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जब भगत सिंह को छुड़ाने के लिए ट्रक चलाना सीखा, वही युवा आगे चलकर बना महान साहित्यकार ‘अज्ञेय’

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नई दिल्ली , 06 Mar 2026

Last updated on: Mar 07, 2026, 13:24 IST

"हाथों ने बहुत अनर्थ किए, पग ठौर-कुठौर चले। मन के आगे भी खोटे लक्ष्य रहे, वाणी ने (जाने अनजाने) सौ झूठ कहे। पर आंखों ने हार, दुख, अवसान, मृत्यु का, अंधकार भी देखा तो सच-सच देखा।" हिंदी साहित्य में जब भी नए प्रयोगवादी कवि की बात होती है तो सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' का नाम सबसे पहले याद आता है। कविता, उपन्यास, निबंध और पत्रकारिता, हर क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाने वाले 'अज्ञेय' ने हिंदी साहित्य को परंपरागत रास्तों से हटाकर प्रयोगवाद चेतना की नई दिशा दी। 

7 मार्च 1911 को उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में जन्मे सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन के बारे में कहा जाता है कि वे बाकी कवि और लेखकों की तरह एक ही लीक पर चलने वाले साहित्यकार नहीं थे। उन्होंने साहित्य को अपने रंग में रंगा। उस जमाने में साहित्यकारों की दशा दीनहीन या उदास और बेजार होती थी, लेकिन सच्चिदानंद इस रिवायत को तोड़ने वाले पहले लेखक थे।

चुपचाप चुपचाप

झरने का स्वर, हम में भर जाए,

चुपचाप चुपचाप

शरद की चांदनी झील की लहरों पर तिर आए।

चुपचाप चुपचाप

जीवन का रहस्य जो कहा न जाए,

हमारी ठहरी आंख में गहराए।

चुपचाप चुपचाप

हम पुलकित विराट में डूबें

पर विराट हम में मिल जाए।

एक बार इंटरव्यू में हिंदी के प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह ने 'अज्ञेय' के बारे में कहा था, "अज्ञेय को प्रयोगवाद से जोड़ा गया, लेकिन मैं मानता हूं कि प्रयोगवाद से उन्हें गलत ढंग से जोड़ा गया। उन्होंने खुद भी कहा कि प्रयोगवाद कुछ नहीं होता। केदारनाथ सिंह याद करते हैं कि अज्ञेय अक्सर व्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करते थे। क्यों करते थे, यह प्रश्न बना ही रहेगा। उन्होंने कहीं कहा था कि समाजवादी जो व्यक्ति बना रहा है, वह सांचे में ढला हुआ है। वह स्वतंत्र नहीं है।"

उनकी पकड़ सिर्फ हिंदी साहित्य में ही नहीं, बल्कि वे अंग्रेजी के भी अच्छे जानकार थे। तभी तो उन्होंने अपने जीवन काल में हिंदी और अंग्रेजी दोनों पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया।सिर्फ लेखक कला ही उनकी प्रतिभा नहीं थी, बल्कि वे क्रांतिकारियों की टोली का भी हिस्सा रहे, जिससे उनके देशप्रेम और समर्पण भाव को समझा जा सकता है।

जब वे 18 साल के थे, तब लाहौर में वे क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की टोली से जुड़े थे। उनका सक्रिय क्रांतिकारी जीवन सरदार भगत सिंह को जेल से छुड़ाने की योजना में भाग लेने से शुरू हुआ था। भगत सिंह को भगाने के लिए एक ट्रक के इस्तेमाल का प्लान बनाया गया था और उस ट्रक की स्टेयरिंग 'अज्ञेय' के हाथों में थमाई गई थी।

हालांकि, इसके लिए ट्रक ड्राइविंग सीखने के लिए 5 दिन का वक्त दिया गया था। उनके अंदर जज्बा और देशभक्ति का जुनून ऐसा था कि वे महज 3 दिन में ही ट्रक चलाना सीख गए। हालांकि, यह अलग बात है कि वह प्लान मुखबिरी के कारण सफल नहीं हो पाया था। बाद में वे चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह के कहने पर दिल्ली पहुंचे।

चंद्रशेखर आजाद ने 'अज्ञेय' को एक और बड़ी जिम्मेदारी सौंपी थी। यह 1930 की बात है। इस बार चंद्रशेखर के कहने पर 'अज्ञेय' ने बम बनाने की एक गुप्त फैक्ट्री स्थापित की थी। तब टोली क्रांतिकारी में वात्स्यायन को 'साइंटिस्ट' कहा जाता था, क्योंकि वे साइंस के छात्र रहे थे और बम बनाने की तकनीक जानते थे। वह गुप्त फैक्ट्री ठीक दिल्ली सदर थाने के सामने थी।

जेल में सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन के साथी रहे विमल प्रसाद जैन ने एक बार इंटरव्यू में बताया, "चंद्रशेखर आजाद ने उन्हें मकान लेने का काम सौंपा था। मैं और मेरी पत्नी यहां आकर रहने लगे थे। इसके बाद सच्चिदानंद भी वहां एक वैज्ञानिक के तौर पर आए थे। उन्होंने लाहौर से साइंस में बीएससी ऑनर्स कर रखी थी। उन्हें बम बनाने के लिए बुलाया गया था, लेकिन पुलिस उनकी तलाश में पहले से थी, इसलिए वे अमृतसर चले गए और वहां एक मस्जिद में मुस्लिम बनकर रहते रहे। वहीं से उनकी गिरफ्तारी हुई थी।"

विमल प्रसाद जैन के अनुसार, सेशन जज ने अपने बयान में लिखा था कि इस आदमी (अज्ञेय) को सजा देते हुए मुझे अफसोस होता है। इसका बयान मेरे पास दर्ज है। वह 'पीस ऑफ लिटरेचर' है। यह मामूली 'पीस' नहीं है, बल्कि महान 'पीस ऑफ लिटरेचर' है।"हां दोस्त, तुमने पहाड़ की पगडंडी चुनी और मैंने सागर की लहर। पहाड़ की पगडंडी सकरी और पथरीली स्पष्ट लक्ष्य की ओर जाती हुई, मातबर और भरोसेदार। पगडंडी एक दिन निश्चय ही तुम्हें पहाड़ पर पहुंचा देगी। 

सागर की लहर विशाल, चिकनी और सपाट पर बिछलती, फिसलती हमेशा अज्ञात अदृश्य को टेरती हुई। लहर जो न कभी कहीं पहुंचेगी और न ही पहुंचाएगी।"जेल में रहते ही सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ने कई कहानियां लिखीं।सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन के 'अज्ञेय' नाम के पीछे की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। उन्होंने एक बार अपनी रचनाएं उस दौर के प्रसिद्ध लेखक जैनेंद्र कुमार के पास प्रकाशन के लिए भेजी थीं। सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन उस समय जेल में थे। 

जैनेंद्र ने वे रचनाएं मुंशी प्रेमचंद को दे दीं, जिन्होंने देखा कि इन रचनाओं पर लेखक का नाम नहीं है। जब उन्होंने जैनेंद्र कुमार से लेखक का नाम पूछा तो जवाब मिला कि लेखक का नाम नहीं बताया जा सकता है। वह तो 'अज्ञेय' है। इस पर प्रेमचंद ने कहा, "मैं 'अज्ञेय' नाम से ही कहानी छाप दूंगा।" इस तरह सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन को 'अज्ञेय' नाम मुंशी प्रेमचंद से मिल गया। इसका जिक्र 'अज्ञेय' ने खुद एक इंटरव्यू में किया था।

जैनेंद्र कुमार ने एक इंटरव्यू में कहा था, "एक दिन शाम को एक साहब उनके पास आए थे। उन्होंने कुछ कागज मेरे सामने रख दिए थे। वे मुझे पढ़ने के लिए दिए गए थे और तीन दिन बाद वो साहब फिर से आए थे। उन्होंने लेखक का नाम नहीं बताया। जब मैंने कहानी पढ़ने के बाद उन्हें यह लिखकर दिया कि वे अच्छी लगी हैं तो जेल से तरह-तरह से सामग्री आने लगी थी। कई कहानियां आईं, उनमें से किसी की दो से अधिक प्रतिलिपियां थीं। 

बाद में मुझसे उन कहानियों को छापने के लिए भी बोला गया था। लेखक का नाम नहीं पता था, इसलिए मैंने 'अज्ञेय' नाम बताकर उन कहानियों को प्रेमचंद के पास छपने के लिए भेजा था।"सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन का 'भद्रदूत' पहला संग्रह था, जो प्रकाशित भी हुआ। इसके बाद 'शिखर एक जीवनी' संग्रह उन्होंने लिखा। उनका लेखन और चिंतन का प्रवाह 'सांझ की उदासी' और गहराती काली रात को भोर का बावरा अहेरी, इंद्रधनुष के सभी रंग बिखेरता चला गया।

 

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