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विष्णु प्रभाकर और मुद्राराक्षस : हिंदी साहित्य के दो महान रचनाकार, एक ने लौटाया पद्म भूषण तो दूसरे ने जीवनभर मूल्यों की मशाल थामी

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Gurpreet Singh

Gurpreet Singh

5 Dariya News

नई दिल्ली , 20 Jun 2026

Last updated on: Jun 20, 2026, 18:05 IST

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में 21 जून 1912 को जन्मे विष्णु प्रभाकर का शुरुआती नाम 'विष्णु दयाल' था, जो स्कूल में 'विष्णु गुप्ता' और दफ्तर में 'विष्णु धर्मदत्त' हो गया। अंत में, पंजाब विश्वविद्यालय से 'प्रभाकर' की परीक्षा पास करने के बाद एक संपादक के सुझाव पर वे सदा के लिए 'विष्णु प्रभाकर' बन गए।   

बता दें कि 'प्रभाकर' की परीक्षा मुख्य रूप से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत (गायन, वादन और नृत्य) के क्षेत्र में छह वर्षीय पाठ्यक्रम को पूरा करने के बाद दी जाने वाली अंतिम परीक्षा है। इसे संगीत के क्षेत्र में स्नातक के समकक्ष माना जाता है।वहीं, 21 जून 1933 को लखनऊ के पास जन्मे सुभाषचंद्र आर्य, उर्फ सुहास वर्मा की धारदार लेखनी को 'युगचेतना' के संपादक ने देखा, तो विशाखदत्त के प्रसिद्ध संस्कृत नाटक से प्रेरित होकर उन्हें छद्म नाम 'मुद्राराक्षस' दिया। 

यह नाम उनके विद्रोही मिजाज पर ऐसा फंसा कि उनका असली नाम इतिहास के पन्नों में कहीं खो गया। इन दोनों लेखकों की वैचारिकी जितनी अलग थी, अपने स्वाभिमान को लेकर उनका समर्पण उतना ही अडिग था। ये दोनों ही लेखक व्यवस्था के आगे कभी नहीं झुके।

वर्ष 1975 में जब देश पर आपातकाल का काला साया मंडरा रहा था, तब मुद्राराक्षस ऑल इंडिया रेडियो में स्क्रिप्ट एडिटर के पद पर थे। सत्ता की दमनकारी नीतियों और सेंसरशिप से आहत होकर उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी और जीवनभर स्वतंत्र रहने का फैसला किया। 

यद्यपि वे जन्मना दलित नहीं थे लेकिन रूढ़ियों पर उनके प्रहार के कारण आंबेडकरवादी संगठनों ने उन्हें 'शूद्राचार्य' और 'दलित रत्न' की उपाधियों से नवाजा। राष्ट्रपति भवन में हुए एक प्रशासनिक दुर्व्यवहार से आहत होकर विष्णु प्रभाकर ने देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान 'पद्म भूषण' (जो उन्हें 2004 में मिला था) को लौटाने की घोषणा कर दी। 

उनका स्पष्ट संदेश था कि लेखक का सम्मान किसी भी राजकीय सत्ता से ऊपर है। नाटक और रंगमंच के मैदान में भी इन दोनों का मुकाबला कमाल का था। मुद्राराक्षस केवल नाटक नहीं लिखते थे बल्कि उसे मंच पर जीते थे। उन्होंने अवध की पारंपरिक नौटंकी, स्वांग और भांड शैलियों को मिलाकर आधुनिक राजनीतिक चेतना से लैस किया। 

उनका कालजयी नाटक 'आला अफसर' (गोगोल के 'गवर्नमेंट इंस्पेक्टर' का भारतीय रूपांतरण) आज भी भ्रष्टाचार पर सबसे करारा व्यंग्य है, जिसमें 'रंगा' नाम का सूत्रधार पूरे नाटक को नियंत्रित करता है। वहीं, उनके नाटक 'तिलचट्टा' ने मध्यवर्गीय यौन कुंठाओं और पाखंड को नग्न रूप में सबके सामने रखा।

इसके विपरीत, विष्णु प्रभाकर के नाटकों का संसार पारिवारिक रिश्तों के बिखरने की त्रासदी और नैतिक मूल्यों के पतन से बुनता है। उनके नाटक जैसे 'डॉक्टर,' 'युगे-युगे क्रांति,' और 'टूटते परिवेश' तकनीकी तड़क-भड़क के बजाय इंसानी रिश्तों के द्वंद्व और पीढ़ीगत संघर्ष को बेहद खूबसूरती से रंगमंच पर उतारते हैं।

सुभाष चंद्र आर्य 13 जून 2016 को इस दुनिया को छोड़कर चले गए जबकि विष्णु प्रभाकर ने 11 अप्रैल 2009 को इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।

 

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