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बॉबस्ले : बर्फीले ट्रैक पर गति का खेल, जो कहलाता है 'बर्फ का फॉर्मूला 1'

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नई दिल्ली , 12 Jan 2026

Last updated on: Jan 13, 2026, 12:36 IST

'बॉबस्ले' को 'बर्फ का फॉर्मूला 1' कहा जाता है। यह एक ऐसा रोमांचक शीतकालीन खेल है जिसमें खिलाड़ी विशेष स्लेज पर बैठकर बर्फीले ट्रैक पर तेज गति से फिसलते हैं। टीमवर्क, संतुलन और सटीक मोड़ों का सही तालमेल ही इस खेल का विजेता तय करता है। बॉबस्ले का आविष्कार 1860 के दशक में स्विस लोगों ने किया, जो डिलीवरी स्लेज के रूप में विकसित हुआ था। 

1880 के दशक तक ब्रिटिश पर्यटक छुट्टियों के दौरान साधारण स्लेज का उपयोग कर रहे थे, लेकिन अब उनको इसमें अधिक रोमांच की तलाश थी।सेंट मॉर्टिज के होटल मालिक कैस्पर बैडरट ने सैलानियों को आकर्षित करने के लिए इस खेल को बढ़ावा दिया, लेकिन विरोध के बाद इसे सार्वजनिक सड़कों के बजाय विशेष ट्रैक पर आयोजित कराया।

चालक स्लेज की गति को बढ़ाने के लिए आगे-पीछे बॉब की तकनीक का इस्तेमाल करता, जिसके चलते इस खेल का नाम 'बॉबस्ले' पड़ा। शुरुआती समय में लकड़ी की स्लेज का इस्तेमाल होता था, जिन्हें बाद में स्टील की स्लेज से बदल दिया गया। आज के दौर में दुनिया की बेहतरीन टीमें आर्टिफिशियल आइस ट्रैक पर हाई-टेक फाइबरग्लास और स्टील से बनी स्लेज का इस्तेमाल करती हैं।

19वीं शताब्दी के अंत में बॉबस्ले खेल का विकास हुआ। स्विस खिलाड़ियों ने दो स्केलेटन स्लेज को जोड़कर और स्टीयरिंग मैकेनिज्म लगाकर एक नई स्लेज बनाई। सुरक्षा के मद्देनजर इसमें एक फ्रेम भी जोड़ा गया। साल 1897 में दुनिया का पहला बॉबस्ले क्लब सेंट मोरिट्ज में स्थापित हुआ। साल 1903 में सेंट मोरिट्ज में पहला बॉबस्ले ट्रैक बना और साल 1904 में पहली रेस का आयोजन हुआ।

करीब दो दशकों में इस खेल ने विंटर ओलंपिक में भी अपनी जगह बना ली। साल 1923 में फेडरेशन इंटरनेशनेल डी बॉबस्ले एट डी टोबोगनिंग की स्थापना हुई। अगले साल, 1924 में शैमॉनिक्स विंटर ओलंपिक में चार पुरुषों की स्पर्धा को शामिल किया गया। इसके बाद 1932 में दो पुरुष इवेंट को जोड़ा गया। साल 2002 में पहली बार 2-वुमेन बॉबस्ले रेस आयोजित हुई।बॉबस्ले रेस में खिलाड़ी स्लेज को 50 मीटर तक धक्का देते हैं, जिससे स्लेज 40 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार पकड़ लेती है। 

पायलट सबसे पहले स्लेज में कूदता है, जिसके बाद टीम के अन्य सदस्य इसमें कूदते हैं। बॉबस्ले में स्लेज और टीम के कुल वजन की सीमा तय होती है। डबल्स में स्लेज की लंबाई 2-7 मीटर होती है, जबकि चार खिलाड़ियों की रेस में स्लेज 3-8 मीटर लंबा होता है। महिलाओं की दौड़ में स्लेज का वजन 340 किलोग्राम, जबकि पुरुषों की दौड़ में 390 किलोग्राम होता है। 

चार खिलाड़ियों की दौड़ में यह 630 किलोग्राम से अधिक नहीं हो सकता। खिलाड़ी खास ग्रिप वाले जूते पहनते हैं। सिर पर हेलमेट पहनना जरूरी है।स्लेज के अंदर लगे स्टीयरिंग रिंग्स के जरिए पायलट स्लेज की दिशा को नियंत्रित करता है। ट्रैक की लंबाई करीब 1200-1500 मीटर होती है, जिसमें 15 मोड़ होते हैं। आमतौर पर दो दिनों में चार हीट होती हैं, जिसके कुल समय को मिलाकर विजेता तय किया जाता है। ब्रेकमैन फिनिश लाइन पार करने के बाद ब्रेक लीवर खींचकर स्लेज को रोकता है।

 

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