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राजा राममोहन राय : सती प्रथा पर रोक, ब्रह्म समाज और महिला सशक्तीकरण की लड़ी ऐतिहासिक जंग

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Armaan

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5 Dariya News

नई दिल्ली , 21 May 2026

Last updated on: May 21, 2026, 16:16 IST

1772 में जन्मे राजा राममोहन राय को आधुनिक भारत का जनक माना जाता है। धार्मिक अंधविश्वासों, सामाजिक कुरीतियों और रूढ़िवादी परंपराओं के विरुद्ध उन्होंने जो संघर्ष किया, वह आज भी भारतीय समाज को प्रेरित करता है। वे धार्मिक सुधार और सामाजिक विकास के क्षेत्र में सच्चे अग्रणी साबित हुए। राममोहन राय का जन्म 22 मई 1772 को बंगाल के राधानगर गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

बचपन से ही उन्होंने संस्कृत, फारसी, अरबी, हिंदी और बाद में अंग्रेजी, लैटिन और ग्रीक जैसी भाषाओं का गहन अध्ययन किया। विभिन्न धर्मों का अध्ययन करने के बाद वे एक ईश्वर में विश्वास करने लगे। उन्होंने हिंदू धर्म की पुनर्व्याख्या की और मूर्तिपूजा और अंधविश्वासों का विरोध किया। उनका सबसे बड़ा योगदान सती प्रथा के विरुद्ध अभियान था।

उस समय विधवाओं को पति की चिता पर जीवित जलाने की क्रूर प्रथा प्रचलित थी। राममोहन राय ने इस अमानवीय रिवाज के खिलाफ साक्षात्कारों, लेखन और याचिकाओं के माध्यम से संघर्ष किया। उनके निरंतर प्रयासों का परिणाम यह हुआ कि 1829 में लॉर्ड विलियम बेंटिंक ने सती प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। यह भारतीय महिलाओं के उत्थान की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम था।

धार्मिक क्षेत्र में उनका सबसे महत्वपूर्ण कार्य ब्रह्म समाज की स्थापना (1828) था। उन्होंने हिंदू धर्म को शुद्ध रूप में लाने का प्रयास किया। ब्रह्म समाज एक ईश्वर की उपासना, बिना मूर्ति और बिना कर्मकांड के सादा पूजा पद्धति पर आधारित था। उन्होंने कहा था कि सभी धर्मों का मूल सत्य एक है। उन्होंने इस्लाम, ईसाई धर्म और हिंदू दर्शन का गहरा अध्ययन किया और उनके मध्य सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया।

सामाजिक सुधारों में भी वे आगे रहे। उन्होंने बाल विवाह, बहुविवाह और दास प्रथा का घोर विरोध किया। महिलाओं को शिक्षा का अधिकार दिलाने, विधवा विवाह को वैध बनाने और संपत्ति में उनका हिस्सा सुनिश्चित करने के लिए निरंतर आवाज उठाई। उन्होंने आधुनिक शिक्षा प्रणाली की वकालत की और अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा दिया।

1817 में उन्होंने हिंदू कॉलेज की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो बाद में प्रेसिडेंसी कॉलेज बना। राममोहन राय प्रेस की स्वतंत्रता के भी पुरोधा थे। उन्होंने समाचार पत्रों के माध्यम से जन जागृति फैलाई। उन्होंने 'समवाद कौमुदी' और 'मिरात-उल-अखबार' जैसे पत्र निकाले। वे भारत को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता दिलाने के पक्षधर थे, लेकिन उन्होंने शिक्षा और सुधारों के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता को व्यर्थ माना।

1830 में वे इंग्लैंड गए, जहां उन्होंने भारतीय हितों का प्रतिनिधित्व किया। 27 सितंबर 1833 को ब्रिस्टल में उनका निधन हो गया। आज जब हम समानता, महिला सशक्तिकरण और धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं, तो राजा राममोहन राय का नाम सबसे आगे आता है। वे केवल एक सुधारक नहीं, बल्कि एक विचारक, दार्शनिक और क्रांतिकारी थे जिन्होंने अंधेरे युग से भारत को आधुनिक युग की ओर मोड़ा।

उनकी विचारधारा आज भी प्रासंगिक है, क्योंकि साम्प्रदायिक सद्भाव, महिला सम्मान और वैज्ञानिक सोच जैसी चुनौतियां अभी भी हमारे सामने हैं। राजा राममोहन राय ने साबित कर दिया कि एक व्यक्ति भी समाज को बदलने की ताकत रखता है, बशर्ते उसमें साहस, ज्ञान और दृढ़ संकल्प हो।

 

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