी प्रकाश डाला गया, जिसमें इंडो-डेनिश ग्रीन हाइड्रोजन प्रोजेक्ट्स और इंडो-डच हाइड्रोजन वैली फ़ेलोशिप प्रोग्राम शामिल हैं, जो ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र में नवाचार और प्रतिभा विकास को बढ़ावा देते हैं। इसके अलावा, जीआरआईएच-कूल आर एंड डी कॉल के लॉन्च का उद्देश्य इमारतों के लिए ग्रिड-प्रतिक्रियाशील, स्थायी तापन और कूलिंग प्रोद्योगिकियों को विकसित करना है, जो राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (एनडीसी) के तहत भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं में और योगदान देता है।

इस कार्यक्रम में प्रोफेसर अभय करंदीकर, भारत में नीदरलैंड की राजदूत सुश्री मारिसा जेरार्ड्स, बिट्स पिलानी के एमेरिटस प्रोफेसर डॉ. आरआर सोंडे और डॉ. अनीता गुप्ता सहित अनेक प्रमुख गणमान्य व्यक्तियों के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिकों, उद्यमियों और छात्रों की एक बड़ी संख्या उपस्थित थी।

 

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