Wednesday, 22 July 2026

 

 

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गुलाबी नगरी की रंगीन विरासत 'गुलाल गोटे', मुस्लिम कारीगरों से जुड़ी है परंपरा

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5 Dariya News

जयपुर , 02 Mar 2026

Last updated on: Mar 03, 2026, 16:06 IST

होली का नाम आते ही रंग, उमंग और अपनापन याद आता है, लेकिन जयपुर की होली की बात ही कुछ और है। यहां सिर्फ गुलाल नहीं उड़ता, बल्कि सदियों पुरानी एक ऐसी परंपरा जीवंत होती है, जो हिंदू त्योहार और मुस्लिम कारीगरी के खूबसूरत संगम की मिसाल है। यह परंपरा है 'गुलाल गोटे' की, जो इतिहास और भाईचारे के रंगों से भरी हुई है। 

गुलाल गोटा दिखने में एक छोटी सी गेंद जैसे होते है, जिसका वजन महज 4 से 6 ग्राम के बीच होता है। यह लाख से बनाई जाती है और इतनी नाजुक होती है कि किसी को छूते ही फूट जाती है। जैसे ही यह टूटती है, अंदर भरा गुलाल सामने वाले को रंगों में सराबोर कर देता है, लेकिन बिना किसी चोट के।इस कला की जड़ें 1727 में जयपुर की स्थापना के समय से जुड़ी हैं। 

जब सवाई जयसिंह द्वितीय ने इस शहर को बसाया, तभी से मनिहार समुदाय के लोग इस शिल्प में माहिर रहे हैं। 'मनिहारों का रास्ता' इलाके में रहने वाले मुस्लिम मनिहार परिवार ही पीढ़ी दर पीढ़ी इसे बनाते आ रहे हैं। आज उनकी सातवीं और आठवीं पीढ़ी इस नाजुक कला को संभाले हुए है। यह सिर्फ एक हुनर नहीं, बल्कि विश्वास और साझी संस्कृति की मिसाल है।

गुलाल गोटा बनाने के लिए सबसे पहले लाख को गर्म करके पिघलाया जाता है। फिर कांच की नली या फूंकनी की मदद से उसमें हवा भरी जाती है, ताकि वह गेंद का आकार ले सके। यह काम बहुत सावधानी से किया जाता है, क्योंकि जरा सी चूक से पूरी मेहनत बेकार हो सकती है। इसके बाद उसमें खुशबूदार गुलाल भरा जाता है और उसे कागज या अरारोट के लेप से सील कर दिया जाता है।

शुरुआती दौर में गुलाल गोटे खास तौर पर राजघराने के लिए बनाए जाते थे। होली के दिन राजा हाथी पर सवार होकर जनता पर गुलाल गोटे फेंकते थे। समय बदला, राजशाही का दौर बदला, लेकिन यह परंपरा खत्म नहीं हुई। आज भी जयपुर के सिटी पैलेस में होली के मौके पर गुलाल गोटों की खास मांग रहती है। इतना ही नहीं, ये पूरी तरह ईको-फ्रेंडली होते हैं। शुद्ध लाख और प्राकृतिक रंगों से बने होने के कारण ये नुकसान नहीं पहुंचाते।

 

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