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सावित्रीबाई फुले : अपशब्दों की बौछार से गुलामी की चुनौती तक, संघर्ष और तानों से तपकर बनीं 'नारी शिक्षा की अग्रदूत'

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नई दिल्ली , 09 Mar 2026

Last updated on: Mar 10, 2026, 12:26 IST

उस दौर में जब लड़कियों की शिक्षा को पाप समझा जाता था, जब तमाम यत्न कर उनका रास्ता रोका जाता था, तब एक महिला ने अपशब्दों की बौछार, समाज की तानों और गुलामी की जंजीरों को चुनौती दी। रोजाना अपमान और हमलों से गुजरकर भी उन्होंने हार नहीं मानी। अटूट संकल्प के साथ निकलकर वह भारत की 'नारी शिक्षा की अग्रदूत' बनीं।

तमाम संघर्षों के बीच सावित्रीबाई ने हार नहीं मानी। उनके इस साहस ने न सिर्फ लड़कियों की शिक्षा की शुरुआत की, बल्कि महिलाओं के सशक्तिकरण की नींव रखी। 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव गांव में जन्मी सावित्रीबाई का बचपन उस समय बीता, जब लड़कियों के लिए पढ़ना-लिखना कल्पना से परे था।

मात्र 9 साल की उम्र में उनका विवाह 13 साल के ज्योतिराव फुले से हो गया। ज्योतिराव एक महान समाज सुधारक, शिक्षक, विचारक और क्रांतिकारी थे। उन्होंने सावित्रीबाई के अंदर छिपी जिज्ञासा और साहस को पहचाना। घर पर ही उन्हें पढ़ाना शुरू किया। ज्योतिराव समाज में शिक्षा के माध्यम से जागृति लाना चाहते थे, खासकर नारी शिक्षा के क्षेत्र में।

लेकिन कट्टर समाज का विरोध इतना तीव्र था कि प्रयास सफल नहीं हो पा रहे थे। इस समस्या को उन्होंने अपनी मौसी सगुणाबाई और पत्नी सावित्रीबाई के सामने रखा। सगुणाबाई ने कहा, “समाज को बदलना है तो पहले महिलाओं को शिक्षित करना होगा।” बस यहीं से अलख जगी। 1 जनवरी 1848, सावित्रीबाई ने पुणे के भिडे वाडा में भारत का पहला लड़कियों का स्कूल खोला।

शुरू में सिर्फ छह छात्राएं थीं। यह कदम उस समय के रूढ़िवादी समाज के लिए बड़े झटके जैसा था। रास्ते में लोग पत्थर मारते, कीचड़ फेंकते, और गालियां देते। सावित्रीबाई अतिरिक्त साड़ी साथ रखतीं, स्कूल पहुंचकर कपड़े बदलतीं, और पढ़ाना जारी रखतीं। उनका मानना था कि शिक्षा सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि बौद्धिक मुक्ति है।

वे एक क्रांतिकारी कवयित्री भी थीं। उनकी कृति 'काव्य फुले' में वे लिखती हैं, "शिक्षा ग्रहण करो, स्वावलंबी बनो।" उन्होंने अंग्रेजी को 'अंग्रेजी माता' कहा और इसे वैश्विक ज्ञान की खिड़की माना। उनका लक्ष्य था कि बहुजन समाज आधुनिक विचारों से जुड़े। सावित्रीबाई का संघर्ष क्लासरूम तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने विधवाओं के शोषण को देखा और अपने घर में 'बालहत्या प्रतिबंधक गृह' खोला।

दीवारों पर पोस्टर लगवाए, “गर्भवती विधवाएं, यहां सम्मान से बच्चे को जन्म दो।” 1897 में पुणे में प्लेग महामारी फैली। सवर्ण डॉक्टर दलित बस्तियों में जाने से कतराते थे। 66 साल की उम्र में भी सावित्रीबाई पीछे नहीं हटीं। मुंधवा की एक बस्ती में 10 साल के बीमार बच्चे पांडुरंग को अपनी पीठ पर लादकर अस्पताल ले गईं। बच्चा बच गया, लेकिन सावित्रीबाई प्लेग से संक्रमित हो गईं। 

10 मार्च 1897 को उन्होंने अंतिम सांस ली। आज भी उनका योगदान जीवित है। 2 जुलाई 2025 को राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (एनआईपीसीसीडी) का नाम बदलकर 'सावित्रीबाई फुले राष्ट्रीय महिला एवं बाल विकास संस्थान' कर दिया गया। 4 जुलाई को रांची में इसके नए केंद्र का उद्घाटन हुआ। यही नहीं, सिनेमा जगत भी सावित्रीबाई पर बायोपिक बना चुका है।

 

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