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यादों में चट्टोपाध्याय : वो अफसर जिसने अंग्रेजों की नौकरी करते हुए रची बगावत, दिया देशभक्ति का पहला मंत्र

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Armaan

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नई दिल्ली , 07 Apr 2026

Last updated on: Apr 07, 2026, 12:49 IST

'साहित्य सम्राट' बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने भारत को 'वंदे मातरम' का एक ऐसा मंत्र दिया जिसने आजादी की लड़ाई का रुख ही बदल दी। 26 जून 1838 को पश्चिम बंगाल के नैहाटी के पास कांठलपाड़ा में जन्मे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की कहानी ही विरोधाभासों से शुरू होती है। साल 1857, जब पूरा उत्तर और मध्य भारत अंग्रेजों के खिलाफ 'सिपाही विद्रोह' की आग में सुलग रहा था, तब कलकत्ता में एक अलग ही शांति पसरी थी।

कलकत्ता विश्वविद्यालय अपनी पहली डिग्री परीक्षाएं ले रहा था। बंदूकों के शोर के बीच बंकिम अपनी किताबों में खोए थे और इतिहास के पहले दो स्नातकों में से एक बनकर निकले। उनकी इस मेधा को देखते हुए अंग्रेजों ने उन्हें मात्र 20 साल की उम्र में डिप्टी मजिस्ट्रेट बना दिया। उन्होंने 32 साल तक अंग्रेजों की नौकरी की। उन्हें 'राय बहादुर' का खिताब भी मिला।

बता दें कि 'राय बहादुर' ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में व्यक्तियों को उनकी उत्कृष्ट सेवाओं, निष्ठा या जन कल्याणकारी कार्यों के लिए दिया जाने वाला एक मानद उपाधि थी। बाहर से देखने पर वह ब्रिटिश सत्ता के एक अहम पुर्जे थे लेकिन एक स्वाभिमानी हिंदुस्तानी होने के नाते उन्हें अंग्रेजों का अहंकार अंदर ही अंदर कचोटता था।

वे जानते थे कि सीधे बगावत का मतलब जेल है, इसलिए उन्होंने बगावत का दूसरा रास्ता, 'कलम का रास्ता,' चुना। दिलचस्प बात यह है कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपनी साहित्यिक पारी की शुरुआत अंग्रेजी से की थी। उनका पहला उपन्यास 'राजमोहन की पत्नी' अंग्रेजी में था। हालांकि जल्द ही उन्हें समझ आ गया कि अगर सोई हुई अवाम को जगाना है, तो उन्हें उनकी अपनी भाषा में बात करनी होगी।

1865 में उन्होंने 'दुर्गेशनंदिनी' लिखा, जिसने बंगाली साहित्य में जैसे भूचाल ला दिया। इसके बाद 'कपालकुंडला', 'विषबृक्ष' और 1872 में उनके द्वारा शुरू की गई पत्रिका 'बंगदर्शन' ने बंगाल के बौद्धिक समाज की नींद उड़ा दी। उनके जीवन का सबसे बड़ा मास्टरस्ट्रोक 1882 में आया, जब उन्होंने 'आनंदमठ' प्रकाशित किया।

चूंकि वे एक सरकारी अफसर थे, इसलिए सीधे तौर पर अंग्रेजों को खलनायक नहीं बना सकते थे। उन्होंने बड़ी चतुराई से 18वीं सदी के 'संन्यासी विद्रोह' को अपनी कहानी का आधार बनाया। उन्होंने इतिहास के उन संन्यासियों को 'संतान' नामक ऐसे अनुशासित और देशभक्त योद्धाओं में बदल दिया, जो भारत माता की रक्षा के लिए अपनी जान देने को तैयार थे।

इसी उपन्यास के पन्नों में 'वंदे मातरम' गीत छिपा था जिसने भारत की तकदीर बदल दी। बहुत कम लोग जानते हैं कि यह गीत उपन्यास के लिखे जाने से काफी पहले, 1870 के दशक में हुगली नदी के किनारे एक शांत शाम को रचा गया था। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने पहली बार भारत की मिट्टी को केवल जमीन का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि साक्षात देवी 'भारत माता' के रूप में पेश किया।

1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार कांग्रेस के मंच से इस गीत को गाया, लेकिन इसका असली जादू 1905 के 'बंगाल विभाजन' के दौरान दिखा। अंग्रेजों ने इस गीत पर पाबंदी लगा दी और इसे गाने वालों को जेल में बंद कर दिया, लेकिन पाबंदियों ने इस आग को और भड़का दिया। कलकत्ता की सड़कों से लेकर लंदन के 'इंडिया हाउस' तक, 'वंदे मातरम' क्रांतिकारियों का अजेय युद्धघोष बन गया।

1907 में जर्मनी में भीकाजी कामा द्वारा फहराए गए भारत के पहले विदेशी झंडे के बीच की पीली पट्टी पर भी 'वंदे मातरम' ही लिखा था। आजादी के बाद जब राष्ट्रगान चुनने की बारी आई, तो इस गीत के कुछ पदों (जिनमें देवी दुर्गा का जिक्र था) को लेकर विवाद हुआ। तत्कालीन मुस्लिम लीग ने इसका कड़ा विरोध किया। ऐसे में भारत के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को बचाए रखने के लिए संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को एक ऐतिहासिक फैसला लिया।

तय हुआ कि 'वंदे मातरम' के शुरुआती दो पदों को अपनाया जाएगा और इसे 'जन गण मन' के बराबर 'राष्ट्रीय गीत' का दर्जा दिया जाएगा। बता दें कि केंद्र सरकार ने फरवरी 2026 में भारत के राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के गायन के लिए आधिकारिक प्रोटोकॉल स्थापित करने वाले नए व्यापक दिशानिर्देश जारी किए, जिसमें यह निर्दिष्ट किया गया कि सरकारी समारोहों में इसे कैसे और कब प्रस्तुत किया जाना चाहिए और दर्शकों से अपेक्षित आचरण, विशेष रूप से राष्ट्रगान के संबंध में, क्या होना चाहिए।

8 अप्रैल 1894 को उनका निधन हो गया। उस दौर में किसी की मौत पर सिर्फ घरों में शोक मनाया जाता था। लेकिन रवींद्रनाथ टैगोर ने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के लिए एक विशाल सार्वजनिक शोक सभा बुलाई। यह भारत के इतिहास में पहली बार था जब पूरे राष्ट्र ने अपने किसी नायक के लिए एक साथ आंसू बहाए थे।

 

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