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राही मासूम रजा : मुस्लिम लेखक जिसने महाभारत की पटकथा लिखकर साबित किया कि कला धर्म से परे

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5 Dariya News

नई दिल्ली , 14 Mar 2026

Last updated on: Mar 14, 2026, 16:05 IST

बात 1980 के दशक के उत्तरार्ध की है। दूरदर्शन पर बीआर चोपड़ा भारत के सबसे बड़े महाकाव्य 'महाभारत' को पर्दे पर उतारने की तैयारी कर रहे थे। जब यह घोषणा हुई कि इस पवित्र हिंदू महाकाव्य के संवाद एक मुस्लिम लेखक लिखेंगे, तो हंगामा मच गया। सवाल उठा, "क्या कोई हिंदू विद्वान नहीं बचा जो एक मुसलमान हमारे धर्मग्रंथ की पटकथा लिखेगा? उस लेखक ने कोई रक्षात्मक जवाब नहीं दिया, बल्कि एक ऐसी गर्जना की जिसने सभी की बोलती बंद कर दी। 

उन्होंने कहा, "मैं गंगा का पुत्र हूं। मुझसे बेहतर महाभारत कौन लिख सकता है?" यह बेबाक आवाज थी डॉ. राही मासूम रजा की। फिर जब टीवी स्क्रीन पर एक घूमते हुए पहिये के साथ भारी आवाज गूंजी, "मैं समय हूं..." तो पूरे भारत ने न सिर्फ महाभारत को समझा, बल्कि राही मासूम रजा की उस कलम का लोहा भी मान लिया जो किसी धर्म की मोहताज नहीं थी।

1 सितंबर 1927 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर स्थित 'गंगौली' गांव के एक रसूखदार शिया जमींदार परिवार में जन्मे राही का बचपन किसी राजकुमार जैसा नहीं था। महज छह साल की उम्र में उन्हें टीबी और पोलियो जैसी जानलेवा बीमारियों ने जकड़ लिया, लेकिन यह बीमारी उनके लिए एक वरदान बन गई। उनके अकेलेपन को दूर करने के लिए 'कल्लू काका' नाम के एक सेवक उन्हें लोककथाएं और किंवदंतियां सुनाया करते थे।

1947 में जब मुल्क का बंटवारा हुआ, तो नफरत की आंधियां चलीं। कई संभ्रांत मुस्लिम परिवार पाकिस्तान जा रहे थे। राही मासूम रजा के पिता, जो एक नामी वकील थे, उन्होंने इस नवगठित देश में जाने से साफ इनकार कर दिया। अपनी बीमारी से उबरकर राही मासूम रजा ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) का रुख किया।

वामपंथी विचारों से प्रभावित राही जल्द ही छात्रों के चहेते प्रोफेसर बन गए, लेकिन उनकी जिंदगी में एक ऐसा तूफान आया जिसने भारतीय साहित्य की धारा ही मोड़ दी। राही मासूम रजा ने नैयर जहां से शादी कर ली, जिनका रामपुर राजघराने के एक व्यक्ति से तलाक हो चुका था। एएमयू का तथाकथित "उर्दू अभिजात्य वर्ग" इस बात से इतना खफा हुआ कि उन्होंने राही का बहिष्कार कर दिया।

उनके अपने ही परिसर में उनके खिलाफ ऐसी राजनीति हुई कि उस स्वाभिमानी इंसान को नौकरी छोड़नी पड़ी। यह उर्दू साहित्य का दुर्भाग्य था और हिंदी साहित्य का सौभाग्य। इस घटना ने उन्हें इतना आहत किया कि उन्होंने उर्दू लिपि से मुंह मोड़ लिया और देवनागरी (हिंदी) में लिखना शुरू कर दिया। 1967 में अपनी पत्नी के साथ वह बॉम्बे (अब मुंबई) चले गए।

बॉम्बे पहुंचकर राही ने वो लिखा जो हिंदी साहित्य में पहले कभी नहीं लिखा गया था, 'आधा गांव'। यह उपन्यास कोई चमचमाती रूमानी कहानी नहीं थी। इसमें गंगौली गांव की धूल थी, वहां का पसीना था, सामंती पाखंड था और भरपूर गालियां थीं। उपन्यास में गांव की औरतें खालिस 'भोजपुरी' बोलती थीं और शहरी उर्दू को 'वेश्याओं की भाषा' कहकर दुत्कारती थीं।

राही मासूम रजा ने साबित कर दिया कि भाषा किसी मजहब की नहीं, बल्कि भूगोल की होती है। उन्होंने हिंदी और उर्दू के बंटवारे को झूठा करार देते हुए 'हिन्दवी' की वकालत की। उनके दूसरे उपन्यास 'टोपी शुक्ला' ने हिंदू-मुस्लिम दोस्ती (टोपी और इफ्फान) के जरिए बंटवारे के खोखलेपन को तार-तार कर दिया। 

बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री में राही ने 300 से ज्यादा फिल्मों के लिए लिखा, जहां कमर्शियल सिनेमा अक्सर लेखकों की धार कुंद कर देता है। राही ने वहां भी अपनी शर्तें मनवाईं। अपने उपन्यास 'सीन: 75' में उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री के इसी चमचमाते पर्दे के पीछे के काले सच और खोखलेपन को बेनकाब किया। 15 मार्च 1992 को डॉ. राही मासूम रजा ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

 

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